*किरंदुल मुख्य बाजार: आपातकाल में भी बंद रास्ता… नगरपालिका की लापरवाही या जानबूझकर उपेक्षा?*

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*किरंदुल मुख्य बाजार: आपातकाल में भी बंद रास्ता… नगरपालिका की लापरवाही या जानबूझकर उपेक्षा?*

दंतेवाड़ा/किरंदुल। छत्तीसगढ़ की कुबेर नगरी कही जाने वाली किरंदुल की नगरपालिका परिषद की लापरवाही अब जानलेवा साबित हो रही है। वार्ड क्रमांक-8 के मुख्य बाजार का मुहाना, जहाँ से बाजार में प्रवेश होता है और सैकड़ों लोग रहते-व्यापार करते हैं, इतनी बदहाल और संकरी हालत में है कि आपातकाल में एम्बुलेंस, अग्निशमन वाहन, पुलिस वाहन और सबसे ज्यादा शव वाहन तक आसानी से नहीं पहुँच पाते।

आज फिर मुख्य बाजार में एक एम्बुलेंस को घुसने में भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। रास्ता इतना संकरा और दुकानों-अतिक्रमण से घिरा है कि न तो तिरपाल ठीक से खुलते हैं, न दुकानदार जगह देते हैं। जब बाजार के किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है और शव वाहन को अंदर जाना होता है, तब स्थिति और भी दयनीय हो जाती है—न जगह, न सहयोग, न व्यवस्था।

प्रशासन सोया, जनप्रतिनिधि वोट की राजनीति में व्यस्त

जिला कलेक्टर तक इस पूरे मामले की जानकारी है, फिर भी किरंदुल नगरपालिका के अधिकारी और जनप्रतिनिधि गहरी नींद में सोए हुए हैं। कोई भी शव वाहन या आपातकालीन वाहनों के लिए उचित रास्ता सुनिश्चित करने की चिंता नहीं कर रहा। स्थानीय आरोप है कि जनप्रतिनिधि सिर्फ वोट की राजनीति में लिप्त हैं। अपनी कुर्सी और वोट बैंक की चिंता तो है, लेकिन आम नागरिक की जान-माल की सुरक्षा की कोई फिक्र नहीं।

मुख्य बाजार किरंदुल का सबसे व्यस्त व्यापारिक केंद्र होने के साथ सैकड़ों परिवारों का निवास स्थान भी है। यहाँ की सड़क की यह हालत न सिर्फ शर्मनाक है, बल्कि आपात स्थिति में जानलेवा भी साबित होती है। अगर आग लग जाए, कोई गंभीर रूप से बीमार हो या दुर्घटना हो जाए, तो बचाव दल समय पर कैसे पहुँचेगा?

सवाल प्रशासन से

नगरपालिका परिषद कब तक इस महत्वपूर्ण मार्ग को चौड़ा और सुगम बनाएगी?

अतिक्रमण हटाने और आपातकालीन मार्ग सुरक्षित रखने की कोई ठोस योजना है या नहीं?

वार्ड पार्षद और नगरपालिका अध्यक्ष नगरपालिका अधिकारी अपनी जिम्मेदारी कब निभाएंगे?

किरंदुल जैसे औद्योगिक नगर में, जहाँ एनएमडीसी जैसी बड़ी कंपनियाँ हैं, मूलभूत व्यवस्था की इतनी बदहाली नगरपालिका की नाकामी और जनप्रतिनिधियों की उदासीनता को साफ दर्शाती है। लोग पूछ रहे हैं—क्या वोट के अलावा किसी की जान की कोई कीमत नहीं?

यह सिर्फ एक बाजार का मुद्दा नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही का बड़ा सवाल है। अगर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो  पहले की तरह किसी दिन कोई बड़ी घटना हो सकती है, तब जिम्मेदार कौन होगा?

स्थानीय आवाज: “एम्बुलेंस तक नहीं घुस पा रही, शव वाहन की तो बात ही छोड़ो। नगरपालिका वाले कब जागेंगे?”

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