*अब नहीं तो कब?” किरंदुल में गूंजा जनता का नारा, रेलवे भूमि विवाद ने उजागर किया नेताओं का ‘वादा-खिलाफी’ का खेल*
छत्तीसगढ़ के किरंदुल कस्बे में आज एक नारा हर गली, हर मोहल्ले में गूंज रहा है—”अब नहीं तो कब?” यह नारा अब केवल संविधान की पुकार नहीं रहा, बल्कि किरंदुल की जनता की उस पीड़ा का प्रतीक बन गया है, जो दशकों से अपने आशियाने को बचाने की जद्दोजहद में लगी है। यहाँ के लोग, जो पिछले 60 वर्षों से रेलवे, वन, और नजूल की जमीन पर कच्चे पक्के घर बनाकर गुजर-बसर कर रहे हैं, आज अपने ही नेताओं के वादों और रेलवे के नोटिस के बीच पिस रहे हैं।
*किरंदुल: एक कस्बा, जहाँ जमीन का मालिकाना हक है सपना*
किरंदुल, एक ऐसा कस्बा जो रेलवे और वन भूमि पर बसा है, यहाँ की अधिकांश आबादी दशकों से अपने घरों में रह रही है। ये लोग न केवल नगरपालिका को संपत्ति कर चुकाते हैं, बल्कि नल जल कर, समेकित कर, और बिजली बिल का भुगतान भी नियमित रूप से करते हैं। फिर भी, उनके पास अपनी जमीन का मालिकाना हक नहीं है। यहाँ के लोग उस दिन का इंतज़ार कर रहे हैं, जब उन्हें उनके घर का पट्टा मिलेगा, और वे बिना डर के अपने आशियाने में रह सकेंगे।
*केदार कश्यप का वादा: उम्मीद की किरण या चुनावी जुमला?*
हाल ही में हुए नगरपालिका चुनावों में छत्तीसगढ़ के वन मंत्री और भाजपा नेता केदार कश्यप ने किरंदुल की जनता के सामने एक बड़ा वादा किया था। उन्होंने ऐलान किया कि जो भी व्यक्ति नल जल कर, समेकित कर, और बिजली कर जमा कर रहा है, उसे जमीन का मालिकाना हक और पट्टा दिया जाएगा। इस घोषणा ने किरंदुल के लोगों में एक नई उम्मीद जगाई। दशकों से अनिश्चितता के साये में जी रही जनता को लगा कि अब उनका सपना सच होने वाला है।
लेकिन यह उम्मीद जल्द ही टूटने लगी। चुनाव खत्म होते ही, और भाजपा की सत्ता स्थापित होने के बाद, यह वादा हवा-हवाई सा प्रतीत होने लगा।
*रेलवे का नोटिस: सपनों पर चोट*
हैरानी की बात तो यह है कि केदार कश्यप के इस वादे के ठीक एक हफ्ते बाद, रेलवे ने किरंदुल के कुछ निवासियों को नोटिस जारी कर दिया। नोटिस में कहा गया कि वे 7 दिनों के भीतर रेलवे की जमीन खाली करें, वरना कार्रवाई की जाएगी। यह नोटिस उन लोगों के लिए किसी सदमे से कम नहीं था, जो न केवल कर चुका रहे हैं, बल्कि दशकों से यहाँ बसे हुए हैं।
यह नोटिस न केवल रेलवे और स्थानीय प्रशासन के बीच तालमेल की कमी को दर्शाता है, बल्कि यह सवाल भी उठाता है कि क्या नेताओं के वादे केवल चुनाव जीतने के लिए किए जाते हैं? क्या किरंदुल की जनता के साथ केवल वोट बैंक की राजनीति हो रही है?”
*अब नहीं तो कब?”*
*जनता का सवाल* किरंदुल की जनता आज अपने नेताओं से सवाल पूछ रही है—”अब नहीं तो कब?” जब केंद्र से लेकर राज्य और स्थानीय स्तर तक भाजपा की सत्ता है, तब भी अगर किरंदुल के लोगों को उनके हक नहीं मिल रहे, तो आखिर यह हक कब मिलेगा? लोग पूछ रहे हैं कि क्या नेताओं को गरीबों की जिंदगी की कोई कद्र नहीं? क्या उनके लिए जनता का जीवन केवल चुनावी खेल का हिस्सा है?
केदार कश्यप के वादे ने जनता में जो उम्मीद जगाई थी, वह अब टूटने की कगार पर है। लोग कह रहे हैं कि अगर अब, जब सत्ता में एक ही पार्टी का दबदबा है, उनके हक की बात नहीं हो सकती, तो फिर कब होगी? यह सवाल न केवल किरंदुल की जनता का है, बल्कि देश के हर उस नागरिक का है, जो नेताओं के झूठे वादों का शिकार हो रहा है।
*रेलवे भूमि विवाद: एक पुरानी समस्या*
रेलवे भूमि पर अतिक्रमण का मुद्दा नया नहीं है। देश भर में रेलवे की लाखों एकड़ जमीन पर लोग बसे हुए हैं, और कई जगहों पर यह मामला अदालतों तक पहुँचा है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कई बार रेलवे को अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए हैं, लेकिन साथ ही यह भी कहा है कि बिना पुनर्वास योजना के लोगों को बेघर करना उचित नहीं।
किरंदुल में भी यही स्थिति है। यहाँ के लोग दशकों से बसे हैं, और नगरपालिका द्वारा कर वसूलने के कारण उन्हें यह भरोसा था कि उनकी स्थिति वैध है। लेकिन रेलवे का नोटिस इस भरोसे को तोड़ रहा है।
*नेताओं की दोहरी नीति?*
किरंदुल का यह मामला नेताओं की दोहरी नीति को भी उजागर करता है। एक तरफ, चुनावी सभाओं में बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, और दूसरी तरफ, उन वादों को पूरा करने की कोई ठोस योजना नहीं दिखती। किरंदुल में रेलवे के नोटिस ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या केदार कश्यप का वादा केवल एक चुनावी जुमला था? क्या यह घोषणा केवल वोट बटोरने के लिए की गई थी?
जबकि सुप्रीम कोर्ट ने निजी जमीन पर 12 साल के कब्जे को मालिकाना हक मानने की बात कही है, सरकारी जमीन पर यह नियम लागू नहीं होता। फिर भी, किरंदुल के लोग, जो 60 साल से अधिक समय से यहाँ बसे हैं, यह पूछ रहे हैं कि आखिर उनके साथ यह अन्याय क्यों?
*जनता की माँग: हक दो, वादे नहीं*
किरंदुल की जनता अब और वादों पर भरोसा नहीं करना चाहती। वे माँग कर रहे हैं कि उन्हें उनकी जमीन का मालिकाना हक दिया जाए, जैसा कि केदार कश्यप ने वादा किया था। लोग चाहते हैं कि रेलवे और प्रशासन के बीच समन्वय स्थापित हो, ताकि उन्हें बेघर होने का डर न सताए।
स्थानीय निवासी रामू साहू (बदला हुआ नाम) कहते हैं, “हमने हर कर चुकाया, हर नियम माना। फिर भी हमें नोटिस मिल रहा है। अगर अब हमें हमारा हक नहीं मिलेगा, तो कब मिलेगा? नेता जी, अब नहीं तो कब?”
*आगे क्या?* किरंदुल का यह विवाद अब केवल स्थानीय मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह देश भर में सरकारी जमीन पर बसे लोगों की समस्या को दर्शाता है। यह मामला नेताओं की जवाबदेही, प्रशासनिक लापरवाही, और जनता के हक की लड़ाई का प्रतीक बन गया है।
क्या केदार कश्यप अपने वादे को पूरा करेंगे? क्या रेलवे और प्रशासन किरंदुल के लोगों को उनका हक देगा, या फिर यह नारा—”अब नहीं तो कब?”—केवल हवा में गूंजता रहेगा? यह सवाल अब हर उस व्यक्ति के मन में है, जो अपने आशियाने को बचाने की जंग लड़ रहा है।
*जनता का सवाल साफ है: नेता जी, अब नहीं तो कब?*

