*पुलिस की समस्या कौन सुनेगा? सिपाही-दरोगा भी इंसान हैं, उनके भी परिवार हैं*
भारत के पुलिस बल की हालत आज बेहद चिंताजनक हो चुकी है। सिपाही, दरोगा, होमगार्ड—ये सब इंसान हैं। इनके माता-पिता हैं, बाल-बच्चे हैं, भाई-बहन हैं। इन्हें भी त्योहार मनाना अच्छा लगता है, आराम करना पसंद है। फिर भी इनसे 14 घंटे, 16 घंटे, यहां तक कि 18 घंटे की ड्यूटी कराई जा रही है। साप्ताहिक अवकाश तो दूर की बात, कई बार महीने भर भी छुट्टी नहीं मिलती।
सवाल ये है कि आखिर पुलिस की समस्या कौन सुनेगा?थाना में सिपाही और दरोगा के परिवार के लिए 2BHK या 3BHK का मकान तक नहीं दिया जाता। बच्चे आराम से परिवार के साथ नहीं रह पाते। थाने की मेस में घटिया खाना मिलता है, पौष्टिक भोजन की व्यवस्था नहीं। टीए-डीए निकलवाने के लिए 10 प्रतिशत कमीशन देना पड़ता है। भ्रष्टाचार का सारा असर पुलिस विभाग पर ही क्यों दिखता है? ये भी तो इंसान हैं।
दरअसल समस्या की जड़ 1861 का पुराना पुलिस एक्ट है। आजादी के इतने साल बाद भी हम उसी ब्रिटिशकालीन कानून से पुलिस चला रहे हैं। कानून पुराना है इसलिए काम ज्यादा है। झूठी शिकायत, झूठी जांच, झूठी गवाही को गंभीर अपराध नहीं बनाया गया। चोरी, लूट, झपटमारी के खिलाफ अरब–दुबई जैसा कठोर कानून नहीं है। नतीजा ये कि पुलिस सुबह से शाम तक भागती रहती है—कभी बैंक की ड्यूटी, कभी सड़क की, कभी नेताओं के पीछे। थाने की पुलिस पर ही सारा बोझ आ जाता है।
दुनिया के कई देशों में स्थिति अलग है। अरब, दुबई, कुवैत, बहरीन में पुलिस को ओवरटाइम नहीं करना पड़ता। चीन, जापान, सिंगापुर में भी पुलिस की ड्यूटी सीमित होती है। कई देशों में थाने पांच दिन ही चलते हैं, बाकी छुट्टी। क्यों? क्योंकि अपराध कम हैं और अपराध इसलिए कम हैं क्योंकि कानून का खौफ है, कानून कठोर है।
भारत में अलग-अलग कानूनों का मकड़जाल बना रखा है—BNS अलग, और कई विशेष कानून अलग। अमेरिका के फेडरल पीनल कोड की तरह ‘वन नेशन, वन पीनल कोड’ और ‘वन नेशन, वन एविडेंस कोड’ बना दिया जाए। झूठ, झूठी शिकायत और झूठी गवाही को गंभीर अपराध घोषित कर दिया जाए तो पुलिस का आधा काम खुद खत्म हो जाएगा। चोरी-लूट के खिलाफ सख्त कानून बनाएं तो अपराध घटेगा और पुलिस का बोझ भी कम होगा।
पुलिस सुधार की जरूरत अब और टाली नहीं जा सकती। एक आधुनिक पुलिस चार्टर और भारतीय पुलिस संहिता लागू की जानी चाहिए। हर अपराध की स्टैंडर्ड एसओपी होनी चाहिए। हर थाने में सिपाही को 2BHK और थानेदार को 3BHK फ्लैट दिया जाए। थानों के आसपास केंद्रीय विद्यालय खोले जाएं ताकि पुलिसकर्मियों के बच्चे वहीं पढ़ सकें। ट्रांसफर की नीति बदली जाए—कम से कम तीन साल का फिक्स्ड टेन्योर हो। गंभीर गलती के अलावा तीन साल से पहले ट्रांसफर न हो। इससे सिपाही और दरोगा निश्चिंत होकर काम कर सकेंगे।
भ्रष्टाचार सिर्फ पुलिस में नहीं है। लेखपाल, पटवारी, तहसील, कचहरी, नगर निगम, शिक्षा विभाग, स्वास्थ्य विभाग—हर जगह भ्रष्टाचार है। पुलिस विभाग को अकेले बदनाम करने की जरूरत नहीं। भ्रष्टाचार का मूल कारण घटिया कानून और व्यवस्था है।
पुलिसकर्मियों का फ्रस्ट्रेशन अब नाक तक आ चुका है। ये फ्रस्ट्रेशन फटने से पहले ही सरकार को पुलिस सुधार लागू कर देना चाहिए। इनके मानवाधिकार की चिंता होनी चाहिए। बेसिक सुविधाएं उपलब्ध करानी चाहिए। वरना एक दिन स्थिति इतनी बिगड़ सकती है कि देश की पुलिस की बदनामी दुनिया में फैल जाए।
पुलिस देश की सुरक्षा की पहली दीवार है। दीवार कमजोर होगी तो सुरक्षा कैसे बचेगी? अब वक्त आ गया है कि पुलिस की आवाज सुनी जाए। सिपाही और दरोगा भी इंसान हैं—उनके अधिकारों की रक्षा भी जरूरी है।

