*किरंदुल अस्पताल की एम्बुलेंस हीरोली कैंप में शव छोड़कर लौटी! रात के अंधेरे में पुलिस जवानों ने कांवड़ बनाकर पहुंचाया शव, आखिर आदिवासी अंचल में स्वास्थ्य सुविधाएं कहां हैं?*

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

*किरंदुल अस्पताल की एम्बुलेंस हीरोली कैंप में शव छोड़कर लौटी! रात के अंधेरे में पुलिस जवानों ने कांवड़ बनाकर पहुंचाया शव, आखिर आदिवासी अंचल में स्वास्थ्य सुविधाएं कहां हैं?*

बड़ा सवाल: खराब शव वाहन, महीनों से खराब एम्बुलेंस का पिछला दरवाजा और चालक का कथित इनकार! हीरोली-दोकापारा कैंप के सामने शव छोड़ने की घटना ने एनएमडीसी प्रबंधन और सरकारी विकास के दावों पर खड़े किए गंभीर सवाल।
किरंदुल/दंतेवाड़ा। एक ओर दंतेवाड़ा जिले में विकास की गाथा लिखे जाने की बातें हो रही हैं, राज्य स्तर के मंत्रियों का आना-जाना जारी है और आदिवासी क्षेत्रों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के दावे किए जा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर बेंगूर गांव की एक महिला की मृत्यु के बाद उनके शव को गृहग्राम पहुंचाने के दौरान सामने आई कथित अव्यवस्थाओं ने व्यवस्था की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला एनएमडीसी किरंदुल परियोजना अस्पताल से शुरू हुआ, लेकिन हीरोली-दोकापारा सीएएफ कैंप के सामने पहुंचकर ऐसी स्थिति बनी कि अंततः पुलिस जवानों को मानवता की मिसाल पेश करते हुए शव को गांव तक पहुंचाने में मदद करनी पड़ी।

*पहले शव वाहन खराब, फिर दूसरी एम्बुलेंस भी बनी परेशानी का कारण*

सूत्रों और परिजनों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, 11 अक्टूबर 2026 की रात करीब 9:30 बजे एक आदिवासी महिला की मृत्यु के बाद उनके शव को किरंदुल परियोजना अस्पताल से गृहग्राम बेंगूर ले जाने की व्यवस्था की गई। बताया गया कि शव ले जाने के लिए निर्धारित शव वाहन स्टार्ट नहीं हुआ। इसके बाद दूसरे एम्बुलेंस वाहन की व्यवस्था की गई, लेकिन उसका पिछला दरवाजा भी कथित तौर पर लंबे समय से खराब था।
स्थिति ऐसी बनी कि शव को एम्बुलेंस के पिछले दरवाजे से रखने के बजाय बीच के दरवाजे से बड़ी मुश्किल से अंदर रखना पड़ा। सूत्रों के अनुसार, शव को वाहन में रखने के लिए पर्याप्त कर्मचारियों की उपलब्धता को लेकर भी परेशानी हुई।
लेकिन असली सवाल इसके बाद खड़ा हुआ। जानकारी के अनुसार, शव एम्बुलेंस में रखे जाने के बाद चालक ने रात होने का हवाला देते हुए शव को गृहग्राम तक ले जाने से इनकार कर दिया। आरोप है कि चालक ने शव को एम्बुलेंस में ही छोड़ दिया और वाहन से दूर रहने लगा। बाद में मामला बिगड़ता देख एम्बुलेंस हीरोली-दोकापारा सीएएफ कैंप तक पहुंची, जहां शव को छोड़कर वाहन वापस किरंदुल लौट गया।
जब एम्बुलेंस ने साथ छोड़ा, तब पुलिस जवान बने ग्रामीणों का सहारा
हीरोली-दोकापारा सीएएफ कैंप के सामने शव को छोड़ दिए जाने के बाद ग्रामीणों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने गांव की महिला के शव को सम्मानपूर्वक गृहग्राम तक पहुंचाने की थी। बताया गया कि ग्रामीण पहले से ही एम्बुलेंस का इंतजार कर रहे थे। ऐसे कठिन समय में सीएएफ कैंप में तैनात पुलिस जवान आगे आए।
पुलिस जवानों ने ग्रामीणों के साथ मिलकर प्लास्टिक और कपड़ों की मदद से शव को लपेटकर बांधा तथा कांवड़ के सहारे गांव तक पहुंचाने में सहयोग किया। जिस समय परिवार को सहारे और संवेदनशीलता की सबसे अधिक जरूरत थी, उस समय जवानों की इस मानवीय पहल ने ग्रामीणों का दिल जीत लिया।
यह घटना पुलिस और ग्रामीणों के बीच विश्वास का एक मजबूत रिश्ता बनाने वाली मिसाल भी है। वर्दी का फर्ज केवल कानून-व्यवस्था संभालना ही नहीं, बल्कि संकट की घड़ी में इंसानियत के साथ खड़े होना भी है। हालांकि, इस मानवीय प्रयास के साथ एक बड़ा सवाल भी जुड़ा है—जिस काम के लिए एम्बुलेंस उपलब्ध कराई गई थी, उसके लिए ग्रामीणों और पुलिस जवानों को कांवड़ का सहारा क्यों लेना पड़ा?
क्या एम्बुलेंस की सीमा हीरोली कैंप तक है?
सीएएफ कैंप में तैनात जवानों से मिली जानकारी के अनुसार, दूरदराज के इलाकों से आने-जाने वाले मरीजों को लेकर भी ऐसी परेशानियां सामने आती रही हैं। बताया गया कि कई बार एम्बुलेंस कैंप के गेट तक ही आती है, जबकि बेंगूर, बड़ेपल्ली, आलनार और पुरंगेल जैसे क्षेत्रों से आने वाले मरीजों को ग्रामीणों की मदद से कांवड़ में लादकर आगे ले जाना पड़ता है। कुछ अवसरों पर पुलिस जवान भी दूरदराज के ग्रामीणों को कैंप में सहारा देते हैं।
इस मामले में यह भी सवाल उठ रहा है कि यदि एम्बुलेंस आलनार तक जा सकती थी, तो बेंगूर की महिला के शव को हीरोली कैंप में छोड़कर लौटने की नौबत क्यों आई? क्या चालक को आगे जाने में कोई वास्तविक तकनीकी या सुरक्षा संबंधी परेशानी थी? क्या अस्पताल प्रबंधन ने कोई वैकल्पिक व्यवस्था की? इन सवालों का जवाब एनएमडीसी प्रबंधन और संबंधित अधिकारियों को देना चाहिए।
एनएमडीसी से सवाल: आदिवासियों के लिए अस्पताल है, तो आपातकालीन व्यवस्था दुरुस्त क्यों नहीं?
एनएमडीसी किरंदुल परियोजना आसपास की आदिवासी आबादी के लिए एक महत्वपूर्ण औद्योगिक और स्वास्थ्य सेवा केंद्र है। ऐसे में अस्पताल में शव वाहन का खराब होना, दूसरे एम्बुलेंस के दरवाजे की कथित लंबे समय से खराब स्थिति और शव को गांव तक पहुंचाने में आई परेशानी बेहद गंभीर विषय हैं।
एनएमडीसी प्रबंधन से सीधे सवाल हैं:
क्या शव वाहन और एम्बुलेंस की नियमित तकनीकी जांच की जाती है?
यदि एम्बुलेंस का पिछला दरवाजा महीनों से खराब था, तो उसकी मरम्मत क्यों नहीं कराई गई?
क्या रात के समय मरीजों और शवों को ले जाने के लिए स्पष्ट व्यवस्था और वैकल्पिक वाहन उपलब्ध हैं?
शव को वाहन में रखने तथा जरूरत पड़ने पर परिजनों की सहायता के लिए पर्याप्त कर्मचारी क्यों उपलब्ध नहीं थे?
पूरे मामले में चालक की भूमिका और शव को कैंप में छोड़कर लौटने के आरोपों की जांच कौन करेगा?
यह केवल एक एम्बुलेंस की खराबी का मामला नहीं है। यह आपातकालीन स्वास्थ्य व्यवस्था, जवाबदेही और दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों तक सेवाएं पहुंचाने की क्षमता से जुड़ा विषय है।
सरकार से भी सवाल: बड़ेपल्ली, बेंगूर, आलनार और पुरंगेल का विकास कब पूरा होगा?
दंतेवाड़ा जिले में विकास के दावों के बीच दूरस्थ आदिवासी गांवों की बुनियादी सुविधाओं पर भी गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है। यदि मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाने और शव को गृहग्राम ले जाने के लिए ग्रामीणों को कांवड़ का सहारा लेना पड़ रहा है, तो सड़क संपर्क, स्वास्थ्य सेवाओं और आपातकालीन परिवहन की उपलब्धता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
बड़ेपल्ली, बेंगूर, आलनार और पुरंगेल जैसे क्षेत्रों में सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति को लेकर ग्रामीणों की अपेक्षाओं पर जवाब देना प्रशासन की जिम्मेदारी है।
सरकार और जिला प्रशासन से सवाल है कि इन गांवों तक पक्की सड़कें कब पहुंचेंगी? बच्चों को नियमित रूप से स्कूल आने-जाने में परेशानी कब दूर होगी? बिजली-पानी की सुविधाएं कब सुनिश्चित होंगी? और आपातकालीन स्थिति में मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाने की व्यवस्था कब मजबूत होगी?
विकास का अर्थ केवल शहरों में निर्माण कार्य, कार्यक्रमों और घोषणाओं तक सीमित नहीं हो सकता। विकास तब सार्थक होगा, जब दूरस्थ गांव के किसी परिवार को बीमारी, दुर्घटना या मृत्यु जैसी कठिन घड़ी में बुनियादी सुविधाओं के अभाव में इस तरह की परेशानी न झेलनी पड़े।
अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचने का इंतजार
बेंगूर की महिला के शव को गांव तक पहुंचाने में पुलिस जवानों और ग्रामीणों द्वारा किए गए सहयोग ने मानवता की मिसाल पेश की। लेकिन इस घटना ने व्यवस्था के सामने एक असहज सवाल भी खड़ा कर दिया है—क्या दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी को अब भी ग्रामीणों और सुरक्षाकर्मियों के सहारे पूरा किया जाता रहेगा?
एनएमडीसी प्रबंधन को अस्पताल की एम्बुलेंस व्यवस्था की जांच करानी चाहिए। जिला प्रशासन को दूरस्थ गांवों तक सड़क और स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता की समीक्षा करनी चाहिए तथा संबंधित विभागों को समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित करनी चाहिए।
आखिर कब बदलेगी इन गांवों की तस्वीर? कब सड़कें दूरियों को कम करेंगी? कब मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाने की व्यवस्था होगी? और कब विकास का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचेगा?
इंतजार है उस दिन का, जब आदिवासी परिवारों को संकट की घड़ी में कांवड़ नहीं, बल्कि मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था का सहारा मिलेगा।
सीजी संविधान न्यूज़ की ओर से संबंधित एनएमडीसी परियोजना अस्पताल प्रबंधन, जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग से अपेक्षा है कि वे मामले की जांच कर अपना आधिकारिक पक्ष रखें। संबंधित पक्षों का जवाब मिलने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाना चाहिए।
सीजी संविधान न्यूज़ | निष्पक्ष और निडर पत्रकारिता | जनता की आवाज़, सच्चाई की आवाज़

Leave a Comment

और पढ़ें

*बड़ी खबर: बचेली में अतिक्रमण की हद पार! अब मुक्तिधाम के चबूतरे पर ही बना डाली दुकान, प्रशासन ने जड़ा ताला जिंदा लोगों की जमीन पर कब्जे की खबरें तो बहुत सुनीं, अब अंतिम संस्कार की जगह भी नहीं छोड़ी!*

Buzz4 Ai

Read More Articles

*बड़ी खबर: बचेली में अतिक्रमण की हद पार! अब मुक्तिधाम के चबूतरे पर ही बना डाली दुकान, प्रशासन ने जड़ा ताला जिंदा लोगों की जमीन पर कब्जे की खबरें तो बहुत सुनीं, अब अंतिम संस्कार की जगह भी नहीं छोड़ी!*