*किरंदुल में मौत का भी कारोबार! पोस्टमॉर्टम के लिए परिवार से पैसे वसूलने की क्रूरता, जायका मालिक ने ठोका तमाचा*

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*किरंदुल में मौत का भी कारोबार! पोस्टमॉर्टम के लिए परिवार से पैसे वसूलने की क्रूरता, जायका मालिक ने ठोका तमाचा*

किरंदुल (बैलाडीला), 22 जुलाई: नवरत्न कंपनी एनएमडीसी किरंदुल परियोजना का अस्पताल सर्वसुविधायुक्त है, पुरस्कारों से लदा है, लेकिन अकाल मृत्यु के बाद पार्थिव देह का पोस्टमॉर्टम कराने के लिए स्वीपर तक उपलब्ध नहीं! परिवार को मजबूरन पत्र लिखकर श्रमिक संगठनों के माध्यम से ठेका श्रमिक की मांग करनी पड़ती है। और अगर पैसे न निकले तो शव मर्चुरी के ठंडे फर्श पर पड़ा इंतजार करता रहता है।

इस संवेदनहीन व्यवस्था पर जायका रेस्टोरेंट के मालिक ने जो तड़पकर ऐलान किया है, वह किरंदुल के लिए मिसाल बन गया है।

उनका साहसी घोषणा:

“जब तक यह व्यवस्था नहीं बदलती, बैलाडीला-किरंदुल क्षेत्र में पोस्टमॉर्टम सहायक की मजदूरी और आवश्यक सामग्री का भुगतान संबंधित परिवार से नहीं लिया जाएगा। वे सीधे मुझे संपर्क करें या जायका रेस्टोरेंट आएं। पूरा भुगतान तुरंत कर दिया जाएगा। पीड़ित परिवार को इसकी भनक तक नहीं लगनी चाहिए।”

श्रमिक संगठनों के खुलासे: ‘दंडवत प्रणाम’ के बिना काम नहीं!

विश्वसनीय सूत्रों और स्थानीय चर्चाओं के अनुसार किरंदुल में ठेका श्रमिकों की भर्ती का खेल कुछ और ही है:

नेताओं की चापलूसी अनिवार्य: एनएमडीसी किरंदुल में ठेका काम चाहते हो तो सुबह-शाम श्रमिक संगठन के नेताओं के सामने दंडवत प्रणाम करो। जो उनके करीबी हैं या उनके आगे-पीछे घूमते रहते हैं, उन्हें ही आसानी से नौकरी मिल जाती है।

पूरे परिवार और रिश्तेदारों की भर्ती: कई उदाहरण सामने आए हैं जहां श्रमिक संगठन के नेताओं के पूरे परिवार, भाई-बहन, रिश्तेदार ठेका श्रमिक के रूप में एनएमडीसी में भर्ती हो चुके हैं।

कुशल पदों की मांग का दिखावा: संगठन अकुशल की बजाय सीधे कुशल (Skilled) पदों की मांग करते हैं। सवाल उठता है — वर्षों से सेवा दे रहे सैकड़ों ठेका कर्मचारी कुशल श्रेणी में क्यों नहीं गिने जाते? क्या यह मांग सिर्फ दिखावा है?

अस्पताल के बावजूद शवों का इंतजार: इतने पुरस्कार पाने वाले अस्पताल वाले क्षेत्र में पोस्टमॉर्टम जैसे संवेदनशील काम के लिए भी ठेका श्रमिक की मांग पत्र के जरिए की जाती है।

स्थानीय लोग पूछ रहे हैं — जब इतने सालों से ठेका कर्मी काम कर रहे हैं तो उन्हें कुशल क्यों नहीं माना जाता? और जब परिवार पहले ही दर्द में डूबा होता है, तब पोस्टमॉर्टम के नाम पर अतिरिक्त बोझ क्यों?

जायका मालिक की संवेदना vs संगठनों की चुप्पी

जायका रेस्टोरेंट मालिक ने साफ कहा — “मैं कोई बड़ा सेठ नहीं हूँ। यह मेरी रोजी-रोटी का जरिया है, लेकिन मेहनत की कमाई का एक हिस्सा अब इस काम के लिए समर्पित रहेगा।”

यह घोषणा किरंदुल के लिए बहुत बड़ी चिंतन का विषय बन गई है। लोग अब श्रमिक संगठनों से सवाल कर रहे हैं — क्या आप भी जायका मालिक की तरह ठोस कदम उठा सकते हैं? क्या पोस्टमॉर्टम जैसे मानवीय मुद्दे पर आप अपनी जिम्मेदारी निभाएंगे या सिर्फ भर्ती के नाम पर चापलूसी और परिवारवाद चलाते रहेंगे?

यह खबर सिर्फ एक रेस्टोरेंट मालिक की घोषणा की नहीं है। यह एनएमडीसी किरंदुल, स्थानीय प्रशासन और खासकर श्रमिक संगठनों की कार्यशैली पर सवाल है। जहां एक तरफ अस्पताल पुरस्कार जीत रहा है, वहीं दूसरी तरफ मौत के बाद भी गरीब परिवारों का शोषण हो रहा है।

किरंदुल अब इंतजार कर रहा है — क्या यह आवाज बदलाव लाएगी या फिर सब कुछ पुराने ढर्रे पर चलता रहेगा?

जायका रेस्टोरेंट मालिक का यह कदम सराहनीय है। अब देखना यह है कि अन्य जिम्मेदार लोग और संगठन इस मिसाल पर अमल करते हैं या नहीं।

किरंदुलवासियो, आपकी क्या राय है?

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