*कचरे की क्रांति: हम सड़ते हैं, तू सड़ चुका है!*
हुज़ूर-ए-इंसान,
हम हैं कचरा—
तेरी तथाकथित तरक़्क़ी का सबसे नंगा सच।
हम तेरे हर झूठ का सबूत हैं,
तेरे हर पाखंड का आईना।
हर गली के मोड़ पर, हर नाले के किनारे,
हर चमचमाते मॉल के पीछे—
हम खड़े हैं, सड़ रहे हैं,
तेरे विकास के ढोंग को ललकार रहे हैं।
*तू हमें गंदा कहता है? हाय रे बेशर्मी!*
शुक्रिया, क्योंकि हम तेरे ज़मीर की सड़ांध का दर्पण हैं।
हम तेरे त्योहारों की राख हैं,
जो तूने दिखावे में जलाकर फेंक दी।
हम वो प्लास्टिक की थैलियाँ हैं,
जो तेरे “ग्रीन टुमॉरो” के वादों को चिढ़ाती हैं।
हम वो बासी खाना हैं,
जो तूने भूखों के मुँह से छीनकर कूड़ेदान में उछाला।
हम वो टूटी चप्पल, फटा लिफाफा, और रिसता बैग हैं,
जो चीख-चीख कर पूछते हैं—
“ऐ इंसान, तूने इंसानियत को कहाँ दफ़नाया?”
*हम सड़ते हैं, ताकि तू अपनी सड़ांध देख सके।*
तू स्वच्छता अभियान की सेल्फी खींचता है,
पर अपनी गली की नाली से आँखें चुराता है।
तू पर्यावरण दिवस पर ट्वीट करता है,
और उसी दिन सैकड़ों बैनर सड़कों पर फेंक देता है।
तू धर्म, जाति, और देशभक्ति की दुहाई देता है,
पर इंसानियत को कचरे के ढेर में कुचलकर चला जाता है।
*हम कूड़ा नहीं, तेरे चरित्र की क्रांति हैं!*
तेरे शहरों में हमने देखा—
मंदिर, मस्जिद, स्कूल, और अस्पताल के बगल में,
तेरी सोच का सड़ा हुआ अंबार।
हम वो गवाह हैं, जो चीख-चीख कर कहते हैं—
तेरी तरक़्क़ी सिर्फ़ इंस्टाग्राम की फ़िल्टर्ड तस्वीर है,
अंदर से तू सड़ चुका है, ऐ इंसान!
*सोच, हमें पैदा किसने किया?*
हम तुझसे जन्मे हैं—
तेरे लालच से, तेरी लापरवाही से, तेरे दिखावे से।
हर उस बार जब तूने कचरा उछाला और मुँह फेर लिया,
हर उस बार जब तूने कहा, “मेरा इससे क्या?”,
तूने हमें और ताकत दी।
हम नहीं बदल सकते,
जब तक तू अपने मन का कूड़ा न झाड़े,
अपने ज़मीर का मैल न छुड़ाए।
*अब क्रांति का वक़्त है!*
हम चुप नहीं रहेंगे।
हर बदबू अब तेरे नकाब को बेनकाब करेगी।
हर ढेर अब तेरे घमंड को चुनौती देगा।
हम तेरे रास्ते से तब तक नहीं हटेंगे,
जब तक तू अपनी गली, अपना मन, और अपनी सोच साफ़ न करे।
*क्योंकि हम तो कचरा हैं—*
किसी ट्रक में मिट जाएँगे, किसी भट्टी में जल जाएँगे।
पर तू?
तू अपनी ही बनाई सड़ांध में घुटेगा,
अपने स्वार्थ की ग बुनियाद बनकर।
तू अपने झूठे विकास के भ्रम में डूबेगा,
और एक दिन, हम—हाँ, हम कचरा—
तेरी औक़ात की आख़िरी परिभाषा बन जाएँगे।
*तो सुन, ऐ इंसान!*
या तो उठ, और कचरे को साफ़ कर—
अपनी गली से, अपने मन से, अपने समाज से।
या फिर उसकी गंध में घुट-घुट कर जी।
यह तेरा आख़िरी मौका है।
जाग, और क्रांति का हिस्सा बन।
वरना, हमारी सड़ांध तुझे निगल जाएगी,
और तू सिर्फ़ एक और ढेर बनकर रह जाएगा—
सड़ता हुआ, भुला हुआ, और बेकार।
