*किरंदुल में भगवान जगन्नाथ की बहुडा यात्रा: गुड़िचा मंदिर से जगन्नाथ मंदिर की घर वापसी में उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब*
किरंदुल (दंतेवाड़ा, छत्तीसगढ़)। बस्तर अंचल की आस्था का महापर्व रथ यात्रा अपने चरम पर पहुंच गया। गुड़िचा मंदिर (मौसी के घर) में लगभग नौ दिनों के दिव्य प्रवास के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की बहुडा यात्रा (घर वापसी) निकली। तीनों रथों को खींचते श्रद्धालुओं का हुजूम सड़कों पर छा गया। जय जगन्नाथ के जयकारों से पूरा किरंदुल गूंज उठा।
यह दृश्य पुरी की विश्वप्रसिद्ध रथ यात्रा की याद दिला रहा था। किरंदुल में ओडिया समुदाय और स्थानीय भक्तों द्वारा साल 2007 से नियमित रूप से आयोजित यह यात्रा छत्तीसगढ़ में जगदलपुर के बाद सबसे महत्वपूर्ण रथ यात्राओं में गिनी जाती है। हर वर्ष 20-25 हजार से अधिक श्रद्धालु इसमें शामिल होते हैं और संख्या साल-दर-साल बढ़ रही है। इस बार भी गुड़िचा मंदिर से मुख्य जगन्नाथ मंदिर की ओर रथ खींचने में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ी। महिला-पुरुष, बच्चे-बुजुर्ग सभी रस्सियों को पकड़कर पुण्य लाभ लेने के लिए आगे बढ़े। भजन-कीर्तन, शंखध्वनि और झांझ-मंजीरों की थाप ने माहौल को भक्तिमय बना दिया।
बहुडा यात्रा का महत्व
पुरी परंपरा के अनुसार भगवान जगन्नाथ अपनी मौसी गुड़िचा के घर जाते हैं और कुछ दिन वहां रहकर लौटते हैं। किरंदुल में भी यही परंपरा निभाई जाती है। गुड़िचा मंदिर में विश्राम के बाद रथों को वापस मुख्य मंदिर की ओर खींचा जाता है। भक्त मानते हैं कि रथ की रस्सी छूने या खींचने से पापों का नाश होता है और मोक्ष का मार्ग खुलता है। यात्रा के दौरान सुरक्षा, पानी, चिकित्सा सुविधा और यातायात व्यवस्था प्रशासन तथा आयोजक समिति द्वारा सुनिश्चित की गई।
किरंदुल जगन्नाथ सेवा समिति और स्थानीय उत्कल समाज के प्रयासों से यह आयोजन साल-दर-साल भव्य होता जा रहा है। 2024 में नवनिर्मित जगन्नाथ मंदिर में ओडिशा से लाई गई चतुर्धा प्रतिमाओं की प्राण-प्रतिष्ठा के बाद आस्था और गहरी हुई है। यहां बसे सैकड़ों ओडिया परिवारों के साथ स्थानीय आदिवासी और अन्य समुदायों के लोग भी बड़ी संख्या में जुड़ते हैं, जिससे यह सिर्फ धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक एकता का पर्व भी बन गया है।
भीड़ का विश्लेषण
बहुडा यात्रा में उमड़ी भीड़ दर्शाती है कि बस्तर जैसे दूरदराज क्षेत्र में भी भगवान जगन्नाथ की आस्था कितनी जीवंत है। पुरी से सैकड़ों किलोमीटर दूर होने के बावजूद किरंदुल में रथ यात्रा का आयोजन पुरी जैसी परंपराओं—पहांडी, रथ खींचना, भोग-प्रसाद—को बनाए रखता है। गर्मी और बरसात के मौसम में भी श्रद्धालुओं का उत्साह कम नहीं हुआ। युवाओं से लेकर वृद्धों तक सभी ने सक्रिय भागीदारी की। यह आयोजन पर्यटन, स्थानीय व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को भी बढ़ावा देता है।
भगवान जगन्नाथ की घर वापसी के साथ रथ यात्रा का यह चरण संपन्न हो गया। अब भक्त महाप्रसाद ग्रहण कर और दर्शन करके संतुष्ट लौट रहे हैं। जय जगन्नाथ!

