*किरंदुल के नागार्जुन बुद्ध विहार में धूमधाम से मनाई गई बुद्ध पूर्णिमा: त्रिगुण पूर्णिमा का विशेष महत्व*

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*किरंदुल के नागार्जुन बुद्ध विहार में धूमधाम से मनाई गई बुद्ध पूर्णिमा: त्रिगुण पूर्णिमा का विशेष महत्व*

किरंदुल, 12 मई 2025: छत्तीसगढ़ के किरंदुल में स्थित नागार्जुन बुद्ध विहार में बुद्ध पूर्णिमा का पर्व बौद्ध समाज द्वारा हर वर्ष की तरह इस बार भी बड़े ही हर्षोल्लास और भक्ति-भाव के साथ मनाया गया। यह पर्व, जिसे वैशाख पूर्णिमा या वेसाक के नाम से भी जाना जाता है, बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भगवान गौतम बुद्ध के जन्म, ज्ञान प्राप्ति (बुद्धत्व) और महापरिनिर्वाण की स्मृति को समर्पित है। इस वर्ष, नागार्जुन बौद्ध विकास समिति के तत्वावधान में आयोजित इस उत्सव ने त्रिगुण पूर्णिमा के रूप में अपनी विशेष पहचान बनाई, जो बुद्ध के जीवन की तीन प्रमुख घटनाओं को एक साथ जोड़ती है।

*नागार्जुन बुद्ध विहार: बौद्ध संस्कृति का केंद्र*

किरंदुल का नागार्जुन बुद्ध विहार न केवल धार्मिक, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का भी प्रमुख केंद्र है। नागार्जुन बौद्ध विकास समिति द्वारा आयोजित बुद्ध पूर्णिमा का यह उत्सव स्थानीय बौद्ध समाज के लिए एकता और आध्यात्मिक जागरूकता का प्रतीक बन चुका है। समिति के सदस्यों और बौद्ध उपासक-उपासिकाओं ने विहार को फूलों, रंग-बिरंगे ध्वजों और दीपों से सजाया, जिससे पूरा परिसर भगवान बुद्ध की करुणा और शांति के संदेश से आलोकित हो उठा।

*त्रिगुण पूर्णिमा: बुद्ध के जीवन की त्रिवेणी*

बुद्ध पूर्णिमा को त्रिगुण पूर्णिमा के रूप में मनाने की परंपरा इस पर्व को और भी विशिष्ट बनाती है। यह दिन भगवान बुद्ध के जीवन की तीन महत्वपूर्ण घटनाओं—जन्म, बुद्धत्व प्राप्ति और महापरिनिर्वाण—को एक साथ स्मरण करने का अवसर प्रदान करता है। जैसा कि धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख है, 563 ईसा पूर्व वैशाख पूर्णिमा के दिन लुंबिनी (वर्तमान नेपाल) में राजकुमार सिद्धार्थ गौतम का जन्म हुआ था। इसी दिन, 35 वर्ष की आयु में बोधगया के बोधि वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई, और 483 ईसा पूर्व में 80 वर्ष की आयु में कुशीनगर में उनका महापरिनिर्वाण हुआ। इन तीनों घटनाओं का एक ही दिन पर घटित होना बौद्ध धर्म में इसे अद्वितीय महत्व प्रदान करता है।

नागार्जुन बुद्ध विहार में आयोजित समारोह में इस त्रिकुण पूर्णिमा के महत्व को विशेष रूप से रेखांकित किया गया। समिति के वरिष्ठ सदस्य और उपासक बी आर डांगे बताया, “बुद्ध पूर्णिमा केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि भगवान बुद्ध के जीवन और उनके उपदेशों से प्रेरणा लेने का अवसर है। त्रिकुण पूर्णिमा हमें उनके जन्म से लेकर निर्वाण तक की यात्रा को समझने और उनके शांति, करुणा और अहिंसा के संदेश को आत्मसात करने की प्रेरणा देती है।”

*परित्राण पाठ और सामूहिक पूजा*

बुद्ध पूर्णिमा का उत्सव नागार्जुन बुद्ध विहार में शाम के सायंकाल में परित्राण पाठ के साथ शुरू हुआ। बौद्ध उपासक और उपासिकाओं ने सामूहिक रूप से त्रिरत्न (बुद्ध, धम्म, संघ) और पंचशील का पाठ किया। यह पाठ बौद्ध धर्म की मूल शिक्षाओं को दोहराने और उनके प्रति अपनी निष्ठा को पुनर्जनन करने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके बाद, भगवान बुद्ध की प्रतिमा पर फल, फूल, और मिठाइयों का अर्पण किया गया, और अगरबत्ती व दीप प्रज्वलन के साथ पूजा-अर्चना की गई।

विशेष रूप से, बोधि वृक्ष की पूजा भी इस अवसर पर आयोजित की गई। उपासक-उपासिकाओं ने वृक्ष की शाखाओं को रंगीन पताकाओं और फूलों से सजाया, और इसकी जड़ों में दूध और सुगंधित जल अर्पित किया। यह परंपरा भगवान बुद्ध को बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे प्राप्त हुए ज्ञान की स्मृति को जीवित रखती है।

*सामाजिक कार्य और दान-पुण्य*

बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर नागार्जुन बौद्ध विकास समिति के विष्णु नागेश ने कहा सामाजिक कार्यों पर भी विशेष ध्यान दिया। बौद्ध धर्म की करुणा और दान की भावना को जीवित रखते हुए, समिति ने इसके अलावा, पिंजरों में बंद पक्षियों को मुक्त करने के लिऐ प्रेरित किया , जो बौद्ध धर्म में सभी प्राणियों के प्रति करुणा और स्वतंत्रता के संदेश को दर्शाता है।

समिति की सक्रिय सदस्य और उपासिका विजया डांगे ने कहा, “बुद्ध पूर्णिमा हमें न केवल भगवान बुद्ध की शिक्षाओं का पालन करने, बल्कि समाज में शांति और समानता के लिए काम करने की प्रेरणा देती है। हमारा प्रयास है कि इस पर्व के माध्यम से हम अपने समुदाय को और मजबूत करें और बुद्ध के संदेश को हर घर तक पहुंचाएं।”

*बौद्ध समाज की एकता और उत्साह*

किरंदुल के बौद्ध समाज ने इस उत्सव को एक सामुदायिक आयोजन के रूप में मनाया, जिसमें सभी आयु वर्ग के लोग शामिल हुए। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, सभी ने परित्राण पाठ, बुद्ध वंदना, और सामूहिक ध्यान सत्र में भाग लिया। विशेष रूप से, युवाओं ने बौद्ध धर्म के चार आर्य सत्यों और अष्टांगिक मार्ग पर आधारित चर्चाओं में सक्रिय हिस्सा लिया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि बुद्ध की शिक्षाएं आज भी प्रासंगिक और जीवन को दिशा देने वाली हैं।

स्थानीय निवासी और बौद्ध उपासक आनंद सितापराओ उत्सव के बारे में कहा, “नागार्जुन बुद्ध विहार में बुद्ध पूर्णिमा का आयोजन हर साल हमें एक नई ऊर्जा देता है। यह पर्व हमें अपने अंदर की शांति को खोजने और दूसरों के प्रति करुणा दिखाने का अवसर देता है।”

*त्रिगुण पूर्णिमा का वैश्विक संदेश*

बुद्ध पूर्णिमा का यह उत्सव न केवल किरंदुल, बल्कि विश्व भर में बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है। भारत, श्रीलंका, थाईलैंड, जापान, चीन, नेपाल, और अन्य देशों में यह पर्व विभिन्न रूपों में मनाया जाता है। श्रीलंका में इसे ‘वेसाक’ के रूप में मनाया जाता है, जो वैशाख शब्द का अपभ्रंश है। विश्व भर में बौद्ध अनुयायी बोधगया, सारनाथ, और कुशीनगर जैसे पवित्र स्थलों पर एकत्रित होकर प्रार्थना करते हैं और बुद्ध की शिक्षाओं का पाठ करते हैं।

किरंदुल में इस वर्ष का उत्सव त्रिगुण पूर्णिमा के रूप में विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा, क्योंकि यह न केवल धार्मिक, बल्कि सामाजिक और आध्यात्मिक एकता का प्रतीक बना। नागार्जुन बौद्ध विकास समिति ने इस अवसर पर बुद्ध के उपदेशों, जैसे कि “शांति व्यक्ति के अंदर से आती है, इसे बाहर खोजने की कोशिश न करें” और “बुराई को प्रेम से ही खत्म किया जा सकता है,” को जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प लिया।

*निष्कर्ष*  किरंदुल के नागार्जुन बुद्ध विहार में मनाई गई बुद्ध पूर्णिमा ने एक बार फिर बौद्ध समाज की एकता, भक्ति, और सामाजिक जिम्मेदारी को प्रदर्शित किया। त्रिगुण पूर्णिमा के रूप में इस पर्व ने भगवान बुद्ध के जीवन की तीन प्रमुख घटनाओं को स्मरण करते हुए उनके शांति, करुणा, और अहिंसा के संदेश को जीवित रखा। यह उत्सव न केवल किरंदुल के बौद्ध समाज, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए एक प्रेरणा स्रोत बना, जो हमें सिखाता है कि सत्य और प्रेम की राह पर चलकर ही मानव जीवन को सार्थक बनाया जा सकता है।नोट: यह खबर किरंदुल के नागार्जुन बुद्ध विहार में आयोजित बुद्ध पूर्णिमा उत्सव के आधार पर तैयार की गई है, जिसमें स्थानीय परंपराओं और त्रिकुण पूर्णिमा के महत्व को विशेष रूप से उजागर किया गया है।

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