*किरंदुल-बचेली: खनिज संपदा के साथ नशे की गिरफ्त में उलझता शहर, नशा मुक्ति की ओर एक उम्मीद की कहानी*
दंतेवाड़ा जिला, छत्तीसगढ़ का वह क्षेत्र जो अपनी प्राकृतिक संपदा और आयरन ओर खदानों के लिए जाना जाता है, आज एक नई और चिंताजनक पहचान बना रहा है। किरंदुल और बचेली, जो कभी केवल खनिज उद्योग के लिए चर्चा में रहते थे, अब नशे की लत की भयावह सच्चाई से जूझ रहे हैं। यह कहानी है एक ऐसे समाज की, जो नशे की चपेट में है, लेकिन जिसमें बदलाव की उम्मीद अभी बाकी है। यह कहानी है किरंदुल और बचेली के उन लोगों की, जो नशे के खिलाफ लड़ाई शुरू करने को तैयार हैं, और यह कहानी है हम सबकी, जो इस लड़ाई में अपनी जिम्मेदारी को समझ सकते हैं।
*नशे की भयावह हकीकत*
जिला आबकारी विभाग के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। किरंदुल की सरकारी शराब दुकान से रोजाना 6 से 7 लाख रुपये की शराब बिकती है। बचेली में भी यही हाल है, जहां हर दिन 6 से 7 लाख की शराब खपत हो रही है। दंतेवाड़ा शहर की शराब दुकान से 8 से 9 लाख और गीदम से 7 से 8 लाख रुपये की बिक्री होती है। कुल मिलाकर, दंतेवाड़ा जिले में हर दिन 25 से 30 लाख रुपये की शराब पी जा रही है। यह केवल शराब की बात है। गांजा, नशीली दवाइयां, सॉल्यूशन, व्हाइटनर, और यहाँ तक कि अमृतांजन बाम जैसे पदार्थों का नशे के लिए इस्तेमाल इस आंकड़े को और भयावह बनाता है। *अनुमान है कि जिले में नशे की कुल खपत 30 से 40 लाख रुपये प्रतिदिन से भी ज्यादा हो सकती है।*
यह आंकड़े केवल रुपये-पैसों की बात नहीं करते। ये बताते हैं कि कैसे एक समाज धीरे-धीरे नशे की गहरी खाई में फिसल रहा है। 100 में से 90 घरों में कोई न कोई नशे की चपेट में है। कितने ही परिवार बिखर गए, कितने जवान बेटे नशे की लत में अपनी जान गंवा चुके हैं, और कितने ही घर हर दिन भगवान से अपने प्रियजनों को नशे से मुक्ति की प्रार्थना कर रहे हैं। यह स्थिति न केवल किरंदुल और बचेली की है, बल्कि पूरे दंतेवाड़ा जिले की एक दर्दनाक सच्चाई है।
*हमारी चुप्पी, हमारी गलती*
इस कहानी का सबसे दुखद पहलू यह है कि इस स्थिति के लिए हम सब कहीं न कहीं जिम्मेदार हैं। हमने देखा कि हमारे पड़ोस में, हमारे मोहल्ले में, हमारे समाज में नशा बिक रहा है, लेकिन हम चुप रहे। हमने सोचा, “यह मेरे घर की बात नहीं है, मेरे परिवार का कोई नशा नहीं करता, तो मुझे क्या?” *यह चुप्पी ही हमारी सबसे बड़ी गलती है।*
एक व्यक्ति की कहानी इस सच्चाई को उजागर करती है। वह कहता है, “मैंने अपने आसपास नशे की बिक्री देखी। मैंने देखा कि पड़ोस का लड़का हर शाम शराब के नशे में डगमगाता हुआ घर लौटता है। मैंने सुना कि मोहल्ले के कोने में गांजे की पुड़िया बिक रही है। लेकिन मैं चुप रहा। मैंने सोचा, यह मेरी समस्या नहीं है। यही मेरी गलती थी।” यह कहानी सिर्फ उस एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि हम सबकी है। हमारी चुप्पी ने नशे को पनपने दिया। हमारी उदासीनता ने समाज को इस दलदल में धकेल दिया।
*नशा मुक्ति: एक नई शुरुआत की उम्मीद*
लेकिन हर अंधेरे में एक रोशनी होती है, और किरंदुल-बचेली में यह रोशनी नशा मुक्ति अभियान के रूप में उभर रही है। यह अभियान केवल सरकारी पहल या जागरूकता रैलियों तक सीमित नहीं है। यह एक सामाजिक क्रांति की शुरुआत है, जिसमें हर व्यक्ति, हर घर, हर मोहल्ला शामिल हो सकता है। यह अभियान कहता है कि नशा मुक्ति तभी संभव है, जब हम इसे अपने परिवार से जोड़कर देखें। जब हम यह सोचें कि हमारा पड़ोसी, हमारा दोस्त, हमारा समाज भी हमारा ही परिवार है।
किरंदुल के एक युवा, राहुल, ने इस दिशा में कदम उठाया। उसने देखा कि उसका दोस्त शराब की लत में डूबता जा रहा है। पहले उसने भी सोचा कि यह उसकी समस्या नहीं है। लेकिन एक दिन, जब उसने अपने दोस्त को नशे में सड़क पर गिरते देखा, तो उसका मन बदल गया। उसने अपने दोस्त से बात की, उसे नशा मुक्ति केंद्र ले गया, और उसकी मदद की। आज उसका दोस्त नशे से मुक्त है और एक नई जिंदगी जी रहा है। राहुल कहता है, “अगर मैं उस दिन चुप रहता, तो शायद मेरा दोस्त आज हमारे बीच नहीं होता।”
*समाज की एकजुटता: नशा मुक्ति का रास्ता*
नशा मुक्ति का रास्ता आसान नहीं है, लेकिन असंभव भी नहीं। किरंदुल और बचेली के लोग अब जाग रहे हैं। मोहल्लों में छोटी-छोटी समितियाँ बन रही हैं, जो नशे की बिक्री पर नजर रख रही हैं। स्कूलों में बच्चे नशे के दुष्परिणामों पर निबंध लिख रहे हैं, चित्र बना रहे हैं, और नुक्कड़ नाटकों के जरिए जागरूकता फैला रहे हैं। महिलाएँ अपने घरों से बाहर निकलकर नशे के खिलाफ आवाज उठा रही हैं। स्थानीय प्रशासन भी इस अभियान में शामिल हो रहा है, और नशा मुक्ति केंद्रों की संख्या बढ़ाने की योजना बन रही है।
लेकिन यह सब तभी सफल होगा, जब हर व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी समझे। नशा मुक्ति अभियान का नारा है: “ *आज से, अभी से, हम सब से।*” इसका मतलब है कि हमें आज ही, अभी से, और हम सबको मिलकर इस लड़ाई को लड़ना होगा। हमें अपने बच्चों को नशे से दूर रखना होगा। हमें अपने पड़ोसियों को समझाना होगा। हमें उन लोगों की मदद करनी होगी, जो नशे की चपेट में हैं। और सबसे जरूरी, हमें अपनी चुप्पी तोड़नी होगी।एक
*नशा-मुक्त किरंदुल-बचेली का सपना*
कल्पना करें, एक ऐसा किरंदुल और बचेली, जहां बच्चे बिना डर के पार्कों में खेलते हों, जहां परिवार नशे की चिंता के बिना खुशी से रहते हों, जहां हर घर में सुख और शांति हो। यह सपना सच हो सकता है, अगर हम सब मिलकर प्रयास करें। किरंदुल से इस नशा मुक्ति अभियान की शुरुआत हो चुकी है। अब जरूरत है कि हर व्यक्ति, हर परिवार, हर मोहल्ला इस अभियान का हिस्सा बने।
आइए, हम सब मिलकर संकल्प लें कि हम नशे को अपने समाज से दूर करेंगे। हम अपने बच्चों के लिए एक बेहतर भविष्य बनाएंगे। हम अपने परिवार को नशे की बर्बादी से बचाएंगे। यह लड़ाई हमारी है, और इसे हमें ही जीतना है। किरंदुल और बचेली नशा-मुक्त होंगे, और यह बदलाव हमसे शुरू होगा।
*क्या आप इस अभियान का हिस्सा बनेंगे?* आइए, आज से, अभी से, हम सब से, एक नशा-मुक्ति किरंदुल और बचेली की नींव रखें।
