*भूतपूर्व सैनिक स्वर्गीय मनोहरलाल के परिवार की पुकार: कोर्ट के आदेश के बाद भी नहीं मिली जमीन, सरकारी लापरवाही और न्याय की अनदेखी*
किरंदुल, दंतेवाड़ा (मध्य प्रदेश): देश की सेवा में जीवन समर्पित करने वाले भूतपूर्व सैनिक स्वर्गीय मनोहरलाल के परिवार का दर्द आज भी थमने का नाम नहीं ले रहा। कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद, उनकी जमीन पर अवैध कब्जा करने वाले रमेश प्रसाद उपाध्याय ने 1520 वर्ग फीट जमीन को खाली नहीं किया। यह मामला न केवल एक परिवार के साथ अन्याय को दर्शाता है, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और कोर्ट के आदेशों की अवहेलना का गंभीर उदाहरण भी प्रस्तुत करता है। स्वर्गीय मनोहरलाल , जिन्होंने देश की रक्षा के लिए अपनी जिंदगी दांव पर लगाई, उनके परिवार को आज थाना और तहसील के चक्कर काटने को मजबूर होना पड़ रहा है। यह स्थिति न केवल किरंदुल के लिए, बल्कि पूरे समाज के लिए शर्मिंदगी का सबब है।
*मामले की पृष्ठभूमि: एक सैनिक की जमीन पर कब्जा*
स्वर्गीय मनोहरलाल , पिता भगवानदास, एक भूतपूर्व सैनिक थे, जिन्हें शासन द्वारा किरंदुल में खसरा नंबर 215/2, रकबा 5.00 एकड़ जमीन आवंटित की गई थी। इस जमीन का एक हिस्सा, यानी 1520 वर्ग फीट (729 वर्ग फीट पर मकान और 900 वर्ग फीट पर आंगन), रमेश प्रसाद उपाध्याय, पिता सहदेव प्रसाद, निवासी किरंदुल ने अनधिकृत रूप से कब्जा कर लिया। मनोहरलाल ने अपने जीवित रहते इस अतिक्रमण के खिलाफ कानूनी लड़ाई शुरू की। मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता 1959 की धारा 250 और 251 के तहत दायर इस मामले में, अनुविभागीय अधिकारी (दंडाधिकारी) राजस्व, दंतेवाड़ा ने 25 सितंबर 1991 को ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया कि रमेश प्रसाद का कब्जा अवैध है और जमीन को सात दिनों के भीतर मनोहरलाल को वापस सौंपा जाए। आदेश में यह भी चेतावनी दी गई कि यदि कब्जा नहीं हटाया गया, तो सिविल कारागार की कार्यवाही की जाएगी।
*कोर्ट का आदेश और उसकी अवहेलना*
सीमांकन प्रतिवेदन और साक्ष्यों के आधार पर कोर्ट ने पाया कि विवादित जमीन मनोहरलाल के नाम पर दर्ज है। रमेश प्रसाद को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया, लेकिन उन्होंने कोई ठोस सबूत या स्थगन आदेश प्रस्तुत नहीं किया। कोर्ट ने एकपक्षीय कार्यवाही के तहत मनोहरलाल के पक्ष में फैसला सुनाया। गवाह श्री दोग्गा, पिता हिम्मा, ने भी मनोहरलाल के भूतपूर्व सैनिक होने और जमीन पर उनके अधिकार की पुष्टि की। कोर्ट ने रमेश प्रसाद को जमीन खाली करने का सख्त निर्देश दिया, लेकिन आज, 34 साल बाद भी, यह आदेश कागजों तक सीमित है। रमेश प्रसाद ने न केवल कोर्ट के आदेश की अवहेलना की, बल्कि जमीन पर अवैध कब्जा बनाए रखा। यह एक भूतपूर्व सैनिक के सम्मान और न्यायपालिका की गरिमा पर सीधा प्रहार है।
*परिवार का संघर्ष: दर-दर की ठोकरें*
स्वर्गीय मनोहरलाल की मृत्यु के बाद, उनका परिवार इस जमीन को वापस पाने के लिए लगातार संघर्ष कर रहा है। परिवार के सदस्य थाना, तहसील और अन्य सरकारी कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन हर बार उन्हें केवल आश्वासन ही मिलता है। कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद, प्रशासन की निष्क्रियता और लापरवाही ने परिवार को निराशा के गर्त में धकेल दिया है। एक ओर जहां देश अपने सैनिकों को सम्मान देने की बात करता है, वहीं दूसरी ओर मनोहरलाल जैसे सैनिक के परिवार को इंसाफ के लिए भटकना पड़ रहा है। यह स्थिति न केवल प्रशासन की विफलता को उजागर करती है, बल्कि यह सवाल भी उठाती है कि क्या एक सैनिक का बलिदान और उसका सम्मान इतना सस्ता है?
*प्रशासन की लापरवाही: कोर्ट के आदेश का मखौल*
यह मामला प्रशासनिक लापरवाही का जीता-जागता सबूत है। कोर्ट ने सात दिनों के भीतर जमीन खाली करने का आदेश दिया था, लेकिन तीन दशकों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। न तो तहसीलदार ने सीमांकन के आधार पर कब्जा हटाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया, न ही पुलिस ने कोर्ट के आदेश को लागू करने में कोई रुचि दिखाई। यह न केवल कोर्ट की अवहेलना है, बल्कि एक भूतपूर्व सैनिक के परिवार के साथ घोर अन्याय भी है। में बिहार के एक मामले में, पुलिस की लापरवाही के कारण कोर्ट ने थानेदारों पर जुर्माना लगाया था, जब उन्होंने कोर्ट के आदेशों का पालन नहीं किया। किरंदुल में भी यही स्थिति प्रतीत होती है, जहां प्रशासन की उदासीनता ने एक सैनिक के परिवार को इंसाफ से वंचित कर दिया।
*सैनिक का सम्मान और समाज का दायित्व*
स्वर्गीय मनोहरलाल ने देश की रक्षा के लिए अपने जीवन के सुनहरे वर्ष समर्पित किए। उनके नाम पर आवंटित जमीन उनके परिवार की आजीविका का आधार थी। लेकिन इस जमीन पर अवैध कब्जे और प्रशासन की निष्क्रियता ने उनके परिवार को आर्थिक और भावनात्मक रूप से तोड़ दिया है। यह स्थिति किरंदुल ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए शर्मनाक है। एक सैनिक, जो देश की सीमाओं पर दुश्मनों से लड़ा, उसका परिवार आज अपने ही हक के लिए लड़ रहा है। क्या यही सम्मान है जो हम अपने सैनिकों को देते हैं? में उत्तराखंड के एक मामले में, शहीद रमेश थापा के परिवार को 20 साल बाद भी जमीन नहीं मिली, जो सरकारी वादों की हकीकत को दर्शाता है।
*कानूनी और सामाजिक सवाल*
यह मामला कई गंभीर सवाल उठाता है। पहला, जब कोर्ट का आदेश इतना स्पष्ट है, तो प्रशासन उसका पालन क्यों नहीं कर रहा? दूसरा, क्या एक भूतपूर्व सैनिक का परिवार, जो पहले ही अपने प्रियजन को खो चुका है, को इस तरह दर-दर भटकने के लिए छोड़ देना उचित है? तीसरा, रमेश प्रसाद जैसे लोग कोर्ट के आदेश की अवहेलना कर खुले में कैसे घूम सकते हैं? यह न केवल कानून का मखौल है, बल्कि समाज के नैतिक मूल्यों पर भी प्रश्नचिह्न है। में एक कहानी में बताया गया कि कानून हर नागरिक को न्याय की गारंटी देता है, लेकिन इसके लिए हिम्मत और सही कानूनी कदम उठाने की जरूरत है। मनोहरलाल का परिवार हिम्मत दिखा रहा है, लेकिन प्रशासन की उदासीनता उनके रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा है।
*आवश्यक कदम और मांग*
मनोहरलाल के परिवार को इंसाफ दिलाने के लिए निम्नलिखित कदम तत्काल उठाए जाने चाहिए:
*1:-कोर्ट के आदेश का पालन:* प्रशासन को तत्काल प्रभाव से कोर्ट के 25 सितंबर 1991 के आदेश को लागू करना चाहिए और रमेश प्रसाद से 1520 वर्ग फीट जमीन खाली कराकर परिवार को सौंपनी चाहिए।
*2:-दोषियों पर कार्रवाई:* कोर्ट की अवहेलना करने वाले रमेश प्रसाद के खिलाफ सिविल कारागार की कार्यवाही शुरू की जाए।
*3:-प्रशासनिक जवाबदेही:* तहसील और पुलिस अधिकारियों की लापरवाही की जांच हो और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की जाए।
*4:-भूतपूर्व सैनिकों के लिए नीति:* भूतपूर्व सैनिकों और उनके परिवारों के लिए जमीन विवादों को प्राथमिकता पर निपटाने की विशेष नीति बनाई जाए।
*निष्कर्ष:* एक सैनिक के सम्मान की रक्षास्वर्गीय मनोहरलाल के परिवार का यह संघर्ष केवल एक जमीन का मामला नहीं है, बल्कि यह एक सैनिक के सम्मान, उनके बलिदान और उनके परिवार के हक की लड़ाई है। प्रशासन की लापरवाही और कोर्ट के आदेश की अवहेलना ने इस परिवार को दशकों तक इंसाफ से वंचित रखा है। यह समय है कि किरंदुल प्रशासन जागे और मनोहरलाल के परिवार को उनकी जमीन वापस दिलाए। यह न केवल एक परिवार को न्याय देगा, बल्कि देश के उन सभी सैनिकों को सम्मान देगा, जो हमारे लिए अपनी जान जोखिम में डालते हैं। यदि यह अन्याय जारी रहा, तो यह समाज और प्रशासन के माथे पर एक काला धब्बा बनकर रह जाएगा।
सवाल यह है: आखिर कब तक एक सैनिक का परिवार इंसाफ के लिए भटकेगा? क्या एक सैनिक का सम्मान इतना सस्ता है कि उसे यूं ही कुचला जा सकता है? किरंदुल प्रशासन को अब जवाब देना होगा, और मनोहरलाल के परिवार को उनका हक दिलाना होगा।

