*किरंदुल नगरपालिका के पीछे नजुल जमीन पर उच्च अधिकारियों का कथित अवैध कब्जा: ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ की तस्वीर उजागर*
किरंदुल (दंतेवाड़ा), 10 अक्टूबर 2025: छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के किरंदुल नगरपालिका क्षेत्र में एक ऐसा मामला सामने आया है, जो स्थानीय प्रशासन की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रहा है। नगरपालिका के ही उच्च अधिकारियों पर नजुल (सरकारी) जमीन पर अवैध कब्जा करने का आरोप लगाया जा रहा है। यह जमीन नगरपालिका कार्यालय के ठीक पीछे स्थित है, जो एक सुनसान इलाके में होने के कारण आम जनता की नजरों से कोसों दूर है। सूत्रों के अनुसार, यहां पानी की टंकी के बाउंड्री वॉल के अंदर और साइड मे ‘घर नुमा’ निर्माण कार्य चल रहा है, जो सरकारी संपत्ति के दुरुपयोग का स्पष्ट संकेत देता है।
*घटना का विवरण: पानी टंकी या निजी निवास?*
नगरपालिका के पीछे लगी इस नजुल जमीन पर अवैध निर्माण की शुरुआत कब हुई, इसका सटीक समय अज्ञात है, लेकिन स्थानीय निवासियों और पूर्व कर्मचारियों की मानें तो यह पिछले कुछ महीनों से चल रहा है। वार्ड नंबर 18 में स्थित पानी की टंकी के बाउंड्री के अंदर और इस जमीन से लगे खाली नजुल जमीन पर बनाया जा रहा यह निर्माण बाहर से देखने पर एक पूर्ण विकसित घर जैसा प्रतीत होता है। आश्चर्यजनक रूप से, पानी टंकी के लिए अलग से मोटर रूम मौजूद है, जहां एक नगरपालिका कर्मचारी रहकर इसकी देखरेख करता है। ऐसे में बाउंड्री वॉल के अंदर अतिरिक्त ‘घर जैसा’ ढांचा किस उद्देश्य से बनाया जा रहा है? यह सवाल अब स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय बन चुका है।
सूत्र बताते हैं कि निर्माण के बाद पानी टंकी की जगह पर नई बाउंड्री वॉल खड़ी कर दी जाएगी, जिससे घर और टंकी को दो अलग-अलग हिस्सों में विभाजित कर दिया जाएगा। इससे अवैध निर्माण को वैध ठहराने की कोशिश की जा सकती है। यह जगह शहर के मुख्य हिस्सों से दूर होने के कारण किसी का आना-जाना कम ही होता है, जो अधिकारियों के लिए सुविधाजनक साबित हो रही है। एक स्थानीय निवासी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “नगरपालिका दूसरों के अवैध कब्जों को तोड़ने का दावा करती है, लेकिन खुद के अधिकारियों का कब्जा देखकर लगता है कि ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ वाली कहावत यहां चरितार्थ हो रही है।”
*विश्लेषण: प्रशासनिक लापरवाही या सिस्टमिक भ्रष्टाचार?*
यह मामला केवल एक अवैध निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ के नगरपालिकाओं में नजुल जमीन के दुरुपयोग की व्यापक समस्या को उजागर करता है। राज्य के नगरपालिका अधिनियम के तहत नजुल जमीन राज्य सरकार की संपत्ति होती है, जिसका उपयोग सार्वजनिक हित में ही किया जा सकता है। दंतेवाड़ा जैसे नक्सल प्रभावित क्षेत्र में, जहां विकास की धीमी गति पहले से ही एक चुनौती है, सरकारी संपत्ति का निजी फायदे के लिए इस्तेमाल न केवल कानूनी अपराध है, बल्कि जनता के विश्वास को भी ठेस पहुंचाता है।
पिछले वर्षों में दंतेवाड़ा जिले में सरकारी जमीनों पर कब्जे के कई मामले सामने आ चुके हैं। उदाहरण के लिए, अक्टूबर 2024 में एक कांग्रेसी नेता द्वारा नक्सल पीड़ित के नाम पर 19 डिसमिल सरकारी जमीन पर कब्जा करने का मामला राजस्व विभाग ने सुलझाया था, जहां भूमि को मुक्त कर भाजपा को सौंपा गया। इसी तरह, जुलाई 2025 में किरंदुल के वार्ड नंबर 8 में एक निजी जमीन विवाद में अवैध कब्जे की शिकायत दर्ज हुई। लेकिन जब बात नगरपालिका के उच्च अधिकारियों की आती है, तो मामला और जटिल हो जाता है। क्या यह व्यक्तिगत लालच है या सिस्टम में व्याप्त भ्रष्टाचार का हिस्सा? विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी घटनाएं पारदर्शिता की कमी और निगरानी तंत्र की कमजोरी को दर्शाती हैं। यदि समय रहते जांच न हुई, तो यह अन्य अवैध कब्जों को बढ़ावा दे सकता है, जिससे सार्वजनिक संसाधनों का नुकसान होगा।
नगरपालिका अधिनियम की धारा 284 के तहत अवैध कब्जे पर सख्त कार्रवाई का प्रावधान है, जिसमें जुर्माना और निर्माण ध्वस्त करने तक की सजा शामिल है। लेकिन जब आरोपी खुद अधिकारी हों, तो जांच कौन करेगा? स्थानीय स्तर पर यह सवाल उठ रहा है कि जिला प्रशासन या राज्य सरकार इसकी निष्पक्ष जांच क्यों नहीं करा रही?
*जनता की मांग: तत्काल जांच और कार्रवाई*
स्थानीय संगठनों और निवासियों ने जिला कलेक्टर और लोकायुक्त से इस मामले की स्वतंत्र जांच की मांग की है। एक सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा, “यह केवल जमीन का मुद्दा नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था पर सवाल है। यदि अधिकारी ही नियम तोड़ेंगे, तो आम नागरिक कैसे भरोसा करेंगे?” नगरपालिका प्रशासन ने अभी तक इस आरोप पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है, लेकिन सूत्रों के अनुसार आंतरिक स्तर पर चर्चा चल रही है।
यह घटना दंतेवाड़ा जैसे विकासशील क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता को रेखांकित करती है। यदि समय रहते कार्रवाई हुई, तो न केवल अवैध कब्जा रुकेगा, बल्कि जनता का विश्वास भी बहाल होगा। फिलहाल, किरंदुल के निवासी इंतजार कर रहे हैं कि क्या इस ‘सुनसान’ कोने की आवाज सुनी जाएगी।

