*किरंदुल-विशाखापट्टनम रेल सेवा ठप: रेल नहीं चलने से यात्री परेशान, मालगाड़ी बन रही एकमात्र सहारा*
किरंदुल, छत्तीसगढ़: दक्षिण छत्तीसगढ़ के किरंदुल और विशाखापट्टनम के बीच रेल यात्रा करने वाले यात्रियों के लिए एक बड़ी मुसीबत खड़ी हो गई है। पिछले एक से दो महीनों से किरंदुल-विशाखापट्टनम स्पेशल एक्सप्रेस और पैसेंजर ट्रेनें किरंदुल स्टेशन तक पहुंचने में असमर्थ हैं। सूत्रों के मुताबिक, नक्सलियों की धमकियों और रेल मार्ग पर उत्पन्न होने वाली बाधाओं के कारण ये ट्रेनें दंतेवाड़ा तक तो आसानी से चल रही हैं, लेकिन किरंदुल तक का सफर उनके लिए जोखिम भरा बना हुआ है। इस बीच, मालगाड़ियां बिना किसी रुकावट के किरंदुल तक आ-जा रही हैं, जिसे स्थानीय लोग अब यात्रा के लिए एकमात्र विकल्प के रूप में देख रहे हैं।
*यात्रियों की बढ़ती परेशानी*
किरंदुल के निवासियों और नियमित यात्रियों का कहना है कि ट्रेनों की अनुपस्थिति ने उनकी दिनचर्या को बुरी तरह प्रभावित किया है। किरंदुल, जो लौह अयस्क खनन के लिए प्रसिद्ध है, न केवल औद्योगिक गतिविधियों का केंद्र है, बल्कि आसपास के क्षेत्रों से आने-जाने वाले लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशन है।
स्थानीय निवासी रमेश कोर्राम ने बताया, “हमने पिछले दो महीनों से किरंदुल स्टेशन पर कोई पैसेंजर ट्रेन नहीं देखी। दंतेवाड़ा तक तो ट्रेनें चल रही हैं, लेकिन उसके बाद नक्सलियों के डर से रेलवे ने किरंदुल तक सेवा बंद कर दी है। अब हमें मजबूरी में मालगाड़ी का सहारा लेना पड़ रहा है, जो न तो सुरक्षित है और न ही आरामदायक।”
*नक्सलियों का खौफ: रेलवे पर बढ़ता दबाव*
हाल ही में दंतेवाड़ा और किरंदुल के बीच के जंगली इलाकों में नक्सलियों की सक्रियता बढ़ी है, जिसके चलते रेलवे प्रशासन ने यात्रियों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए पैसेंजर ट्रेनों का संचालन सीमित कर दिया। हालांकि, मालगाड़ियां, जो मुख्य रूप से लौह अयस्क और अन्य सामग्रियों को ढोती हैं, अभी भी इस रूट पर निर्बाध रूप से चल रही हैं। रेलवे के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “मालगाड़ियों को नक्सलियों से अपेक्षाकृत कम खतरा है, क्योंकि वे औद्योगिक कार्यों से जुड़ी हैं। लेकिन पैसेंजर ट्रेनों को निशाना बनाए जाने का डर बना रहता है।”
*मालगाड़ी: मजबूरी का सहारा*
पैसेंजर ट्रेनों के अभाव में कुछ स्थानीय लोग और यात्री मालगाड़ियों में सवारी करने को मजबूर हैं। हालांकि, यह न केवल अवैध है, बल्कि बेहद खतरनाक भी है। मालगाड़ियों में यात्रियों के लिए कोई सुविधा नहीं होती, और खुले डिब्बों में सफर करना जानलेवा हो सकता है।
*स्थानीय अर्थव्यवस्था पर असर*
ट्रेनों की अनुपलब्धता का असर न केवल यात्रियों, बल्कि स्थानीय व्यापार और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है। किरंदुल और आसपास के क्षेत्रों के छोटे व्यापारी, जो विशाखापट्टनम से सामान लाने-ले जाने के लिए ट्रेनों पर निर्भर थे, अब सड़क मार्ग का उपयोग करने को मजबूर हैं। सड़क मार्ग न केवल महंगा है, बल्कि समय लेने वाला और असुरक्षित भी है। एक स्थानीय व्यापारी, मोहन साहू, ने कहा, “ट्रेन से सामान लाना आसान और सस्ता था। अब सड़क मार्ग से माल लाने में लागत दोगुनी हो गई है।”
*रेलवे और प्रशासन की चुप्पी*
रेलवे और स्थानीय प्रशासन ने इस मामले पर अभी तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है। यात्रियों का कहना है कि उन्हें कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी जा रही कि ट्रेनें कब से फिर से शुरू होंगी। इस बीच, सुरक्षा बलों ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में अपनी गश्त बढ़ा दी है, लेकिन इसका कोई ठोस परिणाम अभी तक सामने नहीं आया है।
*यात्रियों की मांग: जल्द शुरू हो रेल सेवा*
किरंदुल के लोग और यात्री रेलवे प्रशासन से मांग कर रहे हैं कि जल्द से जल्द पैसेंजर ट्रेनों का संचालन शुरू किया जाए। साथ ही, वे सरकार से नक्सली समस्या का स्थायी समाधान निकालने की अपील कर रहे हैं, ताकि क्षेत्र में शांति और सामान्य स्थिति बहाल हो सके।आगे क्या?
किरंदुल-विशाखापट्टनम रेल मार्ग पर पैसेंजर ट्रेनों की अनुपस्थिति ने न केवल यात्रियों की मुश्किलें बढ़ाई हैं, बल्कि क्षेत्र में नक्सली प्रभाव की गंभीरता को भी उजागर किया है। जब तक इस समस्या का कोई ठोस समाधान नहीं निकलता, मालगाड़ियां ही यात्रियों की मजबूरी बनी रहेंगी। यह स्थिति न केवल रेलवे के लिए, बल्कि पूरे प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती है। क्या किरंदुल के लोग जल्द ही अपनी ट्रेनों को स्टेशन पर देख पाएंगे, या यह इंतज़ार और लंबा खिंचेगा? यह सवाल हर किसी के मन में है।


