*किरंदुल में सब्जी व्यापारियों की खुली लूट: किराए के तराजू से ग्राहकों को ठगा जा रहा, खाद्य विभाग की चुप्पी पर सवाल*
किरंदुल, छत्तीसगढ़: किरंदुल के निवासियों के लिए सब्जी खरीदना अब एक महंगा और ठगी भरा सौदा बनता जा रहा है। उड़ीसा और जगदलपुर से आने वाले सब्जी व्यापारियों पर आरोप है कि वे किराए के तराजू के जरिए स्थानीय ग्राहकों को लूट रहे हैं। यह सुनकर आपको आश्चर्य हो सकता है कि आखिर सब्जी व्यापारी कैसे लूट सकते हैं? तो आइए, इस खुली लूट की पूरी कहानी को विस्तार से समझते हैं और उन सवालों के जवाब तलाशते हैं जो इस घोटाले को उजागर करते हैं।
*किराए के तराजू का खेल: कैसे हो रही है ठगी?*
किरंदुल में उड़ीसा और जगदलपुर से आने वाले सब्जी व्यापारी अपने साथ तराजू और बाट नहीं लाते। इसके बजाय, वे स्थानीय स्तर पर किराए पर तराजू लेते हैं। सब्जी बिक्री के बाद ये व्यापारी तराजू और उसका किराया चुका कर चले जाते हैं। लेकिन इस साधारण-सी प्रक्रिया में एक बड़ा घोटाला छिपा है।
जिन तराजुओं को ये व्यापारी किराए पर लेते हैं, उनकी जांच खाद्य विभाग द्वारा वर्षों से नहीं की गई है। नियमानुसार, खाद्य विभाग को हर साल व्यावसायिक तराजुओं की जांच कर उस पर सरकारी मुहर (सील) लगानी होती है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि तौल सही है और ग्राहकों को ठगा नहीं जा रहा। लेकिन किरंदुल में किराए पर दिए जाने वाले इन तराजुओं पर न तो कोई सरकारी मुहर है और न ही इनकी कोई जांच हुई है।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इन तराजुओं से ग्राहकों को सही मात्रा में सब्जियां मिल रही हैं? बिना जांच और बिना मुहर वाले तराजू से तौलने का मतलब है कि व्यापारी मनमाने ढंग से कम मात्रा में सब्जी देकर ग्राहकों से पूरा पैसा वसूल रहे हैं। यह एक तरह की खुली लूट है, जिसमें ग्राहक हर दिन ठगा जा रहा है, लेकिन उसे इसकी भनक तक नहीं लगती।
*तराजू किराए पर देने वाला कौन? मुख्य आरोपी की तलाश*
इस पूरे खेल में एक अहम सवाल यह है कि ये तराजू किराए पर कौन दे रहा है? क्या तराजू किराए पर देने वाले व्यक्ति या समूह ने इनकी जांच कराई है? क्या इन तराजुओं पर खाद्य विभाग की मुहर मौजूद है? अगर नहीं, तो इस धोखाधड़ी में मुख्य आरोपी कौन है—सब्जी व्यापारी, तराजू किराए पर देने वाला, या फिर इसकी अनदेखी करने वाला खाद्य विभाग?
स्थानीय निवासियों का कहना है कि किराए के तराजू का यह खेल लंबे समय से चल रहा है, लेकिन खाद्य विभाग ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया। एक स्थानीय निवासी, जगदीश (बदला हुआ नाम), ने बताया, “हम हर दिन सब्जी खरीदते हैं, लेकिन हमें क्या पता कि हमें 1 किलो की जगह 800 ग्राम ही मिल रहा है? यह तो सीधे-सीधे हमारी जेब काटने जैसा है।”
*खाद्य विभाग की भूमिका पर सवाल*
खाद्य विभाग की जिम्मेदारी है कि वह बाजारों में इस्तेमाल होने वाले तराजुओं और बाटों की नियमित जांच करे। लेकिन किरंदुल में यह व्यवस्था पूरी तरह से चरमराई हुई प्रतीत होती है। सूत्रों के अनुसार, किराए के तराजुओं की जांच न होने की शिकायतें पहले भी विभाग तक पहुंची हैं, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
स्थानीय व्यापारी संघ के एक सदस्य ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “यह एक सुनियोजित खेल है। तराजू किराए पर देने वाले और कुछ व्यापारी आपस में मिले हुए हैं। खाद्य विभाग के कुछ अधिकारियों की मिलीभगत के बिना यह इतने बड़े पैमाने पर नहीं चल सकता।”
*ग्राहकों पर आर्थिक बोझ*
किरंदुल जैसे छोटे शहर में, जहां अधिकांश परिवार मध्यम वर्ग या निम्न आय वर्ग से हैं, इस तरह की ठगी का सीधा असर उनकी जेब पर पड़ता है। एक अनुमान के मुताबिक, अगर एक परिवार प्रतिदिन 100 रुपये की सब्जी खरीदता है और उसे 10-20% कम मात्रा में सामान मिलता है, तो महीने में उसका नुकसान 300-600 रुपये तक हो सकता है। पूरे शहर के स्तर पर यह आंकड़ा लाखों में पहुंच जाता है।
*क्या कहते हैं विशेषज्ञ?*
वाणिज्य और उपभोक्ता मामलों के विशेषज्ञ डॉ. अजय वर्मा का कहना है, “बिना जांचे तराजू का इस्तेमाल उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम का उल्लंघन है। यह न केवल आर्थिक ठगी है, बल्कि ग्राहकों के विश्वास के साथ खिलवाड़ भी है। खाद्य विभाग को तत्काल इस मामले में हस्तक्षेप कर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।”
*मांग उठ रही कार्रवाई की*
स्थानीय निवासियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस मामले में खाद्य विभाग से तत्काल कार्रवाई की मांग की है। सामाजिक कार्यकर्ता मीना ठाकुर ने कहा, “यह सिर्फ किरंदुल की समस्या नहीं है। पूरे देश में ऐसी अनियमितताएं चल रही हैं। हम मांग करते हैं कि खाद्य विभाग न केवल इन तराजुओं की जांच करे, बल्कि दोषी व्यापारियों और तराजू किराए पर देने वालों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज करे।”

