*किरंदुल के नागार्जुन बुद्ध विहार में वर्षावास का शुभारंभ, बौद्ध समाज ने ली त्रिशरण-पंचशील की दीक्षा; एनएमडीसी सेवानिवृत्त अधिकारियों का सम्मान*
किरंदुल (दंतेवाड़ा)। आज नागार्जुन बुद्ध विहार में बौद्ध समाज के वर्षावास की औपचारिक शुरुआत हुई। इस पावन अवसर पर बौद्ध समाज के लोगों ने सामूहिक रूप से त्रिशरण और पंचशील ग्रहण किया। साथ ही एनएमडीसी से हाल ही में सेवानिवृत्त हुए मधुकर सितापराव और पदोन्नति मिली नागेश्वर नन्दलाल दोनों को समाज की ओर से सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम में बौद्ध भक्तों की बड़ी संख्या मौजूद रही। विहार परिसर में शांति और भक्ति का वातावरण छाया रहा। त्रिशरण-पंचशील के माध्यम से उपस्थित जनों ने बुद्ध, धम्म और संघ की शरण लेने तथा अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य एवं मद्य-निषेध जैसे पांच शील पालन करने का संकल्प लिया।
वर्षावास का महत्व: अहिंसा, साधना और संघ की एकता का प्रतीक
बौद्ध धर्म में वर्षावास (वस्स या वर्षा-ऋतु निवास) का विशेष धार्मिक और व्यावहारिक महत्व है। यह परंपरा भगवान बुद्ध द्वारा स्थापित की गई थी। आषाढ़ पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन/कार्तिक पूर्णिमा तक लगभग तीन माह तक भिक्षु एक ही स्थान (विहार) पर रहकर ध्यान, अध्ययन, विनय पालन और धम्म-प्रवचन करते हैं।
इसके पीछे कई कारण हैं:
अहिंसा का पालन: वर्षा ऋतु में भूमि पर असंख्य सूक्ष्म जीव-जंतु उत्पन्न हो जाते हैं। भिक्षुओं के घूमने-फिरने से उनका अहित होने का खतरा रहता है। इसलिए एक स्थान पर स्थिर रहना अहिंसा के सिद्धांत का जीवंत उदाहरण है।
आध्यात्मिक साधना: तीन माह का यह काल गहन ध्यान, धम्म-अध्ययन और आत्म-निरीक्षण के लिए समर्पित होता है। भिक्षु संघ में एकजुट रहकर अनुशासन और प्रज्ञा का विकास करते हैं।
समाज और संघ का संबंध: गृहस्थ उपासक-उपासिकाएं इस दौरान दान, सेवा और धम्म-श्रवण करके पुण्य अर्जित करते हैं। इससे संघ और समाज के बीच परस्पर सहयोग मजबूत होता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: बुद्ध ने स्वयं सारनाथ (इसिपतन) में अपना पहला वर्षावास किया था और धम्मचक्र प्रवर्तन किया। उन्होंने वर्षाकाल में यात्रा से कृषि और जीव-जंतुओं को नुकसान पहुंचाने से बचने के लिए यह नियम बनाया।
आज भी यह परंपरा बौद्ध समाज को एकजुट रखने, पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता जगाने और नैतिक जीवन जीने की प्रेरणा देती है। किरंदुल जैसे औद्योगिक क्षेत्र में यह आयोजन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां बौद्ध समुदाय अपनी सांस्कृतिक जड़ों को जीवित रखे हुए है।
सेवानिवृत्त कर्मि व पदोन्नत हुऐ अधिकारी का सम्मान
कार्यक्रम में एनएमडीसी से सेवानिवृत्त मधुकर सितापराव और पदोन्नत हुऐ नागेश्वर नन्दलाल जनरल मैनेज माइनिंग को समाज की ओर से सम्मानित किया गया। समाज के प्रतिनिधियों ने उनके योगदान की सराहना करते हुए उन्हें स्मृति चिह्न और आशीर्वाद प्रदान किए। यह सम्मान बौद्ध समाज की उस परंपरा को दर्शाता है जिसमें सामुदायिक सेवा और कर्मठता को सम्मान दिया जाता है।
नागार्जुन बुद्ध विहार किरंदुल में वर्षावास की शुरुआत स्थानीय बौद्ध समाज की धार्मिक आस्था और एकता का जीवंत प्रमाण है। यह आयोजन न केवल धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि अहिंसा, साधना और सामुदायिक सहयोग की बौद्ध शिक्षाओं को व्यवहार में उतारने का माध्यम भी है।
जय भीम! नमो बुद्धाय!
