*किरंदुल में बाढ़ से लाखों का नुकसान, मुआवजा सूची में मृत व्यक्ति का नाम: धोखाधड़ी की साजिश का आरोप*
दंतेवाड़ा, 15 सितंबर 2025: छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के किरंदुल इलाके में हालिया भारी बारिश ने मांसाहारी बाजार और आसपास के इलाकों को बुरी तरह प्रभावित किया है। मटन मार्केट और करीब 10-15 घरों में पानी घुसने से व्यापारियों और निवासियों को लाखों रुपये का नुकसान हुआ है। लेकिन इस आपदा के बीच मुआवजा वितरण की प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं। व्हाट्सएप ग्रुप में घूम रही एक सूची में एक मृत व्यक्ति का नाम शामिल होने से धोखाधड़ी की आशंका जताई जा रही है, जिसने पूरे वार्ड नंबर 8 में हलचल मचा दी है।
स्थानीय निवासियों के अनुसार, बारिश के कारण जलभराव से बाजार क्षेत्र में 2-3 फीट तक पानी भर गया, जिससे दुकानें, घरेलू सामान और व्यवसाय बुरी तरह प्रभावित हुए। प्रभावितों ने मुआवजा की मांग की है, और सूची में कई नाम शामिल हैं जो वाजिब लगते हैं। लेकिन सूची में प्रदीप जायसवाल का नाम देखकर लोग हैरान हैं। बताया जा रहा है कि प्रदीप जायसवाल की मौत 3-4 साल पहले हो चुकी है। सूची में उनके नाम पर दावा किया गया सामान एक गीजर है, जो आमतौर पर घरों में 6 फीट की ऊंचाई पर लगा होता है। जलभराव की ऊंचाई को देखते हुए यह दावा संदिग्ध लग रहा है, क्योंकि पानी इतनी ऊंचाई तक नहीं पहुंचा।
वार्ड नंबर 8 के निवासियों में इस मुद्दे पर चर्चा जोरों पर है। एक स्थानीय निवासी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “आपदा के समय कुछ लोग अवसर की तलाश में लग जाते हैं। लाखों का नुकसान हुआ है, लेकिन फर्जी नामों से मुआवजा हड़पने की कोशिश निंदनीय है।” सूची की प्रामाणिकता पर सवाल उठाते हुए कई लोगों ने कहा कि यह स्पष्ट रूप से फर्जी लगती है।
मृत प्रदीप जायसवाल के परिवार ने इस मामले पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। परिवार के सदस्यों से बातचीत में उन्होंने कहा, “यह हमारे भाई को बदनाम करने की साजिश है। वार्ड नंबर 8 में कोई दूसरा प्रदीप जायसवाल नहीं है, और जितने भी जायसवाल परिवार हैं, वे सब हमारे रिश्तेदार हैं। हमें इस सूची की कोई जानकारी नहीं थी।” परिवार ने मांग की है कि मुआवजा सूची की पूरी जांच की जाए। उन्होंने कहा, “जो असली पीड़ित हैं, उन्हें 100 प्रतिशत मुआवजा मिलना चाहिए। लेकिन मृत व्यक्ति के नाम पर दावा करने वालों को कड़ी सजा दी जाए। हम सरकार से अपील करते हैं कि इस मामले की गहन जांच हो।”
यह घटना आपदा प्रबंधन और राहत वितरण प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी को उजागर करती है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में स्थानीय प्रशासन को सूचियों की सत्यापन प्रक्रिया को मजबूत करना चाहिए, ताकि असली पीड़ितों को न्याय मिले और धोखेबाजों पर लगाम लगे। दंतेवाड़ा जिला प्रशासन से इस संबंध में अभी कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन स्थानीय स्तर पर जांच की मांग तेज हो गई है।
यदि यह धोखाधड़ी साबित होती है, तो यह न केवल मुआवजा प्रक्रिया पर सवाल उठाएगी, बल्कि आपदा के समय में नैतिकता और प्रशासनिक विश्वसनीयता पर भी प्रभाव डालेगी। प्रभावित इलाके के निवासी अब प्रशासन से त्वरित कार्रवाई की उम्मीद कर रहे हैं, ताकि न्याय की प्रक्रिया बिना किसी बाधा के आगे बढ़ सके।
