*बस्तर: आदिवासियों के बीच रणभूमि, सवालों की अनदेखी*
*जो बस्तर कभी अपनी संस्कृति, जंगल और जल के लिए जाना जाता था, आज एक ऐसी धरती बन गया है, जहां हर पेड़ के पीछे बंदूकें छिपी हैं, और हर ख़ामोर्द।*
छत्तीसगढ़ का बस्तर—घने जंगलों, बहुरंगी आदिवासी संस्कृति और खनिज संसाधनों से भरपूर यह इलाक़ा अब नक्सलवाद और सुरक्षा बलों के बीच चल रही अनवरत जंग का केंद्र बन गया है। सरकार इसे नक्सलवाद के खिलाफ युद्ध कहती है, लेकिन इस रणभूमि का असली खामियाजा कौन भुगत रहा है? जवाब है—वो आदिवासी, जो इस जंग में न तो पक्ष हैं और न ही प्रतिपक्ष।
*तीन तरफ़ से घिरा जीवन*
बस्तर की त्रासदी यह है कि नक्सली भी आदिवासी हैं, सुरक्षा बलों में भी स्थानीय युवाओं की भर्ती होती है, और जो ग्रामीण इस हिंसा की चपेट में आते हैं—वो भी वही हैं। जब बंदूकें चलती हैं, तो किसी की पहचान ‘नक्सली’, ‘जवान’ या ‘नागरिक’ के खांचे में दर्ज हो जाती है; लेकिन कोई यह नहीं पूछता कि मारे गए कुल कितने लोग थे आदिवासी? बस्तर के गांवों में क्रॉसफायर की आहटें दहशत की तरह फैली हैं, और बच्चों के शब्दकोश में अब ‘स्कूल’ की जगह ‘सर्च ऑपरेशन’ ने ले ली है।
*जंगल के नीचे दबे सवाल*
बस्तर की धरती में सिर्फ़ खून ही नहीं बहता—यहाँ ज़मीन के नीचे लोहे, बॉक्साइट और कोयले की नदियाँ भी हैं। कॉरपोरेट्स की निगाहें इन खनिजों पर हैं, और कहा जाता है कि जिन इलाकों में खनन की संभावनाएं सबसे अधिक हैं, वहीं पर नक्सल विरोधी कार्रवाइयाँ सबसे तीव्र होती हैं। क्या यह महज़ संयोग है? या फिर विकास के नाम पर आदिवासियों को हटाने की कोई योजनाबद्ध नीति है?
विकास अगर विस्थापन बन जाए, तो वह किसी समाज को ऊपर नहीं उठाता, उसे कुचल देता है।
*नक्सलवाद: आदिवासियों की ढाल या नई जंजीर?*
नक्सलवाद की जड़ें बस्तर की उपेक्षा में हैं। जब शिक्षा नहीं दी गई, जब स्वास्थ्य सेवाएं नहीं पहुंचीं, जब रोज़गार के दरवाज़े बंद किए गए—तो उसी खाली जगह में बंदूकधारी विचार आ गए। लेकिन अब नक्सलवादी भी आदिवासियों के शोषक बन गए हैं। जबरन भर्ती, हिंसा, और विकास के हर प्रयास का विरोध करके वे उसी समाज को अंधेरे में धकेल रहे हैं, जिसके लिए लड़ने का दावा करते हैं।
सवाल है—क्या बंदूकों से बंदूकें बुझती हैं?
नीतियों की नाकामी और ज़मीनी समाधान*
सिर्फ सैन्य कार्रवाई इस समस्या का हल नहीं हो सकती। जरूरत है एक ऐसे समग्र दृष्टिकोण की, जो आदिवासियों के अधिकारों, संस्कृति और पर्यावरण को प्राथमिकता दे।
आदिवासियों की जमीनों पर कोई भी परियोजना उनकी स्पष्ट सहमति के बिना शुरू न हो।
शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार के सशक्त विकल्प उनके दरवाज़े तक लाए जाएं।
ग्राम सभाओं को निर्णयों का केंद्र बनाया जाए।
विकास की कोई भी योजना अगर “बिना आदिवासी” सोची जा रही है, तो वह विकास नहीं, विस्थापन है।
आगे की राह: हथियार नहीं, हिस्सेदारी*
बस्तर को रणभूमि से बाहर निकालकर सांस्कृतिक पुनर्जागरण का केंद्र बनाना होगा। इसके लिए ज़रूरी है कि सरकार, समाज और उद्योग एक साथ आएं और आदिवासियों को सिर्फ़ संरक्षण नहीं, सत्ता में हिस्सेदारी दें। उनकी आवाज़, उनकी परंपराएं, उनकी ज़मीन—सबको बचाना होगा।
जब तक हम यह नहीं पूछेंगे कि “इस जंग में अब तक कितने आदिवासी मारे गए?”, तब तक बस्तर की सच्चाई धुंध में छिपी रहेगी।
एक सवाल, जो अब भी बाक़ी है*
क्या हम तैयार हैं, उन आवाज़ों को सुनने के लिए जो न तो न्यूज़ बुलेटिन में आती हैं और न ही नीतियों में गूंजती हैं?
बस्तर की कहानी सिर्फ़ नक्सलवाद की नहीं है—यह उन लोगों की कहानी है, जो आज भी जंगल में अपने वजूद की लौ जलाए खड़ा हैं
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