*बचेली डीएवी पब्लिक स्कूल में ‘हिटलरशाही’ का राज: प्राचार्य चेतना शर्मा के तानाशाही रवैये से त्रस्त शिक्षक-छात्र, 250 से अधिक बच्चों का भविष्य बर्बाद, एनएमडीसी प्रबंधन की चुप्पी ने बढ़ाई आशंका*

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*बचेली डीएवी पब्लिक स्कूल में ‘हिटलरशाही’ का राज: प्राचार्य चेतना शर्मा के तानाशाही रवैये से त्रस्त शिक्षक-छात्र, 250 से अधिक बच्चों का भविष्य बर्बाद, एनएमडीसी प्रबंधन की चुप्पी ने बढ़ाई आशंका*

बचेली, दंतेवाड़ा (विशेष संवाददाता): छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के बचेली स्थित डीएवी पब्लिक स्कूल में पिछले कई दिनों से चल रहा विवाद अब एक गंभीर संकट का रूप ले चुका है। स्कूल के प्राचार्य डॉ. मिसेज चेतना शर्मा के कथित ‘हिटलर’ जैसे तानाशाही व्यवहार से न सिर्फ शिक्षक और कर्मचारी परेशान हैं, बल्कि निर्दोष छात्रों का भविष्य भी दांव पर लग गया है। एनएमडीसी (नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन) के संरक्षण में संचालित इस स्कूल में शिक्षकों ने प्रबंधन को लिखित शिकायत भेजी, लेकिन कोई कार्रवाई न होने से आक्रोश और बढ़ गया है। एक छात्र की दर्द भरी दास्तान ने तो मौजूद जनप्रतिनिधियों और आम नागरिकों का खून खौला दिया है। विश्लेषण में यह स्पष्ट है कि प्राचार्य का यह रवैया न केवल संस्थागत संस्कृति को नष्ट कर रहा है, बल्कि शिक्षा के मूल मंत्र—सहानुभूति, समानता और विकास—को भी कुचल रहा है, जो हिटलर की तरह एकलौते व्यक्ति के अहंकार पर आधारित प्रतीत होता है।

शिकायत पत्र से खुलासा: शिक्षकों का मनोबल चूर, तीन की हालत गंभीर

11 सितंबर 2025 को भेजे गए औपचारिक शिकायत पत्र में स्कूल के शिक्षक और गैर-शिक्षकीय कर्मचारियों ने प्राचार्य डॉ. चेतना शर्मा के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए हैं। पत्र सीजी जोन-ए, हडको, भिलाई (दुर्ग) के क्षेत्रीय अधिकारी को संबोधित है। इसमें कहा गया है कि प्राचार्य का व्यवहार एक अस्वास्थ्यकर वातावरण पैदा कर रहा है, जो स्टाफ के मनोबल और शैक्षणिक माहौल को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। प्रमुख चिंताएं इस प्रकार हैं:

सहयोग और सम्मान की कमी: शिक्षकों के प्रति लगातार असहयोग, आपसी सम्मान का अभाव और अनुचित व्यवहार से कार्यबल पूरी तरह हतोत्साहित हो गया है।

मनमानी निर्णय: स्थापित नियमों और नीतियों की अनदेखी करते हुए मनमाने फैसले, जो संस्था की नींव को हिला रहे हैं।

अपमानजनक भाषा और व्यवहार: स्टाफ सदस्यों की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली भाषा का बार-बार प्रयोग, जो स्कूल के पेशेवर माहौल को विषाक्त बना रहा है।

प्रशासनिक लापरवाही: शैक्षणिक और अतिरिक्त गतिविधियों के कार्यक्रमों का कुप्रबंधन, जो छात्रों की सीखने की प्रक्रिया को सीधे प्रभावित कर रहा है।

पारदर्शिता का अभाव: प्राचार्य और स्टाफ के बीच संवाद की कमी से भ्रम और असंतोष व्याप्त है।

शिकायत के परिणामस्वरूप, तीन स्टाफ सदस्यों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा, जबकि एक ने समय से पहले सेवा से इस्तीफा दे दिया। यह स्थिति अब इतनी बिगड़ चुकी है कि शिक्षक अपनी जिम्मेदारियां प्रभावी ढंग से निभा पाने में असमर्थ महसूस कर रहे हैं। एक शिक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “प्राचार्य का रवैया ऐसा है जैसे हम सब उनके गुलाम हों। हर छोटी-बड़ी बात पर डांट-फटकार, और विरोध करने पर धमकी। हमारा स्कूल शिक्षा का मंदिर है, न कि जेलखाना।”

छात्र की मार्मिक कहानी: ‘औकात नहीं इस स्कूल की’, मां को ‘डायन’ कह भागाया

विवाद की चरम सीमा तब दिखी, जब एक छात्र ने अपनी पीड़ा साझा की। बचेली के एक स्थानीय सभागार में आयोजित एक सभा में छात्र ने बताया कि वह पिछले साल कक्षा 8 में सप्लीमेंट्री परीक्षा में अंग्रेजी में कमजोर था। प्राचार्य डॉ. चेतना शर्मा ने उसे स्कूल से निष्कासित कर दिया और कहा, “तुम्हारी औकात नहीं इस स्कूल में पढ़ने की, तुम चले जाओ!” छात्र की मां स्कूल पहुंचीं और प्राचार्य से बच्चे को पढ़ाने की विनती की, लेकिन उन्हें ‘डायन’ कहकर भगा दिया गया। इस अपमान से आहत होकर बच्चे ने पढ़ाई पूरी तरह छोड़ दी। सभा में मौजूद जनप्रतिनिधि और नागरिकों की आंखें नम हो गईं, और कईयों ने इसे ‘शिक्षा के नाम पर अपराध’ करार दिया।

यह कोई एकाकी घटना नहीं है। मिली जानकारी के अनुसार, पिछले 3-4 वर्षों में स्कूल से लगभग 250 से अधिक छात्रों को मनमाने ढंग से निकाला गया है। सभी को कथित रूप से प्रताड़ित किया गया—कभी ग्रेड्स के बहाने, कभी व्यवहार के नाम पर। एक पूर्व छात्र ने कहा, “स्कूल प्राचार्य के व्यक्तिगत अहंकार का शिकार हो गया है। बच्चे डर के साए में जीते हैं, जहां गलती की सजा निष्कासन है, न कि सुधार।”

विश्लेषण: हिटलरशाही का आईना—शिक्षा में तानाशाही का कुप्रभाव

प्राचार्य डॉ. चेतना शर्मा के व्यवहार को ‘हिटलरशाही’ कहना अतिशयोक्ति नहीं लगता। इतिहास में एडॉल्फ हिटलर का शासन एकलौते व्यक्ति के अंधे अहंकार, विरोधियों का दमन और प्रचार के माध्यम से नियंत्रण पर आधारित था। यहां भी वही पैटर्न दिखता है: मनमाने निर्णय, अपमानजनक भाषा (‘डायन’ जैसे शब्दों का प्रयोग), और संस्था को व्यक्तिगत साम्राज्य बनाने की कोशिश। शिक्षकों को ‘गुलामों’ की तरह व्यवहार करना, छात्रों को ‘अनुपयुक्त’ घोषित कर बाहर फेंकना—यह सब शिक्षा के लोकतांत्रिक मूल्यों का उल्लंघन है।

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा माहौल छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित करता है। एक अध्ययन (एनसीईआरटी की रिपोर्ट के अनुसार) बताता है कि तानाशाही नेतृत्व वाले स्कूलों में ड्रॉपआउट रेट 40% तक बढ़ जाता है, और छात्रों में चिंता-तनाव के मामले दोगुने हो जाते हैं। बचेली जैसे दूरस्थ क्षेत्र में, जहां एनएमडीसी जैसे सार्वजनिक उपक्रम स्कूल चलाते हैं, यह और भी गंभीर है। स्कूल का उद्देश्य खनन क्षेत्र के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना है, लेकिन प्राचार्य का रवैया इसे एक ‘डर का केंद्र’ बना रहा है। 250 से अधिक छात्रों का निष्कासन न केवल परिवारों को आर्थिक-भावनात्मक क्षति पहुंचा रहा है, बल्कि क्षेत्र की साक्षरता दर को भी प्रभावित कर रहा है।

एनएमडीसी प्रबंधन की चुप्पी इस मामले को और संदिग्ध बनाती है। शिक्षकों की लिखित शिकायत पर कोई कार्रवाई न होना प्रश्न उठाता है—क्या यह प्रशासनिक मिलीभगत है या उदासीनता? डीएवी संस्थान, जो स्वामी दयानंद के आदर्शों पर आधारित है, को ऐसे विवादों से साख का नुकसान हो रहा है। विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि तत्काल जांच समिति गठित हो, जिसमें बाहरी सदस्य शामिल हों, ताकि निष्पक्षता बनी रहे।

जनाक्रोश और मांग: तत्काल हस्तक्षेप की पुकार

इस घटना ने बचेली और दंतेवाड़ा में व्यापक आक्रोश पैदा कर दिया है। अभिभावक संगठनों ने स्कूल के बाहर धरना देने की चेतावनी दी है, जबकि स्थानीय विधायक ने विधानसभा में मामला उठाने का वादा किया है। सोशल मीडिया पर #JusticeForBacheliDAVStudents जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं, जहां लोग प्राचार्य के व्यवहार को ‘शिक्षा का अपमान’ बता रहे हैं।

एनएमडीसी और डीएवी प्रबंधन से मांग की जा रही है:

प्राचार्य के खिलाफ तत्काल निलंबन और स्वतंत्र जांच।

प्रभावित छात्रों का पुनर्वास और मुआवजा।

स्टाफ काउंसलिंग और प्रशासनिक सुधार।

पारदर्शी शासन नीति का अमल।

यदि समय रहते कार्रवाई न हुई, तो यह विवाद बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है। बचेली के इस स्कूल को बचाने का समय अब है, वरना शिक्षा का दीपक ‘हिटलरशाही’ के अंधेरे में डूब जाएगा।

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