*बीजापुर जिला अस्पताल और 108 एम्बुलेंस की लापरवाही: मरीजों की जान जोखिम में, प्रशासन मौन*
बीजापुर, छत्तीसगढ़: जिला अस्पताल और 108 एम्बुलेंस सेवा की लापरवाही ने एक बार फिर मरीजों और उनके परिजनों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। ताजा मामला बीजापुर के एजुकेशन सिटी के समीप का है, जहां एक दर्दनाक हादसे ने प्रशासन की पोल खोल दी। अशोक कडियम और उनकी 9 वर्षीय बेटी एक मोटरसाइकिल दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गए। यह घटना शाम करीब 7:30 बजे की है, लेकिन 108 एम्बुलेंस की लचर व्यवस्था और जिला अस्पताल की उदासीनता ने घायलों को समय पर मदद नहीं पहुंचाई। इस घटना ने न केवल स्थानीय लोगों में आक्रोश पैदा किया है, बल्कि जिला अस्पताल और 108 सेवा की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
*घंटों की देरी, फोन पर जवाब तक नहीं*
जानकारी के मुताबिक, हादसे के तुरंत बाद स्थानीय लोगों ने 108 एम्बुलेंस को फोन कर मदद मांगी, लेकिन एक घंटे तक कोई एम्बुलेंस मौके पर नहीं पहुंची। परिजनों और आसपास के लोगों का आरोप है कि 108 सेवा का कॉल सेंटर बार-बार फोन करने पर भी जवाब नहीं देता। एक स्थानीय निवासी ने गुस्से में कहा, “जब जान पर बन आती है, तब भी ये लोग फोन नहीं उठाते। अगर समय पर एम्बुलेंस आ जाए, तो कई जिंदगियां बच सकती हैं।”
लगभग एक घंटे की देरी के बाद जब एम्बुलेंस पहुंची, तो जिला अस्पताल में घायलों की गंभीर हालत देखते हुए उन्हें डिमरापाल रिफर कर दिया गया। लेकिन यहां भी लापरवाही का सिलसिला खत्म नहीं हुआ।
*एक एम्बुलेंस में चार मरीज, मेडिकल स्टाफ गायब*
जिला अस्पताल की व्यवस्था तब और सवालों के घेरे में आ गई, जब गंभीर रूप से घायल पिता और पुत्री को अलग-अलग एम्बुलेंस में भेजा गया। हैरानी की बात यह है कि दोनों एम्बुलेंस में पहले से ही दो-दो अन्य मरीजों को ठूंस दिया गया था। एक एम्बुलेंस में चार मरीजों को ले जाने के कारण परिजनों के लिए बैठने की जगह तक नहीं बची। कई बार तो खड़े होने की जगह भी नहीं थी।
इससे भी बड़ी लापरवाही यह थी कि एम्बुलेंस में कोई मेडिकल स्टाफ मौजूद नहीं था। परिजनों ने सवाल उठाया, “अगर रास्ते में मरीज की हालत बिगड़ जाए, तो हम क्या करें? न डॉक्टर, न नर्स, न कोई उपकरण। यह एम्बुलेंस है या मरीजों को मौत के मुंह में ले जाने वाली गाड़ी?” गंभीर मरीजों के साथ इस तरह की लापरवाही न केवल अमानवीय है, बल्कि मरीजों की जान से खिलवाड़ है।
*8-10 महीनों से जारी है लापरवाही*
यह कोई इकलौता मामला नहीं है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जिला अस्पताल और 108 एम्बुलेंस की यह मनमानी पिछले 8 से 10 महीनों से बदस्तूर जारी है। ग्रामीणों ने बताया कि 108 सेवा को फोन करने पर या तो कॉल नहीं उठाई जाती, या फिर एम्बुलेंस को पहुंचने में घंटों लग जाते हैं। कई बार तो मरीजों को निजी वाहनों से अस्पताल ले जाना पड़ता है, जो गरीब परिवारों के लिए आर्थिक बोझ बन जाता है।
एक अन्य ग्रामीण ने बताया, “जिला अस्पताल में न तो पर्याप्त डॉक्टर हैं, न ही उपकरण। हर गंभीर मरीज को डिमरापाल या रायपुर रिफर कर दिया जाता है। लेकिन रिफर करने के बाद भी एम्बुलेंस की हालत ऐसी कि मरीज रास्ते में ही दम तोड़ दे।”
*परिजनों में आक्रोश, प्रशासन खामोश*
इस घटना के बाद अशोक कडियम और उनकी बेटी के परिजनों में जिला अस्पताल और 108 सेवा के खिलाफ खासा आक्रोश देखा गया। परिजनों ने कहा, “हमारे मरीज की जान खतरे में थी, लेकिन एम्बुलेंस में न जगह थी, न मेडिकल स्टाफ। हमारी सुनने वाला कोई नहीं है।” कई अन्य परिवारों ने भी अपनी आपबीती सुनाई और जिला प्रशासन से इस लापरवाही की जांच की मांग की।
*जिम्मेदार कौन?*
इस मामले में जिला अस्पताल के अधिकारियों और 108 एम्बुलेंस सेवा के प्रबंधन से जवाब मांगा गया, लेकिन कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिला। जिला अस्पताल के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि “कर्मचारियों और संसाधनों की कमी के कारण ऐसी समस्याएं आ रही हैं।” वहीं, 108 सेवा के एक कर्मचारी ने पल्ला झाड़ते हुए कहा, “हमें ऊपर से निर्देश मिलते हैं, हम वही करते हैं।”
*ग्रामीणों की मांग: सख्त कार्रवाई और सुधार*
इस घटना ने बीजापुर के ग्रामीणों में प्रशासन के प्रति गुस्सा भर दिया है। लोग मांग कर रहे हैं कि जिला अस्पताल में डॉक्टरों और उपकरणों की कमी को दूर किया जाए, 108 एम्बुलेंस सेवा की जवाबदेही तय की जाए, और गंभीर मरीजों के लिए अलग एम्बुलेंस की व्यवस्था हो। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द ही सुधार नहीं हुए, तो वे सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन करेंगे।
*निष्कर्ष: जान बचाने की व्यवस्था या जान लेने का साधन?*
बीजापुर जिला अस्पताल और 108 एम्बुलेंस सेवा की यह लापरवाही न केवल एक परिवार की त्रासदी है, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए एक बड़ा खतरा है। जब मरीजों की जान बचाने वाली व्यवस्था ही उनकी जान जोखिम में डाल रही हो, तो सवाल उठता है कि आखिर जिम्मेदार कौन है? क्या जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग इस मामले में सख्त कदम उठाएंगे, या यह सिलसिला यूं ही चलता रहेगा? ग्रामीणों की नाराजगी और मरीजों की तकलीफ अब एक बड़े आंदोलन का रूप ले सकती है, अगर उनकी सुनवाई नहीं हुई।
