*किरंदुल-बचेली में जमीन के मालिकाना हक का मुद्दा फिर सुर्खियों में वन मंत्री की घोषणा के बाद बढ़ी उम्मीदें किरंदुल -बचेली (छत्तीसगढ़)*

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*किरंदुल-बचेली में जमीन के मालिकाना हक का मुद्दा फिर सुर्खियों में वन मंत्री की घोषणा के बाद बढ़ी उम्मीदें किरंदुल -बचेली (छत्तीसगढ़)*

किरंदुल और बचेली, ये दो शहर जो वन भूमि, नजुल भूमि और रेलवे भूमि पर बसे हैं, यहाँ पिछले 50 सालों से अधिक समय से लोग कच्चे-पक्के मकानों में अपना जीवन बसा रहे हैं। लेकिन इनकी जमीन का मालिकाना हक आज भी एक अनसुलझा सवाल बना हुआ है। वन विभाग, रेलवे और नजुल प्रशासन की ओर से समय-समय पर इन बस्तियों को खाली करने के नोटिस जारी होते रहते हैं, जिससे यहाँ के निवासियों के सामने हमेशा अनिश्चितता बनी रहती है। सवाल उठता है कि जो लोग दशकों से यहाँ रह रहे हैं, वे अपना आशियाना छोड़कर कहाँ जाएँ?

 

*चुनावी वादों का पुराना इतिहास*

 

हर चुनाव में किरंदुल-बचेली के निवासियों के लिए जमीन का पट्टा दिलाने का वादा राजनीतिक दलों का प्रमुख मुद्दा बनता है। सभी दल यहाँ की जनता से मालिकाना हक का भरोसा दिलाते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही ये वादे हवा में गायब हो जाते हैं। यहाँ के लोगों का कहना है कि वे हर बार उम्मीद लगाते हैं, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात रहता है।

 

*वन मंत्री केदार कश्यप की घोषणा*

 

हाल ही में हुए नगरपालिका चुनाव के दौरान एक आम सभा में छत्तीसगढ़ के वन मंत्री केदार कश्यप ने इस मुद्दे पर बड़ी घोषणा की। उन्होंने कहा, “चाहे जमीन वन विभाग की हो, रेलवे की हो या नजुल भूमि हो, जो भी व्यक्ति नगरपालिका में कर जमा करता है, उसे पट्टा दिया जाएगा।” इस बयान से किरंदुल-बचेली के निवासियों में एक नई उम्मीद जगी है। लोगों का मानना है कि अगर यह वादा पूरा होता है, तो दशकों पुरानी समस्या का हल निकल सकता है।

*क्या होगा भविष्य?*

 

हालांकि, इस घोषणा के बाद अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि क्या यह वादा हकीकत में बदलेगा या फिर पहले की तरह केवल कागजी बात बनकर रह जाएगा।

 

निवासियों का कहना है कि वे लंबे समय से अपने घरों को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं और अब सरकार से ठोस कदम की उम्मीद कर रहे हैं। दूसरी ओर, वन विभाग और रेलवे के अधिकारियों का कहना है कि ऐसी जमीनों पर पट्टा देना कानूनी रूप से जटिल हो सकता है।किरंदुल-बचेली के इस मुद्दे ने एक बार फिर राज्य सरकार के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।

 

क्या वन मंत्री की घोषणा से यहाँ के लोगों को उनका हक मिलेगा, या यह भी एक और चुनावी जुमला साबित होगा? यह देखना बाकी है।

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