*किरंदुल में बाबासाहेब की जयंती पर ऐतिहासिक उत्सव: राजगृह का अनावरण, जय भीम के नारों से गूंजा दंतेवाड़ा*
14 अप्रैल 2025 को छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के किरंदुल में बोधिसत्व बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की जयंती धूमधाम और भक्ति के साथ मनाई गई। इस अवसर पर किरंदुल के अम्बेडकर पार्क में बाबासाहेब के मुंबई स्थित ऐतिहासिक निवास स्थान ‘राजगृह’ के नाम पर निर्मित भव्य स्मारक का अनावरण किया गया। साथ ही, बाबासाहेब की नई प्रतिमा का भी लोकार्पण हुआ, जिसने इस आयोजन को और भी विशेष बना दिया। एनएमडीसी किरंदुल, एसटी/एससी एनएमडीसी कर्मचारी कल्याण संघ, और नागार्जुन बौद्ध विहार विकास समिति के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम ने पूरे क्षेत्र को ‘जय भीम’ के नारों से गुंजायमान कर दिया।
*राजगृह का अनावरण: बाबासाहेब के जीवन का प्रतीक*
किरंदुल के अम्बेडकर पार्क में राजगृह स्मारक का अनावरण न केवल एक स्थापत्य कृति है, बल्कि यह बाबासाहेब के विचारों, संघर्षों और विरासत का प्रतीक भी है। राजगृह, जो बाबासाहेब का मुंबई में निवास स्थान था, उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। वहां उन्होंने अपने लेखन, चिंतन और सामाजिक सुधार के कार्यों को गति दी थी। इस स्मारक के निर्माण से किरंदुल के लोग बाबासाहेब के जीवन और उनके योगदान से और करीब से जुड़ सकेंगे। नई प्रतिमा का अनावरण करते समय उपस्थित लोगों की आंखों में श्रद्धा और गर्व साफ झलक रहा था।
*जय भीम के नारों से गूंजा किरंदुल*
इस जयंती पर किरंदुल का माहौल पूरी तरह से बाबासाहेबमय हो गया। सुबह से ही अम्बेडकर पार्क में भारी भीड़ जुटने लगी थी। बच्चे, युवा, बुजुर्ग, और हर वर्ग के लोग बाबासाहेब को श्रद्धांजलि देने पहुंचे। ‘जय भीम’ के नारे आसमान को छू रहे थे। एनएमडीसी कर्मचारी कल्याण संघ के सदस्यों ने बाबासाहेब के विचारों को जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प लिया। नागार्जुन बौद्ध विहार विकास समिति ने बौद्ध धम्म के प्रचार-प्रसार और सामाजिक समता के लिए किए गए बाबासाहेब के कार्यों को याद किया।
*ग्रामीण रैली नक्सल प्रभावित क्षेत्र में नई उम्मीद*
इस बार किरंदुल की अम्बेडकर जयंती केवल शहरी क्षेत्र तक सीमित नहीं रही। आसपास के ग्रामीण इलाकों, जो कभी नक्सलियों की हिंसा और गोलियों की आवाज से कांपते थे, वहां भी बाबासाहेब के विचारों की गूंज सुनाई दी। ग्राम पंचायतों से नवनिर्वाचित पंच, सरपंच, और जिला पंचायत सदस्यों ने एक विशाल रैली का आयोजन किया। विशेष रूप से, जिला पंचायत सदस्य श्रावण कड़ती के नेतृत्व में निकली 50 किलोमीटर लंबी रैली ने सभी का ध्यान आकर्षित किया। यह रैली न केवल बाबासाहेब के प्रति श्रद्धा का प्रतीक थी, बल्कि यह भी दिखाया कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में अब शांति, एकता, और सामाजिक जागरूकता की नई लहर उठ रही है।
*यह रैली ग्रामीणों के लिए एक नई मिसाल बन गई।*
रंग-बिरंगे झंडों, बैनरों, और बाबासाहेब की तस्वीरों के साथ निकली इस रैली ने दंतेवाड़ा जिले के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा। ग्रामीणों का उत्साह और ‘जय भीम’ के नारे इस बात का प्रमाण थे कि बाबासाहेब का संदेश आज भी हर दिल में जिंदा है।
*अम्बेडकर पार्क: म्यूजिकल फाउंटेन के बाद म्यूजियम की मांग*
अम्बेडकर पार्क पहले से ही अपने म्यूजिकल फाउंटेन के लिए प्रसिद्ध है, जो रात में रंग-बिरंगी रोशनी और संगीत के साथ लोगों को आकर्षित करता है। इस फाउंटेन को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। हालांकि, स्थानीय लोगों और बाबासाहेब के अनुयायियों की मांग है कि इस पार्क को केवल मनोरंजन तक सीमित न रखा जाए। उन्होंने एनएमडीसी से अपील की है कि अम्बेडकर पार्क को बाबासाहेब के जीवन पर आधारित एक जीवंत म्यूजियम में बदला जाए।
लोग चाहते हैं कि पार्क में बाबासाहेब के बचपन, उनके संघर्ष, शिक्षा, संविधान निर्माण में योगदान, और सामाजिक सुधार के कार्यों को चित्रों, लेखों, और प्रदर्शनियों के माध्यम से दर्शाया जाए। इससे न केवल पर्यटक, बल्कि बच्चे और युवा भी बाबासाहेब के जीवन से प्रेरणा ले सकेंगे। म्यूजिकल फाउंटेन के साथ-साथ यदि बाबासाहेब की जीवनी को इस तरह प्रस्तुत किया जाए, तो यह पार्क न केवल एक पर्यटन स्थल, बल्कि एक शैक्षिक और प्रेरणादायी केंद्र बन सकता है।
*बाबासाहेब का जीवन: प्रेरणा का स्रोत*
डॉ. भीमराव अम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के महू में हुआ था। महार जाति में जन्म लेने के कारण उन्हें बचपन से ही सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ा। लेकिन उनकी लगन और प्रतिभा ने उन्हें भारत के सबसे बड़े विद्वानों और समाज सुधारकों में से एक बना दिया। उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से उच्च शिक्षा प्राप्त की। भारतीय संविधान के निर्माण में उनकी भूमिका अतुलनीय है। दलितों, श्रमिकों, और महिलाओं के अधिकारों के लिए उनके संघर्ष ने लाखों लोगों को प्रेरित किया।
बाबासाहेब ने न केवल सामाजिक समता की वकालत की, बल्कि बौद्ध धर्म को अपनाकर एक नई राह दिखाई। उनका कहना था, “मैं स्वतंत्रता, समता, और बंधुता के बिना भारत को स्वीकार नहीं करूंगा।” आज किरंदुल में उनके विचारों को जीवित रखने की यह पहल उसी दिशा में एक कदम है।
*एक ऐतिहासिक दिन*
किरंदुल में इस बार की अम्बेडकर जयंती कई मायनों में ऐतिहासिक रही। राजगृह स्मारक और नई प्रतिमा का अनावरण, ग्रामीण रैली, और म्यूजियम की मांग ने इस आयोजन को यादगार बना दिया। यह दिन न केवल बाबासाहेब के प्रति श्रद्धा का प्रतीक था, बल्कि यह भी दिखाया कि उनके विचार आज भी समाज को एकजुट करने और प्रेरित करने की ताकत रखते हैं। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शांति और समता का संदेश लेकर आई इस जयंती ने दंतेवाड़ा के लिए एक नया इतिहास रच दिया।’
जय भीम’ के नारों के साथ किरंदुल ने यह साबित कर दिया कि बाबासाहेब का सपना—एक समतामूलक और न्यायपूर्ण समाज—आज भी जीवित है और इसे साकार करने की जिम्मेदारी हम सबकी है।

