*छत्तीसगढ़ का पोला त्यौहार: किरंदुल में छत्तीसगढ़ सांस्कृतिक क्रीड़ा मंडल ने धूमधाम से मनाया पर्व*
रायपुर/किरंदुल, 23 अगस्त 2025: छत्तीसगढ़ का लोकप्रिय और पारंपरिक त्यौहार ‘पोला’ आज पूरे राज्य में उत्साह और उमंग के साथ मनाया गया। विशेष रूप से किरंदुल में छत्तीसगढ़ सांस्कृतिक क्रीड़ा मंडल द्वारा इस पर्व को बड़े धूमधाम से आयोजित किया गया, जिसमें स्थानीय संस्कृति, परंपरा और सामुदायिक एकता की अनूठी झलक देखने को मिली। यह त्यौहार, जो मुख्य रूप से खेती-किसानी और पशुधन, विशेषकर बैलों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है, छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
*किरंदुल में पोला की धूम: पूजा-अर्चना और सांस्कृतिक आयोजन*
किरंदुल में छत्तीसगढ़ सांस्कृतिक क्रीड़ा मंडल द्वारा आयोजित पोला त्यौहार की शुरुआत छत्तीसगढ़ महतारी और माँ दंतेश्वरी की पूजा-अर्चना के साथ हुई। इस अवसर पर मिट्टी के बने बैल, जाता पोरा और मिट्टी के बर्तनों की विधि-विधान से पूजा की गई, जो इस पर्व का एक अभिन्न अंग है। यह पूजा न केवल कृषि और पशुधन के प्रति सम्मान का प्रतीक है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की ग्रामीण संस्कृति और परंपराओं को जीवंत रखने का एक प्रयास भी है।
पूजा के बाद मंडल ने महिलाओं और बच्चों के लिए विभिन्न मनोरंजक खेलों का आयोजन किया, जिसने इस उत्सव को और भी रंगीन बना दिया। गेड़ी दौड़, जो छत्तीसगढ़ के इस पर्व का एक विशेष आकर्षण है, में बच्चों और युवाओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। बांस से बनी गेड़ी पर संतुलन बनाकर दौड़ने का यह खेल न केवल मनोरंजन का साधन है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को भी दर्शाता है। इसके अलावा, महिलाओं के लिए आयोजित खेलों ने सामुदायिक सहभागिता और उत्साह को बढ़ाया।
*पोला त्यौहार का महत्व*
पोला, छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख कृषि पर्व है, जो भाद्रपद मास की अमावस्या को मनाया जाता है। इस वर्ष यह 22 अगस्त 2025 को शुरू होकर 23 अगस्त 2025 को सम्पन्न हुआ। यह पर्व खेती-किसानी में बैलों और गौवंश के योगदान को सम्मान देने का अवसर प्रदान करता है। छत्तीसगढ़, जिसे ‘धान का कटोरा’ कहा जाता है, में यह त्यौहार किसानों के लिए विशेष महत्व रखता है। इस दिन बैलों को सजाया जाता है, उनके सींगों और खुरों पर पॉलिश की जाती है, और उन्हें विशेष भोजन अर्पित किया जाता है। साथ ही, मिट्टी के खिलौनों जैसे बैल और रसोई के बर्तनों की पूजा की जाती है, ताकि बच्चे खेती और गृहस्थी की परंपराओं को समझ सकें।
इसके अलावा, इस पर्व में छत्तीसगढ़ी व्यंजनों जैसे गुड़हा, चीला, अनरसा, ठेठरी, खुरमी और भजिया का विशेष महत्व है। घर-घर में इन पकवानों को बनाकर रिश्तेदारों और पड़ोसियों के साथ साझा किया जाता है, जो सामाजिक एकता को और मजबूत करता है।
*छत्तीसगढ़ सांस्कृतिक क्रीड़ा मंडल का योगदान*
किरंदुल में छत्तीसगढ़ सांस्कृतिक क्रीड़ा मंडल ने इस पर्व को न केवल एक धार्मिक आयोजन के रूप में, बल्कि एक सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव के रूप में भी प्रस्तुत किया। मंडल द्वारा आयोजित खेल और सांस्कृतिक गतिविधियों ने स्थानीय समुदाय को एक मंच प्रदान किया, जहां बच्चे, महिलाएं और पुरुष सभी ने मिलकर इस पर्व का आनंद उठाया। यह आयोजन नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने और परंपराओं को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
*सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक*
पोला त्यौहार न केवल किसानों और पशुधन के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है, बल्कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक एकता को भी बढ़ावा देता है। किरंदुल में आयोजित इस उत्सव में स्थानीय लोगों की सक्रिय भागीदारी ने यह साबित किया कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर आज भी उतनी ही जीवंत और प्रासंगिक है। मिट्टी के खिलौनों और गेड़ी जैसे पारंपरिक खेलों के माध्यम से बच्चों को अपनी संस्कृति से जोड़ा गया, जबकि महिलाओं के लिए आयोजित खेलों ने सामुदायिक सहभागिता को और मजबूत किया।
निष्कर्ष
किरंदुल में छत्तीसगढ़ सांस्कृतिक क्रीड़ा मंडल द्वारा आयोजित पोला त्यौहार का यह उत्सव छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का एक शानदार उदाहरण है। यह पर्व न केवल खेती-किसानी और पशुधन के प्रति सम्मान का प्रतीक है, बल्कि सामुदायिक एकता, परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों को जीवित रखने का एक अनूठा अवसर भी है। छत्तीसगढ़ सांस्कृतिक क्रीड़ा मंडल का यह प्रयास सराहनीय है, जिसने किरंदुल में पोला को एक यादगार उत्सव बना दिया।

