*विश्व आदिवासी दिवस पर किरंदुल में विरोधाभास: सोशल मीडिया पर बधाइयों की झड़ी, जमीन पर आदिवासियों को जगह नहीं*
किरंदुल (दंतेवाड़ा)। एक तरफ आज पूरा विश्व आदिवासियों को बधाईयां दे रहा है। किरंदुल में भी दोनों व्यापारी संघ, नगरपालिका, अन्य संस्थाएं और राजनीतिक दल विश्व आदिवासी दिवस की बधाई के सोशल मीडिया संदेशों की झड़ी लगाए हुए हैं। लेकिन जमीनी स्तर पर इन्हीं आदिवासियों के साथ इतना अन्याय क्यों?
किरंदुल के मुख्य बाजार में क्षेत्रीय ग्रामीण आदिवासियों की स्थिति बेहद दयनीय नजर आई। आसपास के गांवों से चंद घंटों के लिए व्यापार करने आए आदिवासी विक्रेताओं को बाजार में बैठने की कोई जगह नहीं मिली। मजबूरन वे मुख्य सड़क पर ही सामान लगाकर बैठ गए, जहां वाहनों की आवाजाही और दुर्घटना का खतरा लगातार बना रहता है।
स्थानीय लोगों और विक्रेताओं के अनुसार, नगरपालिका प्रशासन और दो व्यापारिक संघों की मौजूदगी के बावजूद क्षेत्रीय ग्रामीण आदिवासियों के लिए अस्थायी या स्थायी बैठने की कोई उचित व्यवस्था नहीं की गई है। मुख्य बाजार क्षेत्र में जगह की कमी का हवाला देते हुए आदिवासियों को किनारे कर दिया जाता है, जबकि वे सीमित समय के लिए ही अपना सामान बेचने आते हैं।
विश्व आदिवासी दिवस पर यह दृश्य विशेष रूप से चिंताजनक है। आदिवासी समुदाय के लोग अपने पारंपरिक उत्पादों, सब्जियों, जड़ी-बूटियों और हस्तशिल्प को बेचने के लिए दूर-दराज के गांवों से आते हैं, लेकिन बुनियादी सुविधाओं के अभाव में उन्हें जोखिम भरी स्थिति में व्यापार करना पड़ता है। सड़क पर बैठने से न सिर्फ उनकी सुरक्षा खतरे में पड़ती है, बल्कि बाजार का सामान्य यातायात भी प्रभावित होता है।
सवाल उठता है कि क्या नगरपालिका प्रशासन और व्यापारिक संघ मिलकर कोई ठोस समाधान निकालेंगे? विशेषज्ञों और स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि मुख्य बाजार के किनारे या किसी खाली स्थान पर अस्थायी शेड, निर्धारित समय स्लॉट और सुरक्षित बैठने की व्यवस्था आसानी से की जा सकती है। इससे आदिवासी विक्रेताओं को गरिमापूर्ण तरीके से व्यापार करने का अवसर मिलेगा और बाजार की व्यवस्था भी सुधरेगी।
विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर प्रशासन से अपेक्षा की जाती है कि वह सिर्फ औपचारिक कार्यक्रमों और सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित न रहे, बल्कि जमीनी स्तर पर आदिवासियों की रोजमर्रा की समस्याओं का समाधान करे। किरंदुल जैसे आदिवासी बहुल इलाके में ग्रामीण आदिवासियों को बाजार में जगह न मिलना विकास और समावेशी शासन की अवधारणा पर सवाल खड़े करता है।

