*किरंदुल बाजार: कुबेर नगरी का ये कैसा ‘मुख्य बाजार’? सिर्फ 50-70 मीटर में सिमटी सच्चाई, आदिवासी महिला की मजबूरी और नगरपालिका की खुली ढिलाई*
किरंदुल… छत्तीसगढ़ की कुबेर नगरी। लौह अयस्क की खदानों से चमकने वाला यह शहर आज अपने मुख्य बाजार को लेकर एक ऐसी सच्ची तस्वीर पेश कर रहा है जो किसी भी संवेदनशील नागरिक के मन में गुस्सा पैदा करने वाली है।
सवाल सीधा और तीखा है—क्या किरंदुल का पूरा बाजार महज 50 से 70 मीटर मुख्य सड़क में सिमट कर रह गया है? नगरपालिका के नक्शे में वार्ड क्रमांक 8 को ‘मुख्य बाजार’ के नाम से अंकित किया गया है। लेकिन हकीकत क्या है? दुकानें हैं, व्यापारी हैं, पर ग्राहक नहीं। लोग जाना चाहते हैं, लेकिन जगह नहीं। दो व्यापारिक संगठन एक ही बात को लेकर परेशान हैं—बाजार के अंदर की दुकानों तक ग्राहक कैसे पहुँचे? और जवाब सिर्फ एक है: नगरपालिका की ढिलाई।
बाजार का मुहाना ही इस तरह बंद कर दिया गया है कि अंदर घुसना मुश्किल हो गया है। नगरपालिका बैठकें करती है, व्यापारियों से ‘सहमति’ लेती है, और फिर सब कुछ दिखावा बनकर रह जाता है। असली काम शून्य। पूरा बाजार त्रस्त है। व्यापारी भाइयों के व्यापार के लिए कोई ठोस रास्ता नहीं निकाला जा रहा। नगरपालिका के खिलाफ आरोप सीधे हैं—ढील-ढाल रवैया, दिखावटी कार्रवाई और बाजार को जानबूझकर दमघोंटू बना देना।
आज की सबसे विचलित करने वाली तस्वीर देखिए। आसपास के किसी गाँव से आई एक आदिवासी महिला कच्चा केला बेचने किरंदुल बाजार पहुँची। जगह नहीं मिली। मजबूरन दो गाड़ियों के बीच, भीड़ से दूर, जहाँ किसी की नजर नहीं जाती, अपना सामान लगा बैठी। नगरपालिका कर्मचारी कहते हैं—“रोड पर गाँव वालों को लगाने से हम मना नहीं कर सकते।” सही बात। लेकिन असली सवाल ये है—
आज किरंदुल बाजार की सड़क पर जितने भी सब्जी व्यवसायी बैठे थे, वे सभी ओडिशा, जगदलपुर या किरंदुल क्षेत्र से बाहर के थे। स्थानीय किरंदुल या आसपास के क्षेत्र का एक भी चेहरा नजर नहीं आया। बड़े व्यापारी ओडिशा जैसे राज्यों से आकर सड़क पर बैठ जाते हैं, ‘ग्रामीणों के नाम’ पर जगह घेर लेते हैं, और स्थानीय आदिवासी-ग्रामीण कहाँ जाएँ? अपना सामान कहाँ बेचें? इसकी जिम्मेदारी किसकी?
नगरपालिका की जिम्मेदारी। लेकिन नगरपालिका चुप है। बाजार के अंदर की दुकानों तक पहुँच बंद, बाहर सड़क पर बाहरी व्यापारियों का कब्जा, और स्थानीय आदिवासी महिला को दो गाड़ियों के बीच छिपकर बेचना पड़ रहा है। ये कैसा मुख्य बाजार है? ये कैसी कुबेर नगरी है?
व्यापारिक संगठन बार-बार कह रहे हैं—ग्राहक अंदर तक कैसे पहुँचे? नगरपालिका सिर्फ दिखावा करती है। बैठकें होती हैं, सहमति ली जाती है, और फिर सब ठंडा पड़ जाता है। बाजार का मुहाना बंद, अंदर की दुकानें सूनी, और सड़क पर बाहरी व्यापारियों का राज। स्थानीय आदिवासियों के लिए जगह नहीं। ये सिर्फ लापरवाही नहीं, ये खुला अन्याय है।
किरंदुल के नागरिकों से सवाल है—क्या आप इस दिखावे के बाजार को स्वीकार करेंगे? क्या नगरपालिका को जवाबदेह ठहराने का समय नहीं आ गया? वार्ड क्रमांक 8 का ‘मुख्य बाजार’ सिर्फ नक्शे में है, जमीन पर नहीं। 50-70 मीटर में सिमटा यह बाजार अब सवाल बन चुका है। नगरपालिका की ढिलाई से पूरा बाजार त्रस्त है। आदिवासी महिला की मजबूरी किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के दिल को छूने वाली है।
नगरपालिका को अब जवाब देना होगा। बाजार को खोलना होगा। स्थानीय व्यापारियों और आदिवासियों को जगह देनी होगी। नहीं तो कुबेर नगरी का ये मुख्य बाजार सिर्फ एक दिखावा बनकर रह जाएगा—जहाँ दुकानें हैं, व्यापारी हैं, लेकिन व्यापार नहीं। और गुस्सा बढ़ता जा रहा है।

