*किरंदुल मुख्य बाजार में अतिक्रमण की मार: ग्रामीण सब्जी विक्रेताओं की अनसुनी पुकार*

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*किरंदुल मुख्य बाजार में अतिक्रमण की मार: ग्रामीण सब्जी विक्रेताओं की अनसुनी पुकार*

 

किरंदुल (छत्तीसगढ़): किरंदुल का मुख्य बाजार, जो कभी आसपास के ग्रामीणों के लिए अपनी उपज बेचने का एकमात्र सहारा था, आज अतिक्रमण की चपेट में है। सप्ताहिक बाजार में जहां गांवों से आए आदिवासी और ग्रामीण अपनी सब्जियां और अन्य उत्पाद बेचने के लिए आते हैं, वहां अब रेत, गिट्टी और निर्माण सामग्री के ढेर ने उनकी जगह छीन ली है। कुछ रसूखदारों द्वारा सड़कों पर हफ्तों से रखी गई यह सामग्री न केवल बाजार की व्यवस्था को बिगाड़ रही है, बल्कि ग्रामीणों के लिए जीविका का संकट भी पैदा कर रही है। इस अतिक्रमण के पीछे स्थानीय व्यापारियों की दादागिरी और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी ने स्थिति को और जटिल बना दिया है।

*अतिक्रमण की जड़ें और ग्रामीणों की परेशानी*

किरंदुल का मुख्य बाजार क्षेत्रीय ग्रामीणों के लिए एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र है। आसपास के गांवों से आदिवासी और छोटे किसान अपनी सब्जियां, अनाज और अन्य उत्पाद लेकर यहां आते हैं। लेकिन हाल के महीनों में, बाजार की सड़कों पर रेत और गिट्टी के ढेर ने उनकी जगह को घेर लिया है। ये सामग्री, जो कुछ रसूखदारों द्वारा भवन निर्माण के लिए रखी गई है, हफ्तों से सड़क पर पड़ी है। इसके कारण बाजार में बैठने की जगह कम हो गई है, और ग्रामीणों को अपनी सब्जियां बेचने के लिए पर्याप्त स्थान नहीं मिल रहा।

स्थानीय ग्रामीण पोड़िया कड़ती ने बताया, “हम सुबह-सुबह अपनी सब्जियां लेकर आते हैं, लेकिन यहां जगह ही नहीं मिलती। रेत और गिट्टी के ढेर ने आधा बाजार घेर लिया है। बाहर मुख्य सड़क पर बैठने की जगह नहीं, और अगर बैठें तो व्यापारी या उनके लोग भगा देते हैं।” कई बार तो हालात इतने बदतर हो जाते हैं कि व्यापारी ग्रामीणों को डराने-धमकाने के लिए उनके सामान पर पानी तक डाल देते हैं।

*एनएमडीसी के टीना शेड पर भी कब्जा*

राष्ट्रीय खनिज विकास निगम (एनएमडीसी) ने ग्रामीणों और आदिवासियों के लिए बाजार में टीना शेड बनवाए थे, ताकि वे बारिश और धूप से बचकर अपनी उपज बेच सकें। लेकिन इन शेड्स पर भी कुछ स्थानीय व्यापारियों और रसूखदारों ने कब्जा कर लिया है। कुछ महीने पहले नगर पालिका के अधिकारियों ने अभियान चलाकर इन शेड्स को खाली करवाया था, लेकिन अब स्थिति फिर जस की तस हो गई है। अतिक्रमणकारी वापस लौट आए हैं, और ग्रामीणों को इन शेड्स में जगह नहीं दी जा रही।

एक महिला सब्जी विक्रेता, भिमे कुंजाम , ने गुस्से में कहा, “ये शेड हमारे लिए बनाए गए थे, लेकिन अब वहां बड़े व्यापारी अपने सामान रखते हैं। हमें बैठने की जगह मांगने पर धमकाया जाता है। कभी-कभी तो हमारे सामान पर पानी डालकर भगा दिया जाता है। हमारी सुनने वाला कोई नहीं है।”

*जनप्रतिनिधियों की चुप्पी और व्यापारियों की दादागिरी*

इस पूरे मामले में स्थानीय जनप्रतिनिधियों की चुप्पी सबसे ज्यादा चिंताजनक है। ग्रामीणों का आरोप है कि कुछ रसूखदार जनप्रतिनिधि अतिक्रमणकारियों के साथ मिले हुए हैं। यही कारण है कि सड़कों पर रेत और गिट्टी के ढेर को हटाने के लिए कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो रही। एक स्थानीय निवासी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “जो लोग सड़क पर निर्माण सामग्री रख रहे हैं, उनके पीछे कुछ बड़े लोग हैं। जनप्रतिनिधि उनके सामने कुछ बोलने से डरते हैं।”

वहीं, व्यापारियों की दादागिरी ने भी ग्रामीणों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। बाजार में जगह को लेकर आए दिन विवाद हो रहे हैं। कुछ व्यापारी न केवल सड़कों पर अतिक्रमण कर रहे हैं, बल्कि ग्रामीण विक्रेताओं को डराने-धमकाने का काम भी कर रहे हैं। इससे बाजार में तनाव का माहौल बना हुआ है।

*प्रशासन की नाकामी और बार-बार लौटता अतिक्रमण*

नगर पालिका ने समय-समय पर अतिक्रमण हटाने के लिए अभियान चलाए हैं, लेकिन ये अभियान केवल औपचारिकता बनकर रह गए हैं। कुछ दिन पहले चले एक अभियान में टीना शेड्स को खाली करवाया गया था, लेकिन कुछ ही दिनों बाद अतिक्रमणकारी फिर से हावी हो गए। स्थानीय प्रशासन की निष्क्रियता और नियमित निगरानी की कमी के कारण यह समस्या बार-बार उभर रही है।

प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि वे शिकायत मिलने पर कार्रवाई करते हैं, लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि ऐसी कार्रवाइयां केवल दिखावे के लिए होती हैं। एक ग्रामीण ने कहा, “अधिकारी आते हैं, कुछ सामान हटाते हैं, और चले जाते हैं। लेकिन कुछ ही दिनों में सब वैसा ही हो जाता है। हमारी शिकायतों का कोई स्थायी समाधान नहीं निकलता।”

*ग्रामीणों की पुकार: कौन सुनेगा?*

किरंदुल के मुख्य बाजार में अतिक्रमण की समस्या केवल सड़कों पर रेत और गिट्टी तक सीमित नहीं है। यह एक गहरी सामाजिक और आर्थिक समस्या का प्रतीक है, जहां गरीब और आदिवासी समुदायों की आजीविका को नजरअंदाज किया जा रहा है। ये ग्रामीण अपनी रोजी-रोटी के लिए बाजार पर निर्भर हैं, लेकिन अतिक्रमण और व्यापारियों की दादागिरी ने उनकी कमाई का जरिया छीन लिया है।

स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता राजेश कोर्राम ने इस मुद्दे पर कहा, “यह सिर्फ अतिक्रमण की समस्या नहीं है, यह आदिवासियों और गरीब ग्रामीणों के अधिकारों का हनन है। प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को चाहिए कि वे इस मामले में सख्ती बरतें और ग्रामीणों के लिए बाजार में उचित जगह सुनिश्चित करें।”

*समाधान की राह*

इस समस्या के समाधान के लिए कुछ ठोस कदम उठाने की जरूरत है। सबसे पहले, नगर पालिका को नियमित निगरानी और सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करनी होगी। अतिक्रमण हटाने के अभियान को केवल औपचारिकता तक सीमित नहीं करना चाहिए, बल्कि इसका पालन भी करवाना चाहिए।

दूसरा, टीना शेड्स को उनके मूल उद्देश्य—ग्रामीण और आदिवासी विक्रेताओं के उपयोग—के लिए सुरक्षित करना होगा। इसके लिए प्रशासन को स्थानीय व्यापारियों और रसूखदारों पर नकेल कसनी होगी।

तीसरा, जनप्रतिनिधियों को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। उनकी चुप्पी इस समस्या को और बढ़ावा दे रही है। ग्रामीणों की शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए, उन्हें बाजार में उचित स्थान और सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए।

*निष्कर्ष* किरंदुल का मुख्य बाजार आज एक ऐसी जंग का मैदान बन गया है, जहां गरीब ग्रामीणों और आदिवासियों की आजीविका रसूखदारों और व्यापारियों की दादागिरी के सामने दम तोड़ रही है। प्रशासन की निष्क्रियता और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह न केवल ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति को प्रभावित करेगा, बल्कि क्षेत्र में सामाजिक तनाव को भी बढ़ाएगा। सवाल यह है कि आखिर इन ग्रामीणों की पुकार सुनेगा कौन? क्या प्रशासन और जनप्रतिनिधि इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाएंगे, या यह अनसुनी पुकार बाजार की भीड़ में दबकर रह जाएगी?

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