*किरंदुल में नालियों पर अतिक्रमण: जनप्रतिनिधियों की नाकामी उजागर, बाढ़ की त्रासदी बरकरार*

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*किरंदुल में नालियों पर अतिक्रमण: जनप्रतिनिधियों की नाकामी उजागर, बाढ़ की त्रासदी बरकरार*

किरंदुल, एक शहर जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता और संसाधनों के लिए जाना जाता है, आजकल बार-बार बाढ़ और जलभराव की त्रासदी के कारण चर्चा में है। सोमवार को महज 45 मिनट की बारिश ने शहर की बदहाल जल निकासी व्यवस्था की पोल खोल दी। मटन मार्केट और वार्ड नंबर 8 के कई घरों में नालियों का गंदा पानी घुस गया, जिसने न केवल स्थानीय लोगों की मुश्किलें बढ़ाईं, बल्कि प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की लापरवाही को भी उजागर कर दिया। यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है, जब पता चलता है कि नालियों पर अवैध अतिक्रमण, जिनमें कुछ जनप्रतिनिधियों का भी हाथ है, इस समस्या की जड़ हैं।

*45 मिनट की बारिश ने खोली व्यवस्था की पोल*

सोमवार शाम को हुई 45 मिनट की बारिश ने किरंदुल के मटन मार्केट को पूरी तरह जलमग्न कर दिया। आसपास के घरों में नालियों का गंदा पानी भर गया, जिससे लोगों का जीना मुहाल हो गया। जब नगरपालिका की सफाई टीम मौके पर पहुंची, तो हकीकत सामने आई कि नालियों के ऊपर पक्के मकान और दुकानें बना दी गई हैं। वार्ड नंबर 8 और वार्ड नंबर 1 में कई लोग नालियों को ही अपनी संपत्ति मानकर उस पर तीन मंजिला मकान और दो मंजिला दुकानें बना चुके हैं। इसका नतीजा यह है कि नालियों की सफाई असंभव हो गई है, और पानी का निकास रुकने से बाढ़ जैसी स्थिति बन रही है।

पिछले साल 2024 में किरंदुल में आई बाढ़ ने भी यही सच्चाई उजागर की थी। तब भी कई घर और दुकानें नालियों के ऊपर बनी पाई गई थीं, जिसके कारण जल निकासी पूरी तरह ठप हो गई थी। लेकिन एक साल बीत जाने के बाद भी न तो अतिक्रमण हटाए गए और न ही नालियों की समुचित सफाई की गई। अब, मानसून की शुरुआत के साथ ही शहर फिर से जलभराव की चपेट में है।

*जनप्रतिनिधियों का दोहरा चेहरा*

किरंदुल में नालियों पर अतिक्रमण की समस्या कोई नई बात नहीं है। लेकिन जो बात इस मुद्दे को और गंभीर बनाती है, वह है जनप्रतिनिधियों की संलिप्तता। स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई जनप्रतिनिधि न केवल अतिक्रमण को संरक्षण दे रहे हैं, बल्कि कुछ मामलों में खुद इसके लिए जिम्मेदार हैं। मटन मार्केट और वार्ड नंबर 1 में नालियों पर बने पक्के निर्माण इसका जीता-जागता सबूत हैं।

स्थानीय निवासियों का कहना है कि जनप्रतिनिधि वोट बैंक की राजनीति के चलते अतिक्रमण हटाने में आनाकानी करते हैं। हर अतिक्रमणकारी किसी न किसी जनप्रतिनिधि का “खास” है, जिसके चलते प्रशासन भी कार्रवाई करने से कतराता है। दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल ही में तैमूर नगर में नाले पर अतिक्रमण के मामले में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा था कि सरकारी जमीन पर अवैध निर्माण का कोई अधिकार नहीं हो सकता और नागरिकों को बाढ़-मुक्त शहर का हक है। किरंदुल में भी यही स्थिति है, लेकिन स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की उदासीनता के चलते कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा।

*अतिक्रमण: बाढ़ की जड़*

शहरी बाढ़ की समस्या का मुख्य कारण नालियों और प्राकृतिक जल निकासी तंत्रों पर अतिक्रमण है। किरंदुल में नालियों को अवरुद्ध करने वाले निर्माणों ने जल निकासी की क्षमता को लगभग खत्म कर दिया है। विशेषज्ञों के अनुसार, जब नालियां और नाले अवरुद्ध हो जाते हैं, तो बारिश का पानी सड़कों और घरों में भरने लगता है। एक अध्ययन में बताया गया है कि भारत में 40 मिलियन हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र बाढ़ प्रवण है, और अतिक्रमण इस समस्या को और गंभीर बनाता है। किरंदुल में भी यही देखने को मिल रहा है, जहां नालियों पर बने मकान और दुकानें पानी के बहाव को रोक रही हैं।

पिछले साल की बाढ़ के बाद भी प्रशासन ने नालियों की सफाई और अतिक्रमण हटाने की दिशा में कोई ठोस योजना नहीं बनाई। नतीजतन, हर बारिश के साथ शहर डूबने की कगार पर पहुंच जाता है। यह स्थिति न केवल लोगों के जीवन को खतरे में डाल रही है, बल्कि संपत्ति, फसलों और आधारभूत ढांचे को भी भारी नुकसान पहुंचा रही है।

*जनप्रतिनिधियों की नाकामी और जनता की पीड़ा*

किरंदुल के लोग इस बात से आक्रोशित हैं कि जनप्रतिनिधि विकास के नाम पर केवल खोखले वादे करते हैं। वोट की राजनीति के चलते वे अतिक्रमण हटाने जैसे कठोर कदम उठाने से बचते हैं। एक स्थानीय निवासी ने कहा, “जब तक जनप्रतिनिधि अतिक्रमणकारियों को संरक्षण देते रहेंगे, तब तक किरंदुल में बाढ़ की समस्या बनी रहेगी।” यह भावना पूरे शहर में गूंज रही है, जहां लोग अब यह मानने लगे हैं कि जनप्रतिनिधियों की नाकामी के चलते किरंदुल सचमुच “डूब” सकता है।

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