*किरंदुल में व्यापारियों का आक्रोश: रेलवे और एनएमडीसी के नोटिस के खिलाफ एकजुटता, बबलू सिद्दीकी बोले- “प्राणों का बलिदान देने को तैयार”*

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*किरंदुल में व्यापारियों का आक्रोश: रेलवे और एनएमडीसी के नोटिस के खिलाफ एकजुटता, बबलू सिद्दीकी बोले- “प्राणों का बलिदान देने को तैयार”*

किरंदुल, दंतेवाड़ा, 5 मई 2025: छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में स्थित किरंदुल, जो बैलाडीला की लौह अयस्क खदानों के लिए जाना जाता है, इन दिनों एक गंभीर सामाजिक और प्रशासनिक विवाद के केंद्र में है। रेलवे और नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (एनएमडीसी) द्वारा स्थानीय व्यापारियों को उनकी दुकानों और मकानों को खाली करने के लिए जारी नोटिस ने क्षेत्र में तनाव की स्थिति पैदा कर दी है। इस मुद्दे पर बैलाडीला व्यापारी संघ ने एकजुट होकर विरोध का ऐलान किया है, जिसमें उपाध्यक्ष बबलू सिद्दीकी ने कहा, “मैं किरंदुल की जनता के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने को भी तैयार हूँ।”

*विवाद की जड़: 1958 से चली आ रही कहानी*

किरंदुल का इतिहास बैलाडीला की लौह अयस्क खदानों के साथ गहराई से जुड़ा है। 1958 में, जब खदानों में काम शुरू होने से पहले केवल सर्वेक्षण का काम चल रहा था, एनएमडीसी, रूस और जापान की तकनीकी टीमें यह तय कर रही थीं कि खनन, क्रेशर और लोडिंग प्लांट कहाँ स्थापित किए जाएँ। इस दौरान डिपॉजिट 14 को पहला प्रोजेक्ट चुना गया। 1962 तक तेजी से काम पूरा हुआ और 1964 में उत्पादन शुरू हो गया।

उस समय किरंदुल एक छोटा सा क्षेत्र था, जहाँ व्यापारियों को बसाने के लिए एनएमडीसी और रेलवे के अधिकारियों ने विशेष प्रयास किए। व्यापारियों को अनुनय-विनय के साथ न केवल जगह दी गई, बल्कि उनके घर और दुकान बनाने के लिए सीमेंट, टिन और अन्य सामग्री भी उपलब्ध कराई गई। अधिकारियों ने वादा किया था कि किसी भी समस्या में उनकी मदद की जाएगी और वे यहाँ से न जाएँ। आज वही जगह किरंदुल का हृदय स्थल बन चुकी है, जो नगर के विकास का प्रतीक है।

लेकिन अब, उसी रेलवे और एनएमडीसी ने उन व्यापारियों को नोटिस जारी कर जगह खाली करने की माँग की है, जिनके पूर्वजों को यहाँ बसाने के लिए विनती की गई थी। नोटिस में कहा गया है कि एक महीने के भीतर जगह खाली न करने पर बलपूर्वक कार्रवाई की जाएगी और खर्च की वसूली भी व्यापारियों से होगी। यह नोटिस वार्ड नंबर 6, 7 और 8 के व्यापारियों को प्रभावित कर रहा है, जो 1958 से यहाँ बसे हुए हैं।

*व्यापारी संघ का विरोध: “अंतिम दम तक लड़ेंगे”*

इस अन्याय के खिलाफ बैलाडीला व्यापारी संघ ने एक सभा का आयोजन किया, जिसमें सैकड़ों व्यापारी शामिल हुए। सभा में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि वे अपनी जमीन और विरासत को बचाने के लिए अंतिम साँस तक लड़ेंगे। व्यापारी संघ के अध्यक्ष मनोज छालीवाल ने कहा, “हम इस मुद्दे को पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारियों के सामने उठाएँगे और हर हाल में इसका समाधान निकालेंगे।”

उपाध्यक्ष बबलू सिद्दीकी ने भावुक अपील करते हुए कहा, “यह नोटिस कई सालों से आ रहे हैं। पहले भी रेलवे डोजर लेकर आई थी, लेकिन हमने विरोध कर उन्हें वापस भेजा। अब भी अगर ऐसी स्थिति आएगी, मैं 24 घंटे जनता के साथ हूँ। किरंदुल की जनता के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई तो मैं अपने प्राणों का बलिदान देने को तैयार हूँ।”

*प्रतिनिधि मंडल का गठन: कोर्ट तक जाने की तैयारी*

सभा में एक 11 सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल का गठन किया गया, जो इस मुद्दे को विधायक, कलेक्टर, एसडीएम, नगर पालिका सीएमओ से लेकर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय तक ले जाएगा। व्यापारी संघ के सचिव रणवीर सिंह चौहान ने बताया, “यह समस्या केवल वार्ड 8 तक सीमित नहीं है, बल्कि वार्ड 6 और 7 भी प्रभावित हैं। हम प्रशासन के किसी भी दबाव के सामने नहीं झुकेंगे।”

वरिष्ठ बीजेपी नेता रविंद्र सोनी ने कहा, “हम किरंदुल की तीसरी पीढ़ी हैं। जब यहाँ सड़कें तक नहीं थीं, तब हमें एनएमडीसी और रेलवे ने बसाया था। अब हमें नोटिस दिया जा रहा है। हमारे प्रभारी मंत्री केदार कश्यप ने स्पष्ट कहा है कि अगर हम टैक्स दे रहे हैं, तो यह जमीन हमारी है। अगर सरकार विकास के लिए जगह चाहती है, तो उचित मुआवजा देना होगा।”

नगरवासी शंकर कुंजाम ने स्थानीय आदिवासी भावनाओं को व्यक्त करते हुए कहा, “यह जल, जंगल, जमीन हमारी है। नगरवासियों को कोई तकलीफ हो, यह हमें मंजूर नहीं। हम जनता के साथ अंत तक लड़ेंगे।”

*राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएँ*

मंडल अध्यक्ष विजय सोढ़ी ने सरकार की स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा, “केंद्र और राज्य दोनों में हमारी सरकार है। जनता हमारे लिए सर्वोपरि है। कोई भी निर्णय जनता को परेशान किए बिना लिया जाएगा।” इस बीच, व्यापारियों ने यह भी संकेत दिया है कि अगर प्रशासनिक स्तर पर समाधान नहीं निकला, तो वे कानूनी रास्ता अपनाएँगे।

*विश्लेषण: मानवीय और प्रशासनिक विफलता*

यह विवाद केवल जमीन का मसला नहीं, बल्कि विश्वास और मानवीयता का सवाल है। 1958 में जिन व्यापारियों को यहाँ बसाने के लिए अधिकारियों ने वादे किए थे, आज वही संस्थाएँ उन्हें उजाड़ने की कोशिश कर रही हैं। यह घटना सरकारी विभागों में स्वार्थ और जवाबदेही की कमी को उजागर करती है। व्यापारियों का तर्क है कि उनकी तीन पीढ़ियाँ यहाँ रह रही हैं, टैक्स दे रही हैं, और अब उनकी आजीविका को खतरे में डालना अन्याय है।

इसके अलावा, यह मामला क्षेत्रीय विकास और आदिवासी अधिकारों से भी जुड़ा है। किरंदुल और बैलाडीला जैसे क्षेत्रों में खनन और औद्योगिक गतिविधियों ने स्थानीय समुदायों को पहले ही विस्थापन का दंश झेलने के लिए मजबूर किया है। ऐसे में व्यापारियों के साथ यह व्यवहार स्थानीय असंतोष को और बढ़ा सकता है।

*आगे की राह* बैलाडीला व्यापारी संघ ने स्पष्ट कर दिया है कि वे न तो दबाव में आएँगे और न ही अपनी जमीन छोड़ेंगे। प्रतिनिधि मंडल के जरिए यह मामला अब उच्च स्तर पर उठाया जाएगा। अगर सरकार और प्रशासन इस मुद्दे का संवेदनशीलता से समाधान नहीं करते, तो यह विवाद कोर्ट तक जा सकता है, जिससे क्षेत्र में सामाजिक और राजनीतिक तनाव बढ़ सकता है।

इस बीच, बबलू सिद्दीकी जैसे नेताओं की भावुक अपील और व्यापारियों की एकजुटता ने इस मुद्दे को जनआंदोलन का रूप दे दिया है। यह देखना होगा कि क्या सरकार और प्रशासन इस मामले में संवाद और मुआवजे के रास्ते पर चलते हैं, या यह विवाद और गहराता है।

*निष्कर्ष:* किरंदुल का यह मामला केवल एक प्रशासनिक नोटिस का नहीं, बल्कि विश्वासघात और ऐतिहासिक अन्याय का प्रतीक है। व्यापारियों की यह लड़ाई न केवल उनकी आजीविका की रक्षा के लिए है, बल्कि उस विरासत को बचाने की कोशिश है, जिसे उनके पूर्वजों ने एनएमडीसी और रेलवे के वादों पर भरोसा करके बनाया था।

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