*दंतेवाड़ा में BMS की कमजोरी: BJP पदाधिकारियों के परिवार ही अन्य यूनियनों में सक्रिय, विस्तार पर सवाल*

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*दंतेवाड़ा में BMS की कमजोरी: BJP पदाधिकारियों के परिवार ही अन्य यूनियनों में सक्रिय, विस्तार पर सवाल*

दंतेवाड़ा, 23 अगस्त 2025: छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (NMDC) में भारतीय मजदूर संघ (BMS) की बढ़ती चुनौतियां चर्चा का विषय बनी हुई हैं। वर्षों से यहां SKMS (संयुक्त खदान मजदूर संघ) और INTUC (इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस) जैसी यूनियनों का दबदबा रहा है, लेकिन हाल ही में BMS की उपस्थिति मजबूत करने की कोशिशें असफल साबित हो रही हैं। इसका एक बड़ा कारण BJP के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं, मंडल और जिला पदाधिकारियों के परिवारजनों का अन्य यूनियनों से जुड़ाव माना जा रहा है। यहां तक कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े पदाधिकारी भी BMS से दूरी बनाए हुए हैं, जिससे संघ की मजबूती पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

*पृष्ठभूमि: BMS का इतिहास और NMDC में चुनौतियां*

भारतीय मजदूर संघ की स्थापना 1955 में भोपाल में दत्तोपंत ठेंगड़ी द्वारा की गई थी, जो RSS की विचारधारा से प्रेरित था। BMS को देश का सबसे बड़ा गैर-राजनीतिक मजदूर संगठन माना जाता है, जिसकी सदस्यता 62 लाख से अधिक है और यह अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) में भारत का प्रतिनिधित्व करता है। इसका नारा “देश के हित में करेंगे काम, काम के लेंगे पूरे दाम” राष्ट्रवादी भावना को दर्शाता है, जो अन्य यूनियनों के वर्ग-आधारित संघर्ष से अलग है।

दंतेवाड़ा में NMDC, जो लौह अयस्क उत्पादन का प्रमुख केंद्र है, में मजदूर यूनियनों की राजनीति हमेशा तीखी रही है। SKMS और INTUC यहां की प्रमुख यूनियनें हैं, जो क्रमशः स्थानीय और कांग्रेस से जुड़ी हुई हैं। BMS ने हाल के वर्षों में यहां अपनी पैठ बनाने की कोशिश की, लेकिन सफलता सीमित रही। स्थानीय रिपोर्ट्स के मुताबिक, BMS की सदस्यता बढ़ाने के प्रयासों में कमी आई है, और इसका मुख्य कारण आंतरिक असंगति है।

*विश्लेषण: BJP और RSS का ‘घरेलू’ विरोध*

सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि BJP के दिग्गज नेता और पदाधिकारी खुद BMS को मजबूत बनाने में नाकाम साबित हो रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, कई मामलों में देखा गया है कि अगर पति NMDC में SKMS या INTUC से जुड़े हैं, तो पत्नी BJP के बड़े पद पर है, या उल्टा। यहां तक कि पूर्व मंत्रियों के रिश्तेदार भी BMS से दूरी बनाए हुए हैं।d7dcb1 यह स्थिति BMS के लिए दोहरी मार है, क्योंकि BMS की जड़ें RSS में हैं और RSS BJP की वैचारिक नींव है। लेकिन जब RSS पदाधिकारी खुद अन्य यूनियनों से जुड़े रिश्तों के कारण BMS से दूर रहते हैं, तो संगठन की मजबूती कैसे संभव है?

यह मुद्दा BJP के लिए भी बड़ा सवाल खड़ा करता है। अगर पार्टी के अपने नेता और उनके परिवार BMS में शामिल होने से कतराते हैं, तो अन्य यूनियनों के सदस्यों को कैसे आकर्षित किया जाएगा? दंतेवाड़ा जैसे आदिवासी बहुल इलाके में, जहां NMDC हजारों मजदूरों को रोजगार देता है, BMS का विस्तार BJP की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा होना चाहिए। लेकिन स्थानीय स्तर पर यह ‘परिवारवाद’ और व्यक्तिगत हित BMS के राष्ट्रीय लक्ष्यों पर भारी पड़ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह RSS-BJP परिवार की आंतरिक असंगति को उजागर करता है, जहां वैचारिक प्रतिबद्धता से ज्यादा व्यक्तिगत लाभ महत्वपूर्ण हो जाते हैं।540c66

NMDC में हाल की घटनाओं से पता चलता है कि BMS की असफलता सिर्फ बाहरी प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि आंतरिक समर्थन की कमी से है। अगर BJP के पदाधिकारी अपने घर से ही शुरुआत नहीं करते, तो बाहरी मजदूरों को शामिल करने की बात हास्यास्पद लगती है। यह स्थिति छत्तीसगढ़ में BJP की मजदूर नीति पर भी सवाल उठाती है, जहां पार्टी सत्ता में है लेकिन मजदूर वर्ग में उसका प्रभाव सीमित है।

*आगे की राह: मजबूती के लिए क्या जरूरी?*

BMS को दंतेवाड़ा में मजबूत बनाने के लिए BJP और RSS को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना होगा। सबसे पहले, पदाधिकारियों के परिवारजनों को BMS में सक्रिय रूप से शामिल करने की मुहिम चलानी चाहिए। साथ ही, स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रमों से मजदूरों को राष्ट्रवादी विचारधारा से जोड़ा जा सकता है। अगर यह नहीं हुआ, तो SKMS और INTUC जैसी यूनियनों का दबदबा बना रहेगा, और BMS का विस्तार सिर्फ कागजी रहेगा।

यह मुद्दा BJP के लिए सबक है: जब घर की नींव कमजोर हो, तो बाहर का विस्तार असंभव है। दंतेवाड़ा में BMS की यह लड़ाई न सिर्फ मजदूर अधिकारों की है, बल्कि वैचारिक प्रतिबद्धता की भी परीक्षा है।

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