*किरंदुल में सरकारी शराब दुकानों की बदहाली और कोचियों के पास ब्रांडेड बियर का जमावड़ा: आखिर क्या है इस गोरखधंधे का सच*

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*किरंदुल में सरकारी शराब दुकानों की बदहाली और कोचियों के पास ब्रांडेड बियर का जमावड़ा: आखिर क्या है इस गोरखधंधे का सच*

 

किरंदुल, दंतेवाड़ा: छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के किरंदुल में सरकारी शराब दुकानों की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। विश्वसनीय सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार, किरंदुल की सरकारी शराब दुकानों में न तो बियर की कोई बोतल उपलब्ध है और न ही कई लोकप्रिय शराब के ब्रांड। दूसरी ओर, स्थानीय कोचियों (अवैध शराब विक्रेताओं) के पास हर तरह के ब्रांड की शराब और ठंडी बियर आसानी से मिल रही है। यह विडंबना न केवल सवाल खड़े करती है, बल्कि जिला आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली और संभावित मिलीभगत पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है।

 

*कोचियों के पास कहां से आ रही है शराब?*

 

स्थानीय लोगों और शराब प्रेमियों का कहना है कि सरकारी दुकानों में चार दिनों से बियर का कोई ब्रांड उपलब्ध नहीं है। एक शराब प्रेमी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “किरंदुल की सरकारी दुकान में न बियर मिलती है और न ही कई मशहूर ब्रांड की शराब। मजबूरी में हमें कोचियों के पास जाना पड़ता है, जहां हर ब्रांड की ठंडी बियर और शराब 50 से 80 रुपये अधिक दाम पर मिल जाती है। आखिर यह शराब कोचियों तक पहुंचती कैसे है, जब सरकारी दुकानों में स्टॉक ही नहीं है?”

 

सवाल यह है कि क्या सरकारी दुकानों से चोरी-छुपे शराब की सप्लाई कोचियों तक पहुंचाई जा रही है? या फिर यह अवैध शराब का कोई बड़ा नेटवर्क है, जो जिला आबकारी विभाग की नाक के नीचे फल-फूल रहा है? सूत्रों का दावा है कि दंतेवाड़ा जिले के छोटे-मोटे गांवों, कस्बों और कोचियों के पास न केवल हर ब्रांड की शराब उपलब्ध है, बल्कि वह भी ऐसी गुणवत्ता में, जो सरकारी दुकानों में दुर्लभ है।

 

*आबकारी विभाग की चुप्पी और संदिग्ध भूमिका*

 

जिला आबकारी विभाग की इस मामले में चुप्पी कई सवालों को जन्म देती है। क्या विभाग को इस अवैध कारोबार की जानकारी नहीं है? या फिर जानबूझकर आंखें मूंद ली गई हैं? स्थानीय लोगों का आरोप है कि आबकारी विभाग के कुछ अधिकारियों की मिलीभगत के बिना इतना बड़ा गोरखधंधा संभव नहीं है। एक सूत्र ने बताया, “कोचियों के पास ठंडी बियर और महंगे ब्रांड की शराब का स्टॉक देखकर लगता है कि यह माल सीधे सरकारी गोदामों या दुकानों से लीक हो रहा है। आबकारी विभाग को सब पता है, फिर भी कोई कार्रवाई नहीं हो रही।”

 

*बीजेपी सरकार और शराब नीति पर सवाल*

 

इस पूरे प्रकरण में बीजेपी सरकार भी सवालों के घेरे में है। चुनावी दौर में बीजेपी ने कांग्रेस की शराब नीति और कथित “गंगाजल की कसम” को जमकर भुनाया था। बीजेपी ने वादा किया था कि उनकी सरकार शराब की बिक्री को नियंत्रित करेगी और अवैध कारोबार पर लगाम लगाएगी। लेकिन स्थानीय महिलाओं का आरोप है कि बीजेपी सरकार बनने के बाद न केवल शराब की दुकानें बढ़ रही हैं, बल्कि अवैध शराब का कारोबार भी बेरोकटोक चल रहा है। एक महिला ने कहा, “बीजेपी ने वादा किया था कि शराब के ठेके कम होंगे, लेकिन अब नए ठेके खुल रहे हैं। कोचियों का धंधा तो और बढ़ गया है।”

 

*सरकारी दुकानों की लापरवाही और कोचियों का बोलबाला*

 

किरंदुल की सरकारी शराब दुकानों की बदहाली का आलम यह है कि ग्राहकों को मूलभूत ब्रांड तक उपलब्ध नहीं हो रहे। एक अन्य स्थानीय निवासी ने बताया, “सरकारी दुकान में स्टॉक की कमी का बहाना बनाया जाता है, लेकिन कोचियों के पास हर ब्रांड की बियर और शराब का ढेर लगा रहता है। यह साफ है कि कहीं न कहीं बड़ा खेल चल रहा है।”

 

सवाल उठता है कि क्या सरकारी दुकानों से शराब की चोरी हो रही है? क्या आबकारी विभाग के कुछ कर्मचारी इस अवैध सप्लाई में शामिल हैं? या फिर यह एक संगठित गिरोह का हिस्सा है, जो पड़ोसी राज्यों से शराब की तस्करी कर रहा है? इन सवालों का जवाब न तो आबकारी विभाग दे रहा है और न ही स्थानीय प्रशासन।

 

*अवैध शराब का सरगना कौन*

 

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस अवैध शराब कारोबार का सरगना कौन है? कोचियों तक शराब की सप्लाई का स्रोत क्या है? क्या यह तस्करी का नेटवर्क है, जो पड़ोसी राज्यों जैसे छत्तीसगढ़, ओडिशा या आंध्र प्रदेश से शराब ला रहा है? या फिर यह सरकारी दुकानों से ही चोरी-छुपे माल की सप्लाई का नतीजा है? सूत्रों का कहना है कि इस कारोबार में बड़े माफियाओं का हाथ हो सकता है, जिनके तार प्रशासन और आबकारी विभाग के कुछ लोगों से जुड़े हैं।

 

*जनता की मांग:*

 

जांच और कार्रवाईकिरंदुल और दंतेवाड़ा के निवासियों ने इस मामले में सख्त कार्रवाई की मांग की है। लोगों का कहना है कि अगर आबकारी विभाग इस अवैध कारोबार को रोकने में नाकाम है, तो सरकार को हस्तक्षेप कर एक उच्चस्तरीय जांच कमेटी गठित करनी चाहिए। साथ ही, सरकारी दुकानों में स्टॉक की कमी और कोचियों के पास अतिरिक्त माल की उपलब्धता की गहन जांच होनी चाहिए।

 

*निष्कर्ष* किरंदुल की सरकारी शराब दुकानों की बदहाली और कोचियों के पास ब्रांडेड शराब का जमावड़ा न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि एक बड़े अवैध कारोबार की ओर भी इशारा करता है। आबकारी विभाग की चुप्पी, बीजेपी सरकार की शराब नीति पर सवाल, और कोचियों का बढ़ता दबदबा यह साबित करता है कि दंतेवाड़ा में शराब का गोरखधंधा बेरोकटोक चल रहा है।

 

अब सवाल यह है कि क्या सरकार और प्रशासन इस मामले में कोई ठोस कदम उठाएंगे, या फिर कोचियों का यह धंधा यूं ही फलता-फूलता रहेगा?

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