*बस्तर संभाग में भ्रष्टाचार का बोलबाला: वर्षों से एक जगह जमे अधिकारी और सरकारी फंड का दुरुपयोग*
बस्तर संभाग छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अनियमितताओं का एक नया चेहरा सामने आया है। यहाँ विभिन्न विभागों में वर्षों से एक ही जगह पर तैनात अधिकारियों और कर्मचारियों की मनमानी के चलते सरकारी कार्यों में लापरवाही और फंड के दुरुपयोग की शिकायतें आम हो गई हैं। बस्तर संभाग, जो अपने प्राकृतिक सौंदर्य और आदिवासी संस्कृति के लिए जाना जाता है, अब भ्रष्टाचार के दलदल में फंसता नजर आ रहा है। सूत्रों के मुताबिक, कई बड़े और छोटे अधिकारी व कर्मचारी न सिर्फ लंबे समय से एक ही जगह पर जमे हुए हैं, बल्कि तबादले के बावजूद पुराने पदों पर बने रहकर अनुचित लाभ उठा रहे हैं।
*एक ही जगह पर चिपके अधिकारी, भ्रष्टाचार की जड़*
बस्तर संभाग के सात जिलों – बस्तर, कांकेर, कोंडागांव, नारायणपुर, दंतेवाड़ा, बीजापुर और सुकमा – में कार्यरत कई अधिकारियों और कर्मचारियों की तैनाती लंबे समय से एक ही स्थान पर बनी हुई है। प्रशासनिक नियमों के अनुसार, किसी भी कर्मचारी या अधिकारी को एक जगह पर लंबे समय तक रखने से कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और निष्पक्षता प्रभावित होती है। लेकिन यहाँ स्थिति उलट है। कुछ अधिकारी, जिनका तबादला अन्य जिलों या संभागों में हो चुका है, फिर भी पुरानी जगह पर बड़े पदों पर बने हुए हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि ये अधिकारी अपनी राजनीतिक पहुँच और प्रभाव का इस्तेमाल कर तबादला रुकवाने या पुरानी जगह पर बने रहने में सफल हो रहे हैं। इस दौरान भ्रष्टाचार की घटनाएँ बढ़ रही हैं और सरकारी योजनाओं का लाभ आम जनता तक नहीं पहुँच पा रहा।
*सरकारी फंड का दुरुपयोग और मनमानी*
बस्तर संभाग में चल रही विभिन्न सरकारी योजनाओं और परियोजनाओं के लिए हर साल करोड़ों रुपये का बजट आवंटित किया जाता है। लेकिन इन फंड्स का सही उपयोग न होने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क निर्माण, स्कूल भवनों का जीर्णोद्धार, और स्वास्थ्य सुविधाओं के विकास जैसे कार्यों में भारी अनियमितताएँ देखी गई हैं। कई जगहों पर प्रोजेक्ट अधूरे पड़े हैं, तो कहीं गुणवत्ता इतनी खराब है कि वह उपयोग करने लायक भी नहीं है। जानकारों का कहना है कि लंबे समय तक एक जगह जमे अधिकारियों की मिलीभगत से ठेकेदारों को लाभ पहुँचाया जा रहा है, जिससे सरकारी खजाने को चपत लग रही है।
*हॉस्टलों में अधीक्षकों की मनमानी*
बस्तर संभाग के कई हॉस्टलों में भी स्थिति चिंताजनक है। यहाँ एक अधीक्षक के जिम्मे दो-दो हॉस्टल सौंपे गए हैं, जिससे व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है। सवाल यह उठता है कि एक अधीक्षक रात के समय दो अलग-अलग हॉस्टलों में एक साथ कैसे मौजूद रह सकता है? इसका परिणाम यह है कि हॉस्टल में रहने वाले छात्र-छात्राओं की सुरक्षा और सुविधाओं पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। कई हॉस्टलों में भोजन की गुणवत्ता खराब होने, समय पर सुविधाएँ न मिलने और रखरखाव के अभाव की शिकायतें सामने आई हैं। अभिभावकों का कहना है कि अधीक्षकों की लापरवाही के कारण बच्चों का भविष्य खतरे में पड़ रहा है।
*स्थानीय लोगों का गुस्सा*
बस्तर संभाग के निवासियों में इस स्थिति को लेकर गहरा आक्रोश है। एक स्थानीय निवासी, रमेश कोर्राम (बदला हुआ नाम), ने बताया, “यहाँ के अधिकारी अपनी मर्जी से काम करते हैं। सड़क बनानी हो या स्कूल का काम, सब कागजों में पूरा हो जाता है, लेकिन हकीकत में कुछ नहीं होता। जो अधिकारी तबादले के बाद भी यहाँ डटे हैं, वे अपने निजी स्वार्थ के लिए काम कर रहे हैं।” एक अन्य व्यक्ति ने कहा कि हॉस्टलों की दुर्दशा देखकर लगता है कि सरकार को यहाँ के बच्चों की जिंदगी से कोई मतलब नहीं है।
*प्रशासन की चुप्पी*
इस मामले में जिला प्रशासन और संभागीय अधिकारियों से कोई ठोस जवाब नहीं मिला है। जब इस संवाददाता ने कुछ अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की, तो उन्होंने या तो बात करने से इनकार कर दिया या मामले को टाल दिया। यह चुप्पी सवाल उठाती है कि क्या प्रशासन इस भ्रष्टाचार को रोकने में असमर्थ है या फिर इसमें उनकी भी सहमति है?
*माँग उठी कार्रवाई की*
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों ने इस स्थिति पर कड़ा रुख अपनाया है। सामाजिक कार्यकर्ता सुनिता नेताम ने कहा, “बस्तर में भ्रष्टाचार अब एक खुला खेल बन गया है। सरकार को तुरंत ऐसे अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए जो नियमों को ताक पर रखकर मनमानी कर रहे हैं।” उन्होंने यह भी माँग की कि हॉस्टलों में अधीक्षकों की नियुक्ति और व्यवस्था को दुरुस्त किया जाए ताकि बच्चों को सुरक्षित माहौल मिल सके।
*आगे क्या?*
बस्तर संभाग में बढ़ते भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही को देखते हुए यह जरूरी हो गया है कि राज्य सरकार इस मामले में सख्त कदम उठाए। लंबे समय से एक जगह जमे अधिकारियों के तबादले को लागू करना, सरकारी फंड के उपयोग की जाँच कराना और हॉस्टलों की स्थिति सुधारना कुछ ऐसे कदम हो सकते हैं जो इस संभाग को भ्रष्टाचार के दलदल से बाहर निकाल सकें। अगर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो बस्तर का विकास और यहाँ के लोगों का भरोसा दोनों ही दाँव पर लग सकते हैं।फिलहाल, बस्तर की जनता इंतजार में है कि सरकार इस मुद्दे पर क्या कदम उठाती है। यह खबर न सिर्फ प्रशासन के लिए एक चेतावनी है, बल्कि उन सभी के लिए सबक भी है जो सरकारी तंत्र का हिस्सा होकर जनता के हितों की अनदेखी कर रहे हैं।

