*धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस: बौद्ध धम्म के पुनरुत्थान का प्रतीक, नागार्जुन बुद्ध विहार किरंदुल से बधाई संदेश*

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*धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस: बौद्ध धम्म के पुनरुत्थान का प्रतीक, नागार्जुन बुद्ध विहार किरंदुल से बधाई संदेश*

किरंदुल, छत्तीसगढ़ (14 अक्टूबर 2025): आज धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस के अवसर पर पूरे देश में बौद्ध अनुयायी एकत्रित होकर भगवान बुद्ध के प्रथम उपदेश की स्मृति में उत्सव मना रहे हैं। यह दिवस न केवल गौतम बुद्ध द्वारा सारनाथ में दिए गए ‘धम्मचक्र प्रवर्तन’ (दु:ख, दु:ख का कारण, दु:ख निवारण और अष्टांगिक मार्ग) के संदेश को स्मरण करता है, बल्कि 14 अक्टूबर 1956 को डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा नागपुर की दीक्षाभूमि पर लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धम्म की दीक्षा लेने की ऐतिहासिक घटना का भी प्रतीक है। इस वर्ष 69वें धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस पर छत्तीसगढ़ के किरंदुल स्थित नागार्जुन बुद्ध विहार ने विशेष बधाई संदेश जारी कर समुदाय को समानता, करुणा और अहिंसा के मार्ग पर चलने का आह्वान किया है।

नागार्जुन बुद्ध विहार, किरंदुल—जो छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में स्थित एक प्रमुख बौद्ध केंद्र है—ने इस अवसर पर एक हार्दिक शुभेच्छा संदेश जारी किया: “शा सानननेचा शिल्पकार या जगामध्ये ठरला, @णीने कोटी-कोटी काळजात बुध्द कोरला। 14 ऑक्टोबर धम्मचक्र प्रवर्तन दिन निमित्त सर्वांना हार्दिक शुभेच्छा..!” यह मराठी भाषा में लिखा भावपूर्ण संदेश डॉ. आंबेडकर को ‘शासन का शिल्पकार’ (संविधान निर्माता) बताते हुए उनके द्वारा करोड़ों हृदयों में बुद्ध के धम्म को अंकित करने की महानता का गुणगान करता है। विहार के प्रबंधकों के अनुसार, यह संदेश बाबासाहेब की विरासत को जीवंत रखने का प्रयास है, जो सामाजिक न्याय और बौद्ध त्रिरत्न (बुद्ध, धम्म, संघ) के मूल्यों पर आधारित है।

*ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और विश्लेषण*

धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस की जड़ें 2500 वर्ष पूर्व सारनाथ में हैं, जहां बुद्ध ने पांच शिष्यों को अपना प्रथम उपदेश दिया था। लेकिन आधुनिक भारत में यह दिवस डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में बौद्ध धर्म के पुनरुद्धार से जुड़ गया। 1956 में विजयादशमी के दिन नागपुर में आंबेडकर ने छुआछूत और जातिवाद के खिलाफ संघर्ष के रूप में बौद्ध धम्म को अपनाया, जिससे लाखों दलित और वंचित समुदायों को नई पहचान मिली। यह घटना मात्र धार्मिक परिवर्तन नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति का प्रारंभ था—जिसने अस्पृश्यता को चुनौती दी और समानता के सिद्धांत को मजबूत किया।

विश्लेषण के दृष्टिकोण से, यह दिवस आज के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है। बढ़ती असमानता, धार्मिक कट्टरता और पर्यावरण संकट के दौर में बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग (सही दृष्टि, संकल्प, वाणी, कर्म, आजीविका, प्रयास, स्मृति और समाधि) मानवता को एकजुट करने का माध्यम बन सकता है। डॉ. आंबेडकर के अनुसार, बौद्ध धम्म ‘वैज्ञानिक’ और ‘मानवीय’ है, जो अंधविश्वासों को नकारता है। नागार्जुन बुद्ध विहार का संदेश इसी भावना को प्रतिबिंबित करता है—यह न केवल शुभकामना है, बल्कि युवा पीढ़ी को बाबासाहेब के ‘धम्म कारवां’ को आगे बढ़ाने की प्रेरणा भी देता है

*किरंदुल में उत्सव और विहार की भूमिका*

किरंदुल, जो बस्तर क्षेत्र के खनिज समृद्ध इलाके में स्थित है, आदिवासी और बौद्ध समुदायों का संगम स्थल है। नागार्जुन बुद्ध विहार—नाम प्रसिद्ध बौद्ध आचार्य नागार्जुन से प्रेरित—यहां ध्यान सत्र, बौद्ध व्याख्यान और सामाजिक सेवा के माध्यम से धम्म का प्रचार करता है। आज विहार में विशेष प्रार्थना सभा का आयोजन किया जा रहा है जिसमें स्थानीय बौद्ध अनुयायी, आदिवासी नेता और युवा शामिल होंगे । विहार के प्रमुख ने बताया, “यह दिवस हमें याद दिलाता है कि बुद्ध का धम्म कोटी-कोटी हृदयों में कैसे कोरला जा सकता है। हम डॉ. आंबेडकर के सिद्धांतों पर आधारित शिक्षा और स्वास्थ्य शिविर चलाते हैं, जो वंचितों तक पहुंचते हैं।”

देशभर में इस दिवस पर नागपुर की दीक्षाभूमि से लेकर दिल्ली के बौद्ध विहारों तक कार्यक्रम हो रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी धम्मचक्र_प्रवर्तन_दिन ट्रेंड कर रहा है, जहां लोग आंबेडकर और बुद्ध के विचारों को साझा कर रहे हैं!

नागार्जुन बुद्ध विहार द्वारा जारी बधाई संदेश ने समुदाय में उत्साह भर दिया है। विहार ने अपील की है कि सभी लोग बुद्ध के करुणा और समानता के संदेश को जीवन में उतारें, ताकि एक न्यायपूर्ण समाज का निर्माण हो सके। इस अवसर पर विहार ने सभी को हार्दिक शुभेच्छा दी: “नमो बुद्धाय! धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस की बधाई—सत्य, अहिंसा और बंधुत्व के मार्ग पर चलें।”

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