*सूचना का अधिकार (Right to Information – RTI) एक्ट के तहत दी गई सेवा समाप्ति और FIR की धमकी*
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 भारत सरकार द्वारा बनाया गया था, जिसे 15 जून 2005 को लागू किया गया था और 12 अक्टूबर 2005 को पूरे भारत में प्रभावी हुआ। इसका मुख्य उद्देश्य सरकारी कार्यों में पारदर्शिता और जवाबदेही लाना था, ताकि आम नागरिक सरकार से जानकारी प्राप्त कर सकें।
रंजीत सिंह, जिला समन्वयक, स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) की नियुक्ति के संबंध में रंजना उड्डे, महिला अध्यक्ष, सर्व सामाजिक सेवा समाज, जिला छत्तीसगढ़ द्वारा सूचना के अधिकार के तहत कार्यालय जिला पंचायत से प्राप्त जानकारी अनुसार कलेक्टर जिला छत्तीसगढ़ के समक्ष शिकायत की गई कि जब उनके द्वारा देखा गया तो पाया गया कि रंजीत सिंह के सभी दस्तावेज फर्जी हैं और वह छत्तीसगढ़ जिले में फर्जी रजिस्ट्रेशन से नौकरी कर रहे हैं। यह एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत कुछ व्यक्तियों द्वारा कराया गया था, जिसके प्रमाण हमारे पास हैं।
इस संबंध में कार्यालय कलेक्टर द्वारा जांच समिति का गठन किया गया, जिसमें जांच दल की अध्यक्ष श्रीमती सुमन राज, संयुक्त कलेक्टर, एम.के. नाजर, जिला कोषालय अधिकारी सदस्य, फनीकेश सिंह सिजवार, जिला रोजगार अधिकारी सदस्य रहे और उन्होंने तत्कालीन मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत श्री जयोदय कुमार साहू के नेतृत्व में जांच की और बिना सत्यापन एवं संपूर्ण दस्तावेजों के अवलोकन के ही जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट कलेक्टर महोदय को सौंप दी।
जांच समिति ने निष्कर्ष निकाला कि उपरोक्त भर्ती में प्रक्रियाओं का पालन नियमानुसार नहीं किया गया.
इस पूरी भर्ती के संबंध में प्रश्न यह उठता है कि भर्ती वर्ष 2016 में हुई थी, जिस समय चयन समिति के अध्यक्ष श्री अभिषेक कुमार सिंह, मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला पंचायत छत्तीसगढ़, सदस्य श्री सी.डी. वर्मा, संयुक्त कलेक्टर, सदस्य चित्रा कुमार ठाकुर, उप कलेक्टर और मुख्य कार्यपालन अधिकारी जनपद पंचायत तथा सदस्य श्री विनय रेड्डी, पीएमआरडीएफ, थे.
क्या ये सभी अधिकारी को यह नहीं पता था कि नियुक्ति कैसे करनी है थे ? जिन्होंने तब सक्षम कलेक्टर की स्वीकृति प्राप्त होने के बाद ही नियुक्ति आदेश जारी किया था. क्या कलेक्टर महोदय ने भी हस्ताक्षर आंख बंद करके कर दिए? ऐसा हुआ हो, यह केवल कल्पना ही हो सकती है, क्योंकि किसी भी भर्ती में नियमों का पालन करने और विभिन्न प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद ही किसी व्यक्ति को नियुक्ति आदेश दिया जाता है। इसलिए सत्यता क्या है, यह जानना बहुत आवश्यक है।
कलेक्टर द्वारा गठित जांच समिति ने अनावश्यक बिंदुओं को उजागर किया है, जो कहीं से भी यह सिद्ध नहीं कर सकते कि इस भर्ती में रंजीत सिंह के दस्तावेज कहीं से भी फर्जी हैं। दूसरी बात — इस भर्ती में जांच समिति ने कहा है कि प्रत्येक पद के लिए केवल 10 व्यक्तियों को समूह चर्चा एवं साक्षात्कार के लिए बुलाया जाना था, परंतु चयन समिति ने सभी योग्य 18 अभ्यर्थियों को किस आधार पर दिनांक 18-06-2016 को बुलाया — इससे प्रतीत होता है कि किसी अभ्यर्थी को लाभ देने के उद्देश्य से ऐसा किया गया।
जांच समिति ने तत्कालीन मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत रवि कुमार साहू के दबाव में यह जांच की. इन 18 व्यक्तियों में यदि टॉप 10 प्रतिभागियों को बुलाया जाता तो भी रंजीत सिंह टॉप 07 में पहले से ही आते। चयन समिति की बैठक 15-06-2016 का कार्यवृत्त जांच समिति को जिला पंचायत द्वारा उपलब्ध ही नहीं कराया गया, ऐसा जांच रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा है, तो फिर जांच समिति ने बिना चयन समिति की कार्यवाही रिपोर्ट, विज्ञापन की प्रति आदि दस्तावेज देखे बिना अपनी रिपोर्ट क्यों और किसके दबाव में तैयार की — इसका अर्थ स्पष्ट है कि किसी भी तरह से रंजीत सिंह को दोषी ठहराना था।
रंजना उड्डे द्वारा अपनी शिकायत में कहा गया है कि रंजीत सिंह के आवेदन पत्र में दिनांक 16-06-2016 अंकित है, जबकि भर्ती की अंतिम तिथि 31-05-2016 थी। परंतु मामला कुछ और ही है —
रंजीत सिंह द्वारा मुख्य डाकघर सरगुजा, अंबिकापुर से दिनांक 26-05-2016 को रजिस्टर्ड डाक द्वारा अपना आवेदन (नंबर EC049267596IN) जिला पंचायत को भेजा गया था, जो एक दिन पहले ही कार्यालय जिला पंचायत बिजापुर में दिनांक 30-05-2016 को समय 03:29 पर पहुंच गया था। यह इस बात का प्रमाण है कि आवेदन समय से एक दिन पहले पहुंचा था।
तो प्रश्न उठता है कि कार्यालय जिला पंचायत से इसे किसने रोका या देरी की?
अर्थ साफ है कि कोई नहीं चाहता था कि रंजीत सिंह जैसे योग्य व्यक्ति की नियुक्ति हो — इसलिए भर्ती के पहले ही उनका रास्ता रोकने की योजना बनी थी।
जांच समिति ने इस बिंदु पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की? कार्यालय जिला पंचायत से रंजीत सिंह का आवेदन किसने रोका, इसकी जांच होनी चाहिए थी, पर नहीं हुई। यदि रंजीत सिंह का आवेदन कार्यालय में प्राप्त होने के बाद गुम हुआ है, तो यह जिम्मेदारी कार्यालय की है।
जांच समिति ने बिंदु नंबर 2 में लिखा है कि विज्ञापन सूचना द्वारा दिनांक 10-06-2016 को प्रथम प्रकाशन सूची जारी की गई थी, जिसमें रंजीत सिंह का नाम नहीं था और आपत्ति/दावा दिनांक 15-06-2016 को 03:00 बजे तक मांगे गए थे। चयन समिति ने यह बात उजागर की कि निर्धारित तिथि के भीतर आवेदन प्रस्तुत न करने के बावजूद भी रंजीत सिंह का आवेदन ईमेल से दिनांक 16-06-2016 को प्राप्त कर किस आधार पर स्वीकार किया गया, जबकि विज्ञापन में यह लिखा है कि आवेदन केवल व्यक्ति द्वारा या डाक द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है। तो आवेदनकर्ता ने पुनः आवेदन डाक द्वारा या व्यक्तिगत रूप से क्यों प्रस्तुत नहीं किया? इससे स्पष्ट होता है कि जांच समिति ने जांच के नाम पर केवल खानापूर्ति की है। जब पहले ही डाक द्वारा आवेदन भेजा गया था और वह पहुंच भी चुका था, तो क्या दोबारा रंजीत सिंह से डाक द्वारा आवेदन मंगाया जाता तो वह 16-06-2016 से पहले पहुंच जाता?
प्रथम सूची के प्रकाशन दिनांक के बाद ही रंजीत सिंह द्वारा कार्यालय दूरभाष पर संपर्क कर अपने आवेदन की स्थिति की नियमित जानकारी ली गई। दिनांक 10 से 16 तक जब कार्यालय में आवेदन नहीं मिला, तब संबंधित से दस्तावेज भेजने की पूर्व सूचना व अन्य जानकारी ईमेल से मांगी गई।
चयन समिति द्वारा लिखा गया है कि नियुक्ति आदेश जारी करने की अंतिम तिथि 27-06-2016 तय थी, जबकि 29-06-2016 को नियुक्ति आदेश जारी किया गया, जिसका कोई औचित्य नहीं बनता क्योंकि यह अधिकारी के कार्यालय में उपस्थित होने पर निर्भर करता है।
जांच समिति ने लिखा है कि लघु क्र. 1 से 17 तक अभ्यर्थियों को पत्र क्र. 827 से 843 दिनांक 14-06-2016 के माध्यम से सूचना जारी की गई थी। इससे स्पष्ट है कि रंजीत सिंह का आवेदन पुनः प्राप्त होने से पहले ही 17 व्यक्तियों को समूह चर्चा और साक्षात्कार हेतु बुलाने का पत्र भेजा गया था।
रंजीत सिंह ने अपने बयान में बताया कि उन्हें दूरभाष द्वारा दिनांक 17-06-2016 को शाम 04 बजे बताया गया कि 18-06-2016 को उन्हें भर्ती प्रक्रिया में सम्मिलित होने हेतु आना है। सरल क्रमांक 18, रंजीत सिंह को पत्र क्रमांक 915 दिनांक 18-06-2016 के माध्यम से जारी किया गया। जांच समिति ने लिखा है कि कार्यालय जिला पंचायत द्वारा व्यक्तिगत लाभ देने के लिए ऐसा किया गया।
परंतु जांच समिति ने बिना किसी दस्तावेजों की जांच किए ही जांच कर दी, क्योंकि कार्यालय जिला पंचायत द्वारा जारी विज्ञापन की प्रति के अवलोकन से स्पष्ट होता कि जिला समन्वयक के लिए योग्य अभ्यर्थियों की समूह चर्चा और साक्षात्कार दिनांक 18-06-2016 को प्रातः 10:00 बजे से कार्यालय जिला पंचायत के सभाकक्ष में आयोजित की गई थी। यदि किसी योग्य अभ्यर्थी को आमंत्रण पत्र प्राप्त नहीं हुआ, तो वह पहचान पत्र और फोटोसहित जाकर जिला पंचायत से आमंत्रण पत्र प्राप्त कर सकता था।
उपरोक्त बिंदुओं से स्पष्ट है कि रंजीत सिंह को पद से हटाने की यह साजिश कुछ व्यक्तियों द्वारा मिलकर रची गई थी, जिसमें तत्कालीन मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत रवि कुमार साहू ने मुख्य भूमिका निभाई। इस पूरी जांच रिपोर्ट में उठाए गए बिंदुओं के संबंध में रंजीत सिंह द्वारा आधार और दस्तावेज दिखाने के लिए तत्कालीन मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत श्री रवि कुमार साहू से जब मांगा गया, तो उन्होंने दिखाने से मना कर दिया और कहा कि “आप सूचना के अधिकार के तहत जानकारी प्राप्त कर लीजिए।”
परंतु जब रंजीत सिंह द्वारा अपनी भर्ती में हुई गड़बड़ी के संबंध में दस्तावेज की मांग हेतु सूचना का अधिकार कार्यालय जिला पंचायत में लगाया गया, तब से ही कार्यालय प्रमुख ने रंजीत सिंह पर दबाव बनाकर उन्हें अनावश्यक नोटिस जारी किए। रंजीत सिंह द्वारा प्रस्तुत जवाब को अस्वीकार कर दिया गया। सूचना के अधिकार में उन्हें आंशिक अधूरी जानकारी दी गई। परंतु जब रंजीत सिंह ने सत्यता जानने का हर संभव प्रयास किया, तो उन्हें सेवा समाप्ति और FIR की लिखित धमकी दी गई।
सूचना के अधिकार के तहत जानकारी न देना, धमकी देना, जानकारी देने से रोकना अनुचित है। आयोग इसे दुरुपयोग/दुर्व्यवहार मानता है। इसके लिए जुर्माना/निर्देश दिए जा सकते हैं। धमकी/हैरसमेंट/क्रिमिनल इंटिमिडेशन अपराध है।Judicial Magistrate के पास Section 156(3) CRPC के तहत इसकी शिकायत की जा सकती है और संबंधित अधिकारी पर कानूनन कार्रवाई की मांग की जा सकती है।
क्या उनके ऊपर लगाए गए आरोप सही हैं या गलत — यह साबित करने के लिए न्याय मांगना गलत है?
यदि रंजीत सिंह के साथ षड्यंत्र करके गलत किया गया है, तो ऐसे दोषी अधिकारियों और जांच अधिकारियों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाए और संबंधित व्यक्ति को पुनः उसी पद पर रखते हुए पूरी क्षतिपूर्ति राशि सहित बहाल किया जाए।

