*किरंदुल: बीजेपी का परंपरागत गढ़ अब कांग्रेस की नजर में, आंतरिक कलह से ‘किले’ को जमीदोज करने की तैयारी*
किरंदुल, 9 सितंबर 2025 (विशेष संवाददाता): छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के किरंदुल में व्यापारिक समुदाय के बीच बढ़ते विभाजन ने राजनीतिक रंग ले लिया है। स्थानीय व्यापारियों को दो गुटों में बांटने की प्रक्रिया पूरी होने के साथ ही किरंदुल व्यापारी कल्याण संघ का अस्थाई चुनाव कार्यालय खुल गया है। विश्वसनीय स्रोतों के अनुसार, यह विवाद अब केवल व्यापारियों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह एक पूर्ण राजनीतिक जंग में बदल चुका है। बैलाडीला व्यापारी कल्याण संघ को कांग्रेस के प्रदेश स्तर के नेताओं से समर्थन मिल रहा है, जबकि नवनिर्मित किरंदुल व्यापारी कल्याण संघ को जिला स्तर के शीर्ष नेताओं (जिनमें बीजेपी के प्रभावशाली चेहरे शामिल हैं) से पीछे से मौन समर्थन प्राप्त हो रहा है।
इस बीच, किरंदुल के वार्ड नंबर 8 – जो वर्षों से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है – अब पार्टी की आंतरिक कलह के कारण दरकने लगा है। हाल के नगरपालिका चुनावों में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई) को इस वार्ड में 200 से अधिक वोट हासिल हुए, जो पहले के चुनावों में सैकड़ों के आंकड़े को पार नहीं कर पाए थे। स्थानीय व्यापारियों और राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि बीजेपी के शीर्ष नेताओं की आपसी लड़ाई ने ही इस ‘किले’ को कमजोर किया है, और अब कांग्रेस इस कमजोरी का फायदा उठाने के लिए तैयार खड़ी है।
*व्यापारिक विभाजन से राजनीतिक उथल-पुथल*
किरंदुल, जो लौह अयस्क खदान बैलाडीला के कारण आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण है, में व्यापारी समुदाय हमेशा से राजनीतिक दलों के लिए वोट बैंक का केंद्र रहा है। हाल ही में व्यापारियों को दो भागों में विभाजित करने की प्रक्रिया ने इस समीकरण को बदल दिया। एक ओर बैलाडीला व्यापारी कल्याण संघ है, जो 65 वर्षो से बुजुर्गो की देन है जिसे कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व से मजबूत समर्थन मिलने की खबरें हैं। स्रोतों के मुताबिक, कांग्रेस नेता व्यापारियों के मुद्दों को उठाकर उन्हें अपने पाले में लाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। दूसरी ओर, नवगठित किरंदुल व्यापारी कल्याण संघ को दंतेवाड़ा जिले के स्थानीय शीर्ष नेताओं – जो मुख्य रूप से बीजेपी से जुड़े हैं – से चुपके-चुपके समर्थन मिल रहा है। हालांकि, यह समर्थन ‘पर्दे के पीछे’ से है, जो बीजेपी की आंतरिक असहमति को दर्शाता है।
एक स्थानीय व्यापारी, जो नाम न छापने की शर्त पर बोले, ने कहा, “पहले वार्ड 8 बीजेपी का अटूट गढ़ था। लेकिन पार्टी के नेताओं की आपसी कलह ने सब कुछ बर्बाद कर दिया। पहले सीपीआई को कभी इतने वोट नहीं मिले, और अब कांग्रेस वाले व्यापारियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हो गए हैं। यह बीजेपी के लिए खतरे की घंटी है।”
*बीजेपी के ‘किले’ पर संकट: आंतरिक कलह का विश्लेषण*
वार्ड नंबर 8 को बीजेपी का ‘गढ़’ कहना अतिशयोक्ति नहीं है। यहां पार्टी ने दशकों से मजबूत पकड़ बनाए रखी थी, खासकर खनन क्षेत्र से जुड़े व्यापारियों और मजदूरों के बीच। लेकिन हाल की घटनाएं इस किले को जमीदोज करने की तैयारी दिखा रही हैं। नगरपालिका चुनावों में सीपीआई को 200+ वोट मिलना एक बड़ा संकेत है – यह दर्शाता है कि बीजेपी के पारंपरिक वोटर अन्य दलों की ओर मुड़ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बीजेपी के शीर्ष नेताओं की आपसी लड़ाई ही इसका मुख्य कारण है।
राजनीतिक विश्लेषक डॉ. रामेश्वर साहू (नाम परिवर्तित) कहते हैं, “बीजेपी की आंतरिक कलह ने वार्ड 8 को कमजोर किया है। जहां एक तरफ पार्टी के नेता एक-दूसरे के खिलाफ काम कर रहे हैं, वहीं कांग्रेस इस अवसर को भुनाने के लिए व्यापारियों को लुभा रही है। सीपीआई का उदय भी बीजेपी की निष्क्रियता का नतीजा है। अगर यही सिलसिला चला, तो आने वाले चुनावों में यह गढ़ पूरी तरह ढह सकता है।” साहू आगे जोड़ते हैं कि कांग्रेस का प्रदेश स्तर का समर्थन व्यापारियों के लिए आकर्षक है, क्योंकि वे आर्थिक मुद्दों पर फोकस कर रही है, जैसे कि खनन क्षेत्र में व्यापारियों की समस्याएं।
*कांग्रेस की एंट्री: नया अवसर या राजनीतिक चाल?*
कांग्रेस की इस घुसपैठ को स्थानीय स्तर पर एक बड़ा शिफ्ट माना जा रहा है। पार्टी के नेता अब व्यापारियों के साथ सीधे संवाद कर रहे हैं, जो पहले बीजेपी का एकाधिकार था। स्रोतों के अनुसार, कांग्रेस प्रदेश नेतृत्व बैलाडीला संघ को मजबूत बनाने के लिए गुप्त बैठकें कर रही है। वहीं, दंतेवाड़ा जिले के बीजेपी नेताओं का मौन समर्थन नवनिर्मित संघ को मिलना भी पार्टी की दुविधा को उजागर करता है – वे विभाजन को रोकने के बजाय अपने गुट को मजबूत करने में लगे हैं।
व्यापारियों का एक वर्ग मानता है कि यह विभाजन लंबे समय तक नहीं चलेगा, लेकिन फिलहाल यह बीजेपी के लिए नुकसानदेह है। एक व्यापारी ने कहा, “बीजेपी ने हमें भुला दिया, अब हम अन्य विकल्प तलाश रहे हैं। कांग्रेस का समर्थन हमें मजबूती देगा।”
कुल मिलाकर, किरंदुल का राजनीतिक परिदृश्य बदल रहा है। बीजेपी का गढ़ अब चुनौतियों से घिरा है, और कांग्रेस की एंट्री इसे और रोचक बना रही है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या बीजेपी अपनी आंतरिक कलह को सुलझा पाती है, या यह किला पूरी तरह जमीदोज हो जाता है। स्थानीय निवासी उम्मीद कर रहे हैं कि राजनीतिक दलों का यह खेल व्यापारियों के हितों को प्रभावित न करे।
