*छत्तीसगढ़ में शराबबंदी का वादा: कांग्रेस से लेकर भाजपा तक, क्या सिर्फ चुनावी जुमला*

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*छत्तीसगढ़ में शराबबंदी का वादा: कांग्रेस से लेकर भाजपा तक, क्या सिर्फ चुनावी जुमला*

 

दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़): छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में नशे की समस्या ने एक बार फिर सुर्खियां बटोरी हैं। शराब, गांजा और सूखे नशे की चपेट में नौजवान और बच्चे तेजी से आ रहे हैं। नशे की लत ने न केवल युवा पीढ़ी को बर्बाद करने का खतरा पैदा किया है, बल्कि समाज में एक गंभीर संकट को भी जन्म दिया है। इस बीच, राज्य की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार पर सवाल उठ रहे हैं कि क्या शराबबंदी जैसे बड़े वादे सिर्फ चुनाव जीतने के लिए किए गए दिखावे थे, या फिर इनका कोई ठोस इरादा कभी था ही नहीं?

 

*कांग्रेस का गंगाजल वाला वादा और भाजपा की आलोचना*

 

साल 2018 में जब कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ में सत्ता संभाली, तो पार्टी के नेताओं ने हाथ में गंगाजल लेकर पूर्ण शराबबंदी की कसम खाई थी। यह वादा जनता के बीच खूब चर्चा में रहा और इसे महिलाओं व समाज के बड़े वर्ग का समर्थन भी मिला। लेकिन साढ़े चार साल की सरकार में शराबबंदी का सपना अधूरा ही रहा। उस दौरान विपक्ष में बैठी भाजपा के शीर्ष नेता कांग्रेस को बार-बार इस वादे की याद दिलाते थे। “गंगाजल हाथ में लेकर किए गए वादे का क्या हुआ?” – यह सवाल भाजपा नेताओं की जुबान पर हमेशा रहता था। जनता के बीच भी यह मुद्दा गूंजता रहा कि कांग्रेस ने अपने वचन को निभाने में नाकामयाबी दिखाई।

 

*भाजपा के राज में उल्टा रुख: नई शराब दुकानों का निर्माण*

 

अब जब छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार सत्ता में है, स्थिति और भी चौंकाने वाली हो गई है। पूर्ण शराबबंदी की दिशा में कोई कदम उठाने के बजाय, राज्य में नई शराब दुकानों का निर्माण धड़ल्ले से हो रहा है। हाल ही में खबर आई कि सरकार ने 67 नई शराब भट्टियों को मंजूरी दी है, जिसका उद्देश्य ग्रामीण इलाकों में शराब की उपलब्धता को आसान बनाना बताया जा रहा है। यह निर्णय उस वक्त लिया गया, जब दंतेवाड़ा जैसे संवेदनशील जिलों में नशे की समस्या पहले से ही गंभीर रूप ले चुकी है। सवाल उठता है कि क्या भाजपा भी उसी राह पर चल रही है, जिस पर कांग्रेस चली थी – यानी वादों का ढिंढोरा पीटकर सत्ता हासिल करना और फिर उसे भूल जाना?

 

*नशे की गिरफ्त में दंतेवाड़ा: युवाओं का भविष्य खतरे में*

 

दंतेवाड़ा जिले में नशे की स्थिति बेहद चिंताजनक है। स्थानीय लोगों का कहना है कि शराब और गांजे के साथ-साथ सूखे नशे का चलन तेजी से बढ़ रहा है। नौजवान और स्कूल जाने वाले बच्चे तक इसकी चपेट में आ रहे हैं। एक स्थानीय निवासी ने बताया, “हमारे बच्चे नशे के आदी हो रहे हैं। स्कूल छोड़कर वे गलत संगत में पड़ रहे हैं। सरकार को इसे रोकने के लिए सख्त कदम उठाने चाहिए, लेकिन उल्टा शराब की दुकानें बढ़ाई जा रही हैं।” नशे की यह लत न केवल व्यक्तिगत जीवन को तबाह कर रही है, बल्कि परिवारों और समाज पर भी गहरा असर डाल रही है।

 

*सरकार से सवाल: वादे और हकीकत में फर्क क्यों?*

 

जनता के बीच गुस्सा बढ़ रहा है। लोग पूछ रहे हैं कि क्या छत्तीसगढ़ की सरकारें – चाहे कांग्रेस हो या भाजपा – सिर्फ चुनाव जीतने के लिए बड़े-बड़े वादे करती हैं? कांग्रेस ने शराबबंदी का वादा किया, लेकिन उसे लागू नहीं किया। अब भाजपा, जो पहले कांग्रेस पर तंज कसती थी, खुद उसी रास्ते पर चल रही है। नई शराब दुकानों का निर्माण इस बात का सबूत है कि नशे की समस्या से निपटने की बजाय, सरकार इसे बढ़ावा देने में लगी है। क्या यह सिर्फ राजस्व बढ़ाने का खेल है, या फिर शराब माफियाओं के साथ कोई साठगांठ? ये सवाल जनता के मन में कौंध रहे हैं।

 

*विपक्ष का हमला “शराब तस्करी का सुशासन*

 

पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने हाल ही में भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, “अवैध शराब का धंधा सांय-सांय, ‘तस्करी का सुशासन’ सांय-सांय। मुख्यमंत्री जी! छत्तीसगढ़ को लगातार राजस्व की हानि हो रही है। जवाब तो देना होगा… क्या सेटिंग है? शराब तस्करों के साथ क्या गठबंधन है?” बघेल का यह बयान सरकार पर दबाव बढ़ा रहा है। उनका आरोप है कि मध्य प्रदेश से लाई गई शराब पर छत्तीसगढ़ का लेबल लगाकर अवैध धंधा चलाया जा रहा है, जिससे राज्य को आर्थिक नुकसान हो रहा है।

 

*जनता की मांग: ठोस कदम की जरूरत*

 

दंतेवाड़ा सहित पूरे छत्तीसगढ़ में नशे की बढ़ती समस्या को देखते हुए जनता अब सरकार से ठोस कदमों की मांग कर रही है। लोग चाहते हैं कि शराबबंदी जैसे वादों को सिर्फ कागजों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे जमीन पर उतारा जाए। नई शराब दुकानों के निर्माण को तत्काल रोका जाए और नशे के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाया जाए। साथ ही, नशा मुक्ति केंद्रों की संख्या बढ़ाने और युवाओं को रोजगार के अवसर देने जैसे कदम उठाए जाएं, ताकि वे गलत रास्ते पर जाने से बच सकें।

 

*निष्कर्ष:* क्या सरकार जवाब देगी?छत्तीसगढ़ में शराबबंदी का मुद्दा अब एक राजनीतिक हथियार बन चुका है। कांग्रेस हो या भाजपा, दोनों ने इसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात। दंतेवाड़ा जैसे इलाकों में नशे की चपेट में आते युवाओं को देखकर यह सवाल और गहरा हो जाता है कि क्या सरकारें वाकई जनता की भलाई के लिए काम कर रही हैं, या यह सब सिर्फ सत्ता का खेल है? जनता अब जवाब चाहती है – क्या शराबबंदी का वादा कभी पूरा होगा, या यह हमेशा एक खोखला नारा बनकर रह जाएगा?

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