*दंतेवाड़ा में बाहरी कंपनियों का ‘लूट का खेल’: स्थानीय ठेकेदार और मजदूरों पर ‘कहर’ बरपा, सामंता व अन्य कंपनी की ‘मनमानी’ से हजारों बेरोजगार!*
दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़), 31 जनवरी 2026: दंतेवाड़ा जिले के किरंदुल और बचेली इलाकों में बाहरी कंपनियों की घुसपैठ ने स्थानीय ठेकेदारों और मजदूरों की कमर तोड़ दी है। यह न सिर्फ एक आर्थिक संकट है, बल्कि एक सुनियोजित ‘षड्यंत्र’ जैसा लगता है, जहां बाहरी लुटेरे स्थानीय संसाधनों को लूट रहे हैं और स्थानीय लोगों को भुखमरी की कगार पर धकेल रहे हैं। विशेष रूप से ‘सामंता कंपनी’ की एंट्री ने इस इलाके को ‘बाहरी आक्रमण’ का शिकार बना दिया है, जहां करोड़ों के टेंडर हथियाने के बावजूद स्थानीय ठेकेदारों को काम नहीं मिल रहा और मजदूर बाहर पलायन करने को मजबूर हैं। यह स्थिति न केवल शर्मनाक है, बल्कि स्थानीय प्रशासन और नेताओं की ‘कायरतापूर्ण चुप्पी’ से और भी घिनौनी हो गई है।
कुछ महीनों पहले किरंदुल में दाखिल हुई सामंता कंपनी ने एनएमडीसी (नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन) से करोड़ों रुपयों के निविदा हथिया लिए और काम शुरू कर दिया। लेकिन इस ‘बाहरी दानव’ ने स्थानीय ठेकेदारों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। एक स्थानीय ठेकेदार ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “केवल 2-3 ठेकेदारों को छोड़कर बाकी सभी भूखे मरने की कगार पर हैं। सामंता ने न तो हमें सब-कॉन्ट्रैक्ट दिए, न ही हमारे मजदूरों को रोजगार। यह ‘अन्याय की पराकाष्ठा’ है!” कंपनी ने अपने कार्यों में बाहरी मजदूरों को ही रखा है, जिनकी संख्या, मूल स्थान और पहचान तक किसी को पता नहीं। यह रहस्यमयी तरीका क्या छिपा रहा है – क्या यह स्थानीय रोजगार को जानबूझकर कुचलने की साजिश है?
विश्लेषण: बाहरी कंपनियों की ‘लूटतंत्र’ और स्थानीयों का ‘शोषण’
यह स्थिति छत्तीसगढ़ के लिए एक ‘कालिख’ है, जहां एक तरफ दंतेवाड़ा में 3000 से ज्यादा बाहरी मजदूर ओडिशा, बिहार, उत्तर प्रदेश, बंगाल और असम से आए आराम से काम कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ के हजारों स्थानीय मजदूर रोजी-रोटी की तलाश में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, कर्नाटक जैसे राज्यों में भटकने को विवश हैं। सामंता जैसे कंपनी की यह ‘मनमानी’ न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को चूस रही है, बल्कि सामाजिक संतुलन को भी बिगाड़ रही है। सामंता कंपनी रेत और गिट्टी जैसी बुनियादी सामग्री भी जगदलपुर और दंतेवाड़ा से खरीद रही है, जबकि किरंदुल-बचेली के स्थानीय सप्लायर हाथ मलते रह गए हैं। यह ‘स्थानीय विरोधी’ नीति सीधे-सीधे आर्थिक आतंकवाद जैसी है, जो इलाके के ठेकेदारों को दिवालिया बनाने पर तुली हुई है।
अगर हम गहराई से विश्लेषण करें, तो यह स्पष्ट है कि एनएमडीसी जैसे सरकारी उपक्रमों में बाहरी कंपनियों को प्राथमिकता देना एक चिंतन का विषय है। स्थानीय ठेकेदारों और मजदूरों को प्राथमिकता न देना न केवल संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की स्वायत्तता पर हमला है। क्या स्थानीय प्रशासन और नेता ‘भ्रष्टाचार के जाल’ में फंसे हैं? उनकी ‘मौन सहमति’ इस लूट को बढ़ावा दे रही है, जो अंततः इलाके को बेरोजगारी और पलायन की भेंट चढ़ा देगी। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर तुरंत हस्तक्षेप न हुआ, तो किरंदुल-बचेली जैसे औद्योगिक केंद्र ‘बाहरी कब्जे’ के शिकार हो जाएंगे, और स्थानीय अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाएगी।
मांग: स्थानीय ठेकेदारों को प्राथमिकता दो, अन्यथा विद्रोह की आग भड़केगी!
यह समय है कि स्थानीय ठेकेदारों और मजदूरों को प्राथमिकता दी जाए। सामंता जैसी कंपनियों को सख्त निर्देश दिए जाएं कि वे कम से कम 70% काम स्थानीय ठेकेदारों को सौंपें और 80% मजदूर स्थानीय रखें। एनएमडीसी को अपनी निविदा प्रक्रिया में ‘स्थानीय प्राथमिकता क्लॉज’ अनिवार्य करना चाहिए। यदि प्रशासन और नेता अब भी ‘सोते’ रहे, तो स्थानीय लोग सड़कों पर उतरने को मजबूर होंगे।

