*NMDC नौकरी की चाहत, पर परियोजना स्कूलों से दूरी: बैलाडीला आयरन ओर पब्लिक स्कूल की कहानी*
भारत में एक पुरानी कहावत है कि “सबको सरकारी नौकरी चाहिए, लेकिन सरकारी स्कूल और अस्पताल में कोई नहीं जाना चाहता।” यह कहावत न केवल सामान्य सरकारी सेवाओं पर लागू होती है, बल्कि राष्ट्रीय खनिज विकास निगम (NMDC) जैसे प्रतिष्ठित सार्वजनिक उपक्रमों पर भी सटीक बैठती है। NMDC, जो भारत का सबसे बड़ा लौह अयस्क उत्पादक और निर्यातक है, अपनी स्थिर नौकरियों और आकर्षक वेतन के लिए जाना जाता है। लेकिन, इसके परियोजना स्कूल, जैसे किरंदुल (छत्तीसगढ़) में संचालित बैलाडीला आयरन ओर पब्लिक स्कूल (BIOP), एक अलग कहानी बयां करते हैं। यह स्कूल, जो कभी बच्चों से भरा रहता था, आज कई चुनौतियों का सामना कर रहा है, जिसमें शिक्षकों की कमी और स्थानीय समुदाय, यहाँ तक कि NMDC कर्मचारियों की उदासीनता शामिल है।
*NMDC और इसकी परियोजना स्कूलों का इतिहास*
NMDC, 1958 में स्थापित एक नवरत्न सार्वजनिक उपक्रम, भारत सरकार के इस्पात मंत्रालय के अधीन कार्य करता है। यह छत्तीसगढ़ और कर्नाटक में अपने तीन पूर्ण रूप से यंत्रीकृत खदानों से 45 मिलियन टन से अधिक लौह अयस्क का उत्पादन करता है। इसके अलावा, NMDC सामाजिक जिम्मेदारी के तहत अपने परियोजना क्षेत्रों में स्कूल और अन्य सुविधाएँ संचालित करता है। किरंदुल में बैलाडीला आयरन ओर पब्लिक स्कूल (BIOP) 1968 से संचालित है और इसका उद्देश्य NMDC कर्मचारियों, संविदा श्रमिकों और स्थानीय समुदाय के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना है। यह स्कूल दंतेवाड़ा जिले में स्थित है, जो रायपुर से 550 किलोमीटर दूर है।
एक समय था जब यह स्कूल बच्चों की भीड़ से गुलजार रहता था। 40 से अधिक कक्षाओं और विशाल परिसर के साथ, यह स्कूल क्षेत्र के लिए शिक्षा का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है। विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, वर्तमान में इस स्कूल में केवल 550-600 बच्चे पढ़ रहे हैं। इनमें से NMDC कर्मचारियों के केवल 20-25 बच्चे, संविदा श्रमिकों के 90-100 बच्चे और शेष किरंदुल नगर के स्थानीय बच्चे हैं। यह आँकड़ा इस बात का स्पष्ट संकेत देता है कि NMDC कर्मचारी भी अपने बच्चों को इस स्कूल में पढ़ाने से हिचक रहे हैं।
*शिक्षकों की कमी: संविदा शिक्षकों पर निर्भरता*
स्कूल की सबसे बड़ी चुनौती है नियमित शिक्षकों की कमी। विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, BIOP स्कूल में नियमित शिक्षकों की संख्या “गिनती की” है, और अधिकांश शिक्षण कार्य संविदा शिक्षकों के भरोसे चल रहा है। प्रत्येक दो वर्षों में शिक्षकों का साक्षात्कार लिया जाता है, और बार-बार शिक्षकों की अदला-बदली होती रहती है। यह स्थिति न केवल शिक्षण की गुणवत्ता को प्रभावित करती है, बल्कि स्कूल के प्रति विश्वास को भी कम करती है।
संविदा शिक्षकों की अस्थायी प्रकृति के कारण, स्कूल में दीर्घकालिक शैक्षिक योजनाएँ बनाना मुश्किल हो जाता है। नियमित शिक्षकों की नियुक्ति न होने से पाठ्यक्रम की निरंतरता और छात्रों के प्रदर्शन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब हम देखते हैं कि NMDC जैसे नवरत्न उपक्रम, जो अपनी नौकरियों में स्थिरता और उच्च वेतन के लिए जाना जाता है, अपने ही परियोजना स्कूलों में स्थायी शिक्षकों की व्यवस्था करने में असमर्थ दिखता है।
*NMDC नौकरियाँ: आकर्षण का केंद्र*
NMDC में नौकरी की चाहत कोई नई बात नहीं है। हाल ही में, NMDC ने छत्तीसगढ़ के बैलाडीला खनन क्षेत्र में लगभग 1,000 कर्मचारियों की भर्ती की घोषणा की है, जिसमें मशीन ऑपरेटर, इंजीनियर, इलेक्ट्रीशियन, सहायक कर्मचारी और फील्ड स्टाफ जैसे पद शामिल हैं। इसके अलावा, 2025 में NMDC ने 995 प्रशिक्षु पदों (फील्ड अटेंडेंट, मेंटेनेंस असिस्टेंट, ब्लास्टर, इलेक्ट्रीशियन आदि) के लिए भर्ती अधिसूचना जारी की है। इन नौकरियों में शुरुआती वेतन 85,000 से 95,000 रुपये प्रति माह तक है, साथ ही कंपनी आवास या HRA, उच्च नौकरी सुरक्षा और अन्य सुविधाएँ भी प्रदान की जाती हैं।
इन आकर्षक अवसरों के बावजूद, NMDC कर्मचारी अपने बच्चों को अपने ही परियोजना स्कूलों में पढ़ाने से कतराते हैं। इसका कारण स्कूल की गुणवत्ता, शिक्षकों की अस्थायी नियुक्तियाँ और शायद निजी स्कूलों की ओर बढ़ता रुझान हो सकता है। यह विडंबना है कि एक ओर NMDC की नौकरियाँ स्थिरता और समृद्धि का प्रतीक हैं, वहीं इसके स्कूल उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं।
*सामाजिक जिम्मेदारी और चुनौतियाँ*
NMDC ने सामाजिक जिम्मेदारी के क्षेत्र में कई पुरस्कार जीते हैं, जैसे 2018 में कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी अवॉर्ड और 2024 में “सस्टेनेबल चैंपियन अवॉर्ड”। लेकिन, इसके परियोजना स्कूलों की स्थिति इस सामाजिक प्रतिबद्धता पर सवाल उठाती है। शिक्षा किसी भी समुदाय के विकास की नींव होती है, और अगर NMDC जैसे संगठन अपने कर्मचारियों और स्थानीय समुदाय के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित नहीं कर पाते, तो यह एक गंभीर चूक है।
किरंदुल जैसे सुदूर क्षेत्रों में, जहाँ निजी स्कूलों की उपलब्धता सीमित है, NMDC के परियोजना स्कूल स्थानीय बच्चों के लिए शिक्षा का एकमात्र साधन हो सकते हैं। लेकिन संविदा शिक्षकों पर अत्यधिक निर्भरता और नियमित शिक्षकों की कमी के कारण, इन स्कूलों का आकर्षण कम हो रहा है। यह स्थिति न केवल NMDC कर्मचारियों के बीच, बल्कि स्थानीय समुदाय में भी असंतोष पैदा कर रही है।
*समाधान की दिशा में कदम*
NMDC को अपने परियोजना स्कूलों की स्थिति सुधारने के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। कुछ संभावित समाधान निम्नलिखित हो सकते हैं:
*1:-नियमित शिक्षकों की भर्ती:* स्कूलों में स्थायी शिक्षकों की नियुक्ति को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इससे शिक्षण की गुणवत्ता और निरंतरता में सुधार होगा।
*2:-शिक्षक प्रशिक्षण और विकास:* संविदा शिक्षकों को नियमित प्रशिक्षण और दीर्घकालिक अनुबंध प्रदान किए जा सकते हैं ताकि वे स्कूल के प्रति अधिक समर्पित हों।
*3:-आधुनिक सुविधाएँ और बुनियादी ढाँचा:* स्कूलों में आधुनिक शिक्षण उपकरण, प्रयोगशालाएँ और डिजिटल संसाधनों का उपयोग बढ़ाया जाना चाहिए।
*4:-जागरूकता अभियान:* NMDC कर्मचारियों और स्थानीय समुदाय के बीच स्कूल की गुणवत्ता और महत्व को लेकर जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है।
*5:-निगरानी और मूल्यांकन:* स्कूलों की शैक्षिक गुणवत्ता और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की नियमित निगरानी होनी चाहिए ताकि कमियों को समय रहते दूर किया जा सके।
*निष्कर्ष* NMDC की नौकरियाँ भले ही स्थिरता और समृद्धि का प्रतीक हों, लेकिन इसके परियोजना स्कूलों की स्थिति एक विडंबनापूर्ण तस्वीर पेश करती है। बैलाडीला आयरन ओर पब्लिक स्कूल, जो कभी शिक्षा का गढ़ था, आज शिक्षकों की कमी और घटते विश्वास के कारण अपनी चमक खो रहा है। NMDC को अपने सामाजिक दायित्व को गंभीरता से लेते हुए, इन स्कूलों में सुधार के लिए तत्काल कदम उठाने चाहिए। केवल नौकरियों का आकर्षण ही काफी नहीं है; शिक्षा और सामुदायिक विकास के प्रति प्रतिबद्धता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। अगर NMDC अपने परियोजना स्कूलों को फिर से बच्चों और अभिभावकों की पहली पसंद बना सके, तो यह न केवल इसके कर्मचारियों, बल्कि पूरे समुदाय के लिए एक सकारात्मक बदलाव लाएगा।

