*मलंगीर-किरंदुल जलप्रदाय योजना: भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा एक अधूरा सपना*
किरंदुल, छत्तीसगढ़: वर्ष 2015 में शुरू हुई मलंगीर-किरंदुल नगरीय जलप्रदाय योजना, जो क्षेत्रवासियों के लिए स्वच्छ पेयजल का सपना लेकर आई थी, आज दस साल बाद भी अधूरी पड़ी है। इस योजना के तहत मलंगीर नदी पर इन्टेक वेल, पंप हाउस, जलशुद्धिकरण संयंत्र और 20.132 किलोमीटर लंबी 150 मिमी व्यास की अशुद्ध जल वाहिनी का निर्माण होना था। मगर, यह महत्वाकांक्षी परियोजना भ्रष्टाचार, लापरवाही और प्रशासनिक उदासीनता की भेंट चढ़ गई है। निविदा के दस्तावेजों और स्थानीय लोगों के बयानों के आधार पर यह खबर इस योजना की विफलता और इसके पीछे के काले सच को उजागर करती है।
*योजना का स्वप्निल आरंभ*
सन् 2015 में, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (पीएचईडी), छत्तीसगढ़ ने किरंदुल नगर के लिए स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से मलंगीर नदी पर आधारित जलप्रदाय योजना की शुरुआत की। इस योजना के लिए 29 दिसंबर 2015 को निविदा क्रमांक 1454/निक्र.34/य.ले.लि. जारी की गई, जिसकी अनुमानित लागत 340.56 लाख रुपये थी। मेसर्स आर.पी.जी. इन्फ्रास्ट्रक्चर, जगदलपुर को यह ठेका 14.99% अधिक दर पर, यानी कुल 391.609 लाख रुपये में सौंपा गया।
योजना के तहत मलंगीर नदी पर 6 मीटर व्यास का इन्टेक वेल, 3.5 मीटर चौड़ा पहुंच पुल, पंप हाउस, और जलशुद्धिकरण संयंत्र का निर्माण होना था। इसके अतिरिक्त, 20.132 किलोमीटर लंबी डीआई क्लास K9 पाइपलाइन बिछाई जानी थी, जिसमें सभी आवश्यक फिटिंग्स, स्लूस वाल्व, और सिविल कार्य शामिल थे। कार्य की समय सीमा 12 महीने (वर्षा ऋतु सहित) निर्धारित की गई थी, यानी 2016 के अंत तक यह परियोजना पूर्ण होनी थी।
*दिखावे का निर्माण, अधूरी हकीकत*
दस साल बाद, 2025 में, यह परियोजना अब भी अपने लक्ष्य से कोसों दूर है। निविदा दस्तावेजों के अनुसार, कार्य की गुणवत्ता पर सख्त निगरानी और DGS&D/SGS/Rites जैसे मान्यता प्राप्त संस्थानों द्वारा सामग्री का निरीक्षण अनिवार्य था। लेकिन स्थानीय सूत्रों और क्षेत्र के निवासियों के अनुसार, न तो गुणवत्ता मानकों का पालन किया गया और न ही कार्य समय पर पूरा हुआ।
हैरानी की बात यह है कि मलंगीर नदी पर प्रस्तावित इन्टेक वेल के बजाय, मदाढ़ी नाले पर एक दिखावटी एनिकट बनाया गया। पंप हाउस और फिल्टर हाउस का निर्माण तो हुआ, लेकिन वह भी केवल कागजी दिखावा साबित हुआ। पाइपलाइन बिछाने, जो इस योजना का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा थी, का कार्य आज तक पूरा नहीं हुआ। स्थानीय निवासियों का कहना है कि कुछ स्थानों पर पाइपलाइन बिछाई गई, लेकिन वह निम्न गुणवत्ता की थी और कई जगहों पर टूट-फूट के कारण बेकार हो चुकी है।
*भ्रष्टाचार का गहरा साया*
इस परियोजना की विफलता के पीछे भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं। स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि ठेकेदार और अधिकारियों की मिलीभगत के कारण न केवल धन का दुरुपयोग हुआ, बल्कि गुणवत्ता पर भी समझौता किया गया। निविदा शर्तों के अनुसार, ठेकेदार को सामग्री के वाउचर, डिलीवरी चालान और अन्य दस्तावेज जमा करने थे, लेकिन कई सूत्रों का दावा है कि इन दस्तावेजों में हेरफेर किया गया।
एक स्थानीय निवासी, रमेश साहू (बदला हुआ नाम), ने बताया, “पाइपलाइन का काम शुरू हुआ था, लेकिन कुछ महीनों बाद ठप पड़ गया। जो पाइप बिछाए गए, वे मानक के अनुरूप नहीं थे। कई जगहों पर पाइप फट गए, और पानी की सप्लाई शुरू होने से पहले ही पाइपलाइन बेकार हो गई।”
सामाजिक कार्यकर्ता अनिल ठाकुर ने इस मामले में गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा, “यह परियोजना भ्रष्टाचार का शिकार हो गई है। ठेकेदार ने निम्न गुणवत्ता की सामग्री का उपयोग किया, और अधिकारियों ने इसकी अनदेखी की। 391 लाख रुपये से अधिक का बजट होने के बावजूद, किरंदुल के लोग आज भी पेयजल के लिए तरस रहे हैं।”
*तकनीकी और प्रशासनिक लापरवाही*
निविदा दस्तावेजों में साफ उल्लेख है कि कार्य की गुणवत्ता निर्धारित मापदंडों के अनुरूप होनी चाहिए, और पाइपों की जांच उप-अभियंताओं, सहायक अभियंताओं और कार्यपालन अभियंता द्वारा की जानी थी। लेकिन स्थानीय सूत्रों का कहना है कि ऐसी कोई सख्त जांच नहीं हुई। डीआई K9 पाइपों को ISI मार्क और DGS&D/SGS/Rites द्वारा प्रमाणित होना था, लेकिन कई जगहों पर गैर-मानक पाइपों का उपयोग होने की शिकायतें मिलीं।
इसके अलावा, मलंगीर नदी के बजाय मदाढ़ी नाले पर एनिकट बनाने का निर्णय भी सवालों के घेरे में है। विशेषज्ञों का कहना है कि मदाढ़ी नाला मलंगीर नदी की तुलना में कम जलक्षमता वाला है, और यह निर्णय तकनीकी रूप से गलत था। यह बदलाव बिना किसी ठोस कारण के किया गया, जिससे परियोजना की विश्वसनीयता पर सवाल उठे।
*जनता की निराशा*
किरंदुल के निवासियों के लिए यह योजना एक उम्मीद की किरण थी, लेकिन दस साल बाद भी अधूरी रहने के कारण यह निराशा का कारण बन गई है। स्थानीय निवासी सुनीता बाई ने कहा, “हमें बताया गया था कि इस योजना से हमें 24 घंटे स्वच्छ पानी मिलेगा, लेकिन आज भी हमें टैंकरों और हैंडपंपों पर निर्भर रहना पड़ता है। सरकार और ठेकेदारों ने हमें सिर्फ झूठे वादे दिए।”
*क्या है समाधान?*
इस परियोजना की विफलता ने न केवल सरकारी धन का दुरुपयोग किया, बल्कि किरंदुल की जनता के विश्वास को भी ठेस पहुंचाई। विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का सुझाव है कि इस मामले की उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए। भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए एक स्वतंत्र समिति गठित की जानी चाहिए, और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
साथ ही, परियोजना को पूरा करने के लिए नई समय सीमा और सख्त निगरानी तंत्र स्थापित करने की आवश्यकता है। स्थानीय लोगों की भागीदारी और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए प्रगति की नियमित जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए।
*निष्कर्ष* मलंगीर-किरंदुल जलप्रदाय योजना, जो किरंदुल की जनता के लिए स्वच्छ पेयजल का वादा लेकर आई थी, आज भ्रष्टाचार और लापरवाही का प्रतीक बन चुकी है। 391.609 लाख रुपये की लागत वाली यह परियोजना दस साल बाद भी अधूरी है, और इसके पीछे ठेकेदारों, अधिकारियों और प्रशासनिक तंत्र की विफलता साफ दिखाई देती है। यदि समय रहते इस मामले की जांच और सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो यह योजना एक और सरकारी विफलता के रूप में इतिहास में दर्ज हो जाएगी।

