*बैलाडीला के जंगल में भाई बना भाई का दुश्मन: दंतेवाड़ा में व्यापारियों के एकाधिकार और ग्रामीणों की आजीविका पर संकट*
छत्तीसगढ़ का दंतेवाड़ा जिला, जो अपनी प्राकृतिक संपदा और घने जंगलों के लिए जाना जाता है, आज एक नए संकट के दौर से गुजर रहा है। बैलाडीला के जंगलों में महुआ, तोरा, आम, इमली, चार और अन्य वनोपज ग्रामीणों की आजीविका का प्रमुख स्रोत रहे हैं। ये फल-फूल न केवल ग्रामीणों के लिए आय का जरिया हैं, बल्कि उनकी संस्कृति और जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा भी हैं। पहले ग्रामीण इन वनोपज को शहरों के बाजारों तक ले जाकर बेचते थे, जिससे न केवल उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होती थी, बल्कि शहर और गांव के बीच एक सांस्कृतिक और आर्थिक सेतु भी बनता था। लेकिन अब यह तस्वीर बदल रही है। व्यापारियों के बढ़ते एकाधिकार और गांवों में उनकी घुसपैठ ने न केवल ग्रामीणों की आजीविका को प्रभावित किया है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी तोड़ने का काम किया है। इसका सबसे ताजा उदाहरण है एक ऐसी घटना, जिसमें भाई ने भाई की हत्या की कोशिश की।
*भाई ने भाई पर किया जानलेवा हमला:*व्यापारियों के एकाधिकार का नतीजा*
दो दिन पहले दंतेवाड़ा के एक गांव में गल्ला व्यापारियों के बीच वनोपज की खरीद को लेकर विवाद इतना बढ़ गया कि एक भाई ने अपने ही सगे भाई पर हत्या का प्रयास कर दिया। जानकारी के अनुसार, दोनों भाई अलग-अलग व्यापारियों के लिए वनोपज की खरीद में शामिल थे। गांव में खरीद के अधिकार को लेकर पहले दोनों के बीच कहासुनी हुई, जो जल्द ही हाथापाई में बदल गई। गुस्से में आकर एक भाई ने अपने पिकअप वाहन से विपरीत दिशा से बाइक पर आ रहे अपने भाई को जानबूझकर टक्कर मार दी। इस हमले में पीड़ित भाई का सिर फट गया और उसे मामूली चोटें आईं। पुलिस ने इस मामले को एक्सीडेंट के रूप में दर्ज किया है और जांच शुरू कर दी है। यह घटना केवल एक पारिवारिक विवाद नहीं, बल्कि उस गहरे सामाजिक और आर्थिक बदलाव का प्रतीक है, जो दंतेवाड़ा के गांवों में हो रहा है।
*ग्रामीणों की आजीविका पर व्यापारियों का कब्जा*
दंतेवाड़ा के ग्रामीण पहले अपनी वनोपज को शहर के हाट-बाजारों में ले जाकर बेचते थे। इस प्रक्रिया में वे न केवल बेहतर दाम पाते थे, बल्कि शहर की संस्कृति, बोली-भाषा, खान-पान और रहन-सहन से भी जुड़ते थे। शहर में उनकी उपस्थिति से स्थानीय व्यापार को भी बढ़ावा मिलता था, क्योंकि ग्रामीण दुकानों से घरेलू सामान, कपड़े और अन्य जरूरी चीजें खरीदते थे। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह व्यवस्था बदल गई है। अब व्यापारी खुद गांवों में पहुंचकर वनोपज की खरीद करने लगे हैं। ये व्यापारी न केवल मनमाने दामों पर खरीद करते हैं, बल्कि गांवों में अपना एकाधिकार भी स्थापित कर रहे हैं।
जानकारी के अनुसार, एक व्यापारी जिस गांव में खरीद शुरू करता है, वहां दूसरा व्यापारी प्रवेश नहीं कर सकता। इससे ग्रामीणों को अपनी उपज बेचने के लिए सीमित विकल्प मिलते हैं और वे कम दामों पर अपनी मेहनत की कमाई बेचने को मजबूर हो जाते हैं। पहले जहां ग्रामीण शहर जाकर अपनी उपज का उचित मूल्य पाते थे, अब वे गांव में ही व्यापारियों के शोषण का शिकार हो रहे हैं। इससे न केवल उनकी आय घटी है, बल्कि शहर और गांव के बीच का वह सेतु भी टूट रहा है, जो ग्रामीणों को आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त बनाता था।
*नक्सलियों का भय खत्म, लेकिन शुरू हुई खुली लूट?*
दंतेवाड़ा जिला लंबे समय तक नक्सल प्रभावित क्षेत्र रहा है। उन गांवों में, जहां पहले नक्सलियों के डर से लोग दिन में भी जाने से कतराते थे, अब ग्रामीण सुबह 5 बजे से शाम 5 बजे तक बिना किसी भय के वनोपज इकट्ठा करने और बेचने का काम कर रहे हैं। सरकार और सुरक्षा बलों की मेहनत से नक्सलवाद पर काफी हद तक काबू पा लिया गया है। हाल के महीनों में दंतेवाड़ा-बीजापुर सीमा पर हुए कई एनकाउंटर में नक्सलियों को भारी नुकसान हुआ है। उदाहरण के लिए, अप्रैल 2025 में भैरमगढ़ इलाके में पुलिस ने तीन नक्सलियों को मार गिराया था।लेकिन नक्सलियों के कमजोर पड़ने के साथ ही एक नया खतरा उभर रहा है।
व्यापारियों ने इस शांति का फायदा उठाकर ग्रामीणों की आजीविका पर कब्जा करना शुरू कर दिया है। गांवों में उनकी मनमानी और एकाधिकार ने ग्रामीणों को आर्थिक रूप से कमजोर किया है। जहां पहले नक्सलियों का डर ग्रामीणों को जंगलों तक सीमित रखता था, अब व्यापारियों की लूट उन्हें अपनी ही उपज का उचित मूल्य पाने से रोक रही है। यह स्थिति ग्रामीणों में असंतोष और तनाव को बढ़ा रही है, जिसका परिणाम भाई-भाई के बीच हुए इस हिंसक विवाद जैसे मामलों में देखा जा सकता है।
*ग्रामीणों का फायदा या नुकसान?*
व्यापारियों के गांवों में प्रवेश से कुछ ग्रामीणों को शुरुआती सुविधा जरूर मिली है। उन्हें अब अपनी उपज को शहर तक ले जाने की मेहनत नहीं करनी पड़ती। लेकिन इसके बदले में उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। व्यापारी मनमाने दाम तय करते हैं, जिससे ग्रामीणों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिलता। इसके अलावा, ग्रामीण अब हाट-बाजारों में भी सामान खरीदने जाते हैं, जहां उन्हें शहर की तुलना में सीमित विकल्प और ऊंचे दामों का सामना करना पड़ता है।
पहले ग्रामीणों का शहर आना-जाना न केवल आर्थिक, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण था। वे शहर की प्रगति से जुड़ते थे, नई तकनीकों और अवसरों के बारे में जानते थे। लेकिन अब व्यापारियों ने इस प्रक्रिया को उलट दिया है। ग्रामीण गांवों तक सिमट रहे हैं, और शहरों से उनका संपर्क कम हो रहा है। यह स्थिति ग्रामीणों को आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़ा बना रही है।


