*किरंदुल के लाल पानी पुल पर मंडराया खतरा: 30-40 गांवों के ग्रामीणों की बढ़ती चिंता, जिम्मेदारी किसकी?*

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*किरंदुल के लाल पानी पुल पर मंडराया खतरा: 30-40 गांवों के ग्रामीणों की बढ़ती चिंता, जिम्मेदारी किसकी?*

छत्तीसगढ़ के किरंदुल नगरपालिका परिषद के वार्ड नंबर 18 में स्थित लाल पानी पुल, जो लगभग 25 वर्ष पुराना है, आज टूटने की कगार पर खड़ा है। इस पुल का निर्माण लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी), दंतेवाड़ा द्वारा किया गया था, जब वाहनों की भार क्षमता सीमित थी। उस समय 6 चक्का वाहनों की क्षमता 16-18 टन थी, और पुल को अधिकतम 20 टन भार सहने के लिए डिज़ाइन किया गया था। लेकिन आज के समय में 12 और 14 चक्का हाइवा वाहन, जो 40-50 टन माल के साथ कुल 70 टन से अधिक वजन के होते हैं, रोजाना इस पुल से गुजर रहे हैं। स्थानीय ग्रामीणों और सीजी संविधान न्यूज़ की पड़ताल में यह सामने आया है कि यह पुल अब न केवल जर्जर हो चुका है, बल्कि कभी भी बड़ा हादसा होने का खतरा मंडरा रहा है।

*पुल की मौजूदा स्थिति*

लाल पानी पुल, जो किरंदुल और आसपास के 30-40 गांवों को जोड़ने का एकमात्र प्रमुख रास्ता है, आज भारी वाहनों के दबाव के कारण अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है। अनुमान के मुताबिक, रोजाना 400-500 भारी वाहन इस पुल से गुजरते हैं, जिनमें से अधिकांश आरसेलर मित्तल निपॉन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (AM/NS India) के माल ढोने वाले ट्रक हैं। ये वाहन 70 टन से अधिक वजन के साथ पुल पर दबाव डाल रहे हैं, जो इसकी डिज़ाइन क्षमता का तीन गुना से भी अधिक है।

पुल की संरचना में दरारें और जर्जर हालत साफ दिखाई दे रही है। ग्रामीणों का कहना है कि पुल से गुजरते समय कंपन होता है, और कई बार ऐसा लगता है कि यह अब ढहने वाला है। एक ग्रामीण, रामू नेताम, ने बताया, “इस पुल से गुजरते समय डर लगता है। कब टूट जाए, कुछ पता नहीं। मजबूरी में हमें इसे पार करना पड़ता है, क्योंकि किरंदुल आने-जाने का कोई दूसरा रास्ता नहीं है।”

*ग्रामीणों की चिंता* 

इस पुल का उपयोग न केवल किरंदुल के निवासियों, बल्कि आसपास के 30-40 गांवों के हजारों ग्रामीणों द्वारा किया जाता है। ये गांववाले बाजार, अस्पताल, स्कूल, और अन्य जरूरी सेवाओं के लिए इस पुल पर निर्भर हैं। ग्रामीणों का कहना है कि अगर यह पुल टूट गया, तो उनका जीवन पूरी तरह ठप हो जाएगा।

स्थानीय निवासी शांति बाई ने चिंता जताते हुए कहा, “हमारे बच्चे इस पुल से स्कूल जाते हैं। अगर यह टूट गया, तो हमारा क्या होगा? कंपनी के भारी ट्रकों के लिए अलग रास्ता होना चाहिए। यह पुल हमारे लिए छोड़ देना चाहिए।” ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि प्रशासन और कंपनी इस समस्या की अनदेखी कर रहे हैं।

*कंपनी की भूमिका और ग्रामीणों का सुझाव*

ग्रामीणों ने आरसेलर मित्तल निपॉन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड पर सवाल उठाए हैं, जिनके भारी वाहन इस पुल का सबसे ज्यादा उपयोग करते हैं। उनका कहना है कि कंपनी को अपने माल ढोने के लिए एक वैकल्पिक मार्ग या अलग पुल का निर्माण करना चाहिए। एक अन्य ग्रामीण, लक्ष्मण कोर्राम, ने कहा, “कंपनी के पास पैसा और संसाधन हैं। अगर यह पुल टूट गया, तो वे तुरंत दूसरा रास्ता बना लेंगे, लेकिन हम ग्रामीण कहां जाएंगे?हमें इस पुल की जरूरत है।”

ग्रामीणों ने मांग की है कि कंपनी और प्रशासन मिलकर तत्काल इस समस्या का समाधान करें। उनके सुझावों में शामिल है:

*1:-भारी वाहनों के लिए वैकल्पिक मार्ग या नया पुल बनाया जाए।*

*2:-लाल पानी पुल की मरम्मत और सुदृढ़ीकरण तुरंत शुरू किया जाए।*

*3:-पुल पर भारी वाहनों की आवाजाही पर रोक लगाई जाए और वजन सीमा लागू की जाए।*

*प्रशासन की चुप्पी*

लोक निर्माण विभाग, दंतेवाड़ा, जिसने इस पुल का निर्माण किया था, इस मामले में अब तक चुप्पी साधे हुए है। सीजी संविधान न्यूज़ ने जब विभाग के अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की, तो कोई ठोस जवाब नहीं मिला। ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन को इस समस्या की जानकारी कई बार दी गई, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

पुल की जर्जर स्थिति को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जल्द मरम्मत या सुदृढ़ीकरण नहीं किया गया, तो यह कभी भी ढह सकता है, जिससे जान-माल का भारी नुकसान हो सकता है। एक सिविल इंजीनियर, जो नाम न छापने की शर्त पर बोले, ने कहा, “20 टन के लिए बने पुल पर 70 टन के वाहनों का रोजाना गुजरना संरचनात्मक रूप से असुरक्षित है। यह किसी भी समय ढह सकता है।”

*निष्कर्ष और मांग*

लाल पानी पुल किरंदुल और आसपास के गांवों के लिए जीवनरेखा है। इसकी जर्जर हालत न केवल एक तकनीकी समस्या है, बल्कि हजारों ग्रामीणों की सुरक्षा और आजीविका का सवाल है। ग्रामीणों की मांग है कि प्रशासन, लोक निर्माण विभाग, और आरसेलर मित्तल निपॉन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड इस मामले में तत्काल कदम उठाएं।

सीजी संविधान न्यूज़ इस मुद्दे को प्रमुखता से उठा रहा है और मांग करता है कि:

पुल की तत्काल मरम्मत और सुदृढ़ीकरण किया जाए।

भारी वाहनों की आवाजाही पर रोक लगे और वजन सीमा का सख्ती से पालन हो।

कंपनी द्वारा वैकल्पिक मार्ग या नए पुल का निर्माण शुरू किया जाए।

प्रशासन इस मामले में पारदर्शिता बरते और ग्रामीणों की शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई करे।

जनता की आवाजयह सिर्फ एक पुल की कहानी नहीं है, बल्कि उन हजारों ग्रामीणों की जिंदगी का सवाल है, जो इस पर निर्भर हैं। अगर समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं हुआ, तो एक बड़ा हादसा तय है। सवाल यह है कि इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या प्रशासन और कंपनी ग्रामीणों की आवाज सुनेगी, या यह पुल ढहने के बाद ही कोई कदम उठाया जाएगा?

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