*दंतेवाड़ा के समेली संकुल में शिक्षा की दर्दनाक त्रासदी: एकता सिखाने वाला स्कूल खुद ‘अदृश्य दीवार’ से बंट गया, प्रिंसिपल के पति बन गए ‘अनधिकृत शासक’, बालिका आश्रम में 72 मासूमों पर महज 2 शिक्षिकाओं का बोझ*

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*दंतेवाड़ा के समेली संकुल में शिक्षा की दर्दनाक त्रासदी: एकता सिखाने वाला स्कूल खुद ‘अदृश्य दीवार’ से बंट गया, प्रिंसिपल के पति बन गए ‘अनधिकृत शासक’, बालिका आश्रम में 72 मासूमों पर महज 2 शिक्षिकाओं का बोझ*

दंतेवाड़ा (कुंवाकोंडा ब्लॉक), 2 मार्च 2026 – बस्तर के नक्सल प्रभावित इलाके में शिक्षा को विकास का सबसे मजबूत हथियार माना जाता है, लेकिन समेली संकुल हाई स्कूल और उसके ठीक बगल में स्थित बालिका आवासीय आश्रम स्कूल की हालत देखकर लगता है कि यहां शिक्षा विभाग ने बच्चों के भविष्य से पूरी तरह मुंह मोड़ लिया है। ये दो मामले नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की गहरी सड़ांध और अहंकार की जीती-जागती मिसाल हैं।

स्कूल में ‘विभाजन की दीवार’ – प्रिंसिपल का अहंकार बच्चों की एकता कुचल रहा

समेली संकुल हाई स्कूल और मिडिल स्कूल एक ही परिसर, एक ही इमारत, एक ही बाउंड्री में सालों से चलते आए थे। बच्चे एक साथ प्रार्थना करते, मध्याह्न भोजन ग्रहण करते, खेलते-कूदते, एक-दूसरे से सीखते। यही ‘एकता की शिक्षा’ थी जो आदिवासी बच्चों को समाज में जोड़ने का काम करती थी। लेकिन सितंबर 2025 में प्रिंसिपल पद पर पहुंचीं शिक्षिका देवांगन ने इस एकता को चकनाचूर कर दिया।

अब स्कूल दो हिस्सों में बंट गया है:

6वीं से 8वीं तक की कक्षाएं पूरी तरह ऊपरी मंजिल पर। प्रार्थना ऊपर, भोजन ऊपर, खेलकूद ऊपर। मिडिल के बच्चे नीचे नहीं उतर सकते।

हाई स्कूल (9वीं-10वीं) नीचे। ऊपर जाने की मनाही।

शिक्षक भी एक-दूसरे से अलग-थलग। बच्चे आपस में बात नहीं कर सकते।

यह कोई प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि एक व्यक्ति का व्यक्तिगत अहंकार है। सबसे खौफनाक हिस्सा – प्रिंसिपल के पति (जिनका स्कूल से कोई लेना-देना नहीं) अक्सर स्कूल आकर शिक्षकों पर दबाव बनाते हैं, धमकियां देते हैं, रोब झाड़ते हैं। तीन अतिथि शिक्षक (जिनकी नौकरी पहले से ही अनिश्चित) डर के साए में काम कर रहे हैं – कहीं प्रिंसिपल ने गलत रिपोर्ट न ठोक दी और नौकरी चली न जाए।

स्कूल की दो सिपाही (मानदेय महज 3000 रुपये मासिक) का हाल और भी दयनीय है। नियम के अनुसार उनका काम स्कूल खुलने से पहले सिर्फ शौचालय साफ करना और घर लौट जाना है। लेकिन यहां उन्हें सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक पूरे स्कूल की झाड़ू-पोंछा, मैदान की जंगल सफाई, धुलाई-पोछाई – सब कुछ कराया जा रहा है। यह शोषण नहीं तो क्या है?

100 मीटर दूर बालिका आश्रम की क्रूर विडंबना

समेली हाई स्कूल से महज 100 मीटर की दूरी पर बालिका आवासीय आश्रम स्कूल है। यहां 72 लड़कियां पढ़ रही हैं – सभी उपस्थित, सभी नियमित। लेकिन शिक्षक? महज दो – एक अधीक्षक और एक शिक्षिका। बस्तर जैसे क्षेत्र में जहां हर 2-3 बच्चों पर एक शिक्षक होना चाहिए, वहां 72 मासूमों की पढ़ाई-लिखाई, सुरक्षा, भविष्य इन दो महिलाओं के कंधों पर टिका है।

आश्रम की प्रभारी ने उच्च अधिकारियों से सरपंच के माध्यम से अतिथि शिक्षकों की मांग एक साल पहले की थी। आज तक कोई कार्रवाई नहीं। दो महिला होम गार्ड (जिनका मूल काम बच्चों की सुरक्षा और देखरेख है) अब पढ़ाई भी करा रही हैं। ड्यूटी के बाद अतिरिक्त समय निकालकर वे बच्चों को पढ़ाती हैं – यह उनकी मानवता है, लेकिन शिक्षा विभाग की नाकामी और लापरवाही का सबसे बड़ा सबूत भी।

विपरीत आंकड़े जो चीख-चीखकर न्याय मांग रहे हैं

समेली हाई स्कूल: 20 बच्चे, 12 शिक्षक (प्रति बच्चा लगभग 0.6 शिक्षक)।

बालिका आश्रम: 72 बच्चियां, 2 शिक्षिकाएं (प्रति बच्ची 36 बच्चियां एक शिक्षक पर)।

एक तरफ शिक्षकों की भरमार जहां काम कम है, दूसरी तरफ भयंकर कमी जहां बच्चों की जिंदगी दांव पर है। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि विभागीय उदासीनता और गैर-जिम्मेदारी का नतीजा है।

शिक्षा विभाग अब और कितना चुप रहेगा?

स्कूल को जानबूझकर बांटने वाले प्रिंसिपल पर कार्रवाई क्यों नहीं?

उनके पति को स्कूल में घुसने और धमकाने की छूट किसने दी?

अतिथि शिक्षकों और सिपाहिनों का यह शोषण कब तक चलेगा?

72 लड़कियों के भविष्य पर इतनी बड़ी जुआ क्यों लगाया जा रहा है?

जिला शिक्षा अधिकारी, कलेक्टर, संभागीय आयुक्त – अब बहाने नहीं चलेंगे। तत्काल जांच हो, दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो, स्कूल को फिर से एक किया जाए, आश्रम में शिक्षकों की तैनाती हो।

बस्तर के बच्चे पहले ही नक्सल, गरीबी, अशिक्षा से जूझ रहे हैं। क्या अब उन्हें अपने ही स्कूलों में ‘अहंकार की दीवार’ और ‘शिक्षकों की कमी’ से भी लड़ना पड़ेगा?

यह खबर सिर्फ समेली की नहीं – पूरे छत्तीसगढ़ की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल है। जवाब दो, विभाग! बच्चों का भविष्य तुम्हारे हाथ में है – इसे बर्बाद मत करो।

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