*दंतेवाड़ा में एनएमडीसी भर्ती विवाद: सयुक्त पंचायत का अनिश्चितकालीन हड़ताल, स्थानीय रोजगार की मांग तेज*
दंतेवाड़ा, 28 जून 2025: छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर संभाग के दंतेवाड़ा, सुकमा और बीजापुर जिलों के सयुक्त पंचायत के ग्रामीणों ने नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (एनएमडीसी) की किरंदुल और बचेली परियोजना को तीसरे दिन भी अनिश्चितकालीन हड़ताल के जरिए पूरी तरह ठप कर दिया है। ग्रामीणों ने चेक पोस्ट जाम कर परियोजना में आवाजाही को रोक रखा है, जिससे एनएमडीसी को प्रतिदिन करोड़ों रुपये का नुकसान हो रहा है। इस आंदोलन की मुख्य मांग है कि एनएमडीसी की L1 और L2 भर्तियों में स्थानीय प्रभावित निवासियों को प्राथमिकता दी जाए और भर्ती प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाए।
*हड़ताल का कारण: स्थानीय रोजगार की मांग*
दंतेवाड़ा, सुकमा और बीजापुर के ग्रामीणों का कहना है कि एनएमडीसी की खनन परियोजनाओं से उनके क्षेत्र की प्राकृतिक संपदा का दोहन हो रहा है, लेकिन स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसरों में प्राथमिकता नहीं मिल रही। प्रदर्शनकारी मांग कर रहे हैं कि L1 (फील्ड अटेंडेंट) और L2 (मेंटेनेंस असिस्टेंट) जैसे पदों पर भर्ती केवल स्थानीय लोगों के लिए हो। इसके अलावा, वे चाहते हैं कि लिखित परीक्षा पेपर आधारित हो, न कि कंप्यूटर आधारित, ताकि स्थानीय युवा, जिनमें से कई तकनीकी सुविधाओं से वंचित हैं, आसानी से हिस्सा ले सकें।
ग्रामीणों का तर्क है कि जिस तरह केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) ने ‘बस्तर फाइटर’ योजना के तहत बस्तर के स्थानीय युवाओं को भर्ती में प्राथमिकता दी, उसी तरह एनएमडीसी को भी बस्तर के लोगों को प्राथमिकता देनी चाहिए। एक प्रदर्शनकारी ने कहा, “हमारी जमीन, हमारे जंगल, हमारे खनिज निकाले जा रहे हैं, लेकिन नौकरियां बाहरी लोगों को दी जा रही हैं। यह अन्याय है।”
*तीसरे दिन का घटनाक्रम: तनाव और समर्थन*
हड़ताल के तीसरे दिन स्थिति तनावपूर्ण रही। दूसरे दिन की वार्ता में संयुक्त कलेक्टर, एनएमडीसी अधिकारियों और प्रदर्शनकारियों के बीच सहमति बनी थी कि बिजली और जल विभाग के कर्मचारियों को आवश्यक कार्यों के लिए प्रवेश की अनुमति दी जाएगी, बशर्ते प्रबंधन उनकी सूची उपलब्ध कराए। हालांकि, सुबह 9:30 बजे तक कोई सूची नहीं दी गई। इस बीच, कुछ एनएमडीसी कर्मचारियों ने प्रदर्शनकारियों को नजरअंदाज कर कार्यालय में प्रवेश की कोशिश की, जिससे विवाद की स्थिति पैदा हो गई। प्रदर्शनकारियों ने शांति बनाए रखते हुए सभी को रोकने का प्रयास किया और बार-बार सूची की मांग की।
इस बीच, जिला कांग्रेस कमिटी के पदाधिकारी और पूर्व विधायक देवती कर्मा धरना स्थल पर पहुंचीं और ग्रामीणों की मांग को जायज बताते हुए अपना समर्थन व्यक्त किया। उन्होंने कहा, “स्थानीय लोगों का हक है कि उन्हें उनकी जमीन पर होने वाले विकास का लाभ मिले। एनएमडीसी को भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता देनी चाहिए।”
*पहले भी उठ चुकी है आवाज*
यह पहली बार नहीं है जब दंतेवाड़ा में एनएमडीसी की भर्ती प्रक्रिया को लेकर विरोध हुआ है। जून 2025 में भांसी में पंचायतों की संयुक्त बैठक में एनएमडीसी की भर्ती प्रक्रिया को रद्द करने और 15 दिनों के भीतर नए नियमों के तहत भर्ती शुरू करने की मांग उठी थी। उस समय भी स्थानीय लोगों ने भर्ती प्रक्रिया में खामियों का आरोप लगाया था। इसके अलावा, 2022 में भी दंतेवाड़ा के कटेकल्याण तहसील में आदिवासियों ने एनएमडीसी में नौकरी की मांग को लेकर प्रदर्शन किया था, जिससे यह साफ हो गया था कि स्थानीय लोग अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो चुके हैं।
*आर्थिक नुकसान और सामाजिक प्रभाव*
इस हड़ताल से एनएमडीसी को प्रतिदिन करोड़ों रुपये का नुकसान हो रहा है, क्योंकि किरंदुल और बचेली परियोजनाएं देश की सबसे बड़ी लौह अयस्क खनन परियोजनाओं में से हैं। यह नुकसान न केवल कंपनी के लिए, बल्कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए भी चिंता का विषय है। हालांकि, प्रदर्शनकारी इसे अपनी आजीविका और सम्मान की लड़ाई मानते हैं।
स्थानीय विश्लेषकों का कहना है कि बस्तर जैसे नक्सल प्रभावित क्षेत्र में रोजगार के अवसरों का अभाव युवाओं को असंतोष की ओर ले जाता है। एनएमडीसी जैसी बड़ी परियोजनाओं से स्थानीय लोगों को रोजगार मिलने से न केवल उनकी आर्थिक स्थिति सुधरेगी, बल्कि क्षेत्र में सामाजिक स्थिरता और शांति को भी बढ़ावा मिलेगा।
*प्रशासन और एनएमडीसी की प्रतिक्रिया*
दूसरे दिन की वार्ता विफल होने के बाद प्रशासन और एनएमडीसी प्रबंधन पर दबाव बढ़ रहा है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि प्रबंधन जानबूझकर सूची उपलब्ध नहीं करा रहा, ताकि स्थिति को उलझाया जा सके। वहीं, एनएमडीसी के अधिकारियों ने अभी तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है। स्थानीय प्रशासन ने शांति बनाए रखने की अपील की है और जल्द ही एक और दौर की वार्ता की उम्मीद जताई है।
*आगे की राह*
यह आंदोलन बस्तर के आदिवासियों के लिए केवल रोजगार की मांग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उनके आत्मसम्मान और अपनी जमीन पर हक की लड़ाई का प्रतीक है। विशेषज्ञों का मानना है कि एनएमडीसी और प्रशासन को इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करना होगा। यदि स्थानीय युवाओं को भर्ती में प्राथमिकता दी जाती है और प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाता है, तो यह न केवल आंदोलन को शांत करेगा, बल्कि क्षेत्र में विकास और विश्वास की नई शुरुआत करेगा।
प्रदर्शनकारी स्पष्ट कर चुके हैं कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं, वे हड़ताल जारी रखेंगे। इस बीच, बस्तर के इस आंदोलन ने पूरे देश का ध्यान खींचा है, और यह सवाल उठ रहा है कि क्या भारत की खनन नीतियां स्थानीय समुदायों के हितों को पर्याप्त महत्व दे रही हैं?

