*किरंदुल में स्वच्छ जल का संकट: करोड़ों के खर्च के बावजूद बारिश में गंदा पानी, भ्रष्टाचार पर सवाल*
दंतेवाड़ा/किरंदुल, 16 अगस्त 2025: छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले की किरंदुल नगरपालिका और जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी (PHE) विभाग पर एक बार फिर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। करोड़ों रुपये की नल जल योजना के बावजूद, किरंदुल वासियों को बारिश के मौसम में गंदा और दूषित पानी पीने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि नगरपालिका द्वारा आपूर्ति किया जा रहा पानी इतना गंदा है कि इसका उपयोग पीने के लिए करना स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है। यह स्थिति न केवल प्रशासन की लापरवाही को उजागर करती है, बल्कि भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों को भी हवा दे रही है।
*करोड़ों की योजना, फिर भी गंदा पानी*
किरंदुल नगरपालिका ने मलागीर नाले से स्वच्छ जल आपूर्ति के लिए 2024 में राज्य सरकार से 44.53 करोड़ रुपये की मांग की थी। इसके अलावा, 12 करोड़ रुपये की एक अन्य नल जल योजना पर भी काम हुआ, लेकिन परिणाम निराशाजनक हैं। स्थानीय निवासियों का कहना है कि बारिश के दिनों में नलों से आने वाला पानी मटमैला, बदबूदार और पूरी तरह से दूषित होता है। यह पानी न केवल पीने के लिए अनुपयुक्त है, बल्कि इससे टाइफाइड, पीलिया, हैजा और डायरिया जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने Subhash Kumar v. State of Bihar (1991 AIR 420) में स्पष्ट किया था कि स्वच्छ जल जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। फिर भी, किरंदुल में यह मौलिक अधिकार बार-बार हनन हो रहा है।
*नागरिकों का आक्रोश, भ्रष्टाचार पर सवाल*
किरंदुल के नागरिकों में इस स्थिति को लेकर भारी रोष है। स्थानीय निवासी रमेश कुमार ने कहा, “करोड़ों रुपये खर्च होने का दावा किया जाता है, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात। बारिश होते ही नल का पानी गंदा हो जाता है। आखिर इतना पैसा कहां जा रहा है?” एक अन्य निवासी, शांति देवी ने बताया कि गंदे पानी के कारण उनके परिवार में बच्चे बार-बार बीमार पड़ रहे हैं। लोग प्रशासन से जवाब मांग रहे हैं कि 12 करोड़ रुपये की नल जल योजना का पैसा कहां गया और क्यों आज भी स्वच्छ जल का सपना अधूरा है।
किरंदुल में बाढ़ और जलभराव की समस्या भी गंदे पानी की आपूर्ति को और गंभीर बना रही है। अपर्याप्त जल निकासी व्यवस्था के कारण नाले का गंदा पानी पाइपलाइनों में मिल रहा है, जिससे स्थिति और खराब हो रही है।
*प्रशासन की चुप्पी, जनता की मांग*
नगरपालिका और PHE विभाग की ओर से इस मुद्दे पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं दिख रही है। न तो जल स्रोतों की नियमित जांच हो रही है और न ही पाइपलाइनों की सफाई। स्थानीय लोगों ने उच्च स्तरीय जांच की मांग की है ताकि योजनाओं में हुए खर्च का हिसाब और भ्रष्टाचार की सच्चाई सामने आ सके। कुछ नागरिकों ने जनहित याचिका (PIL) दायर करने की बात भी कही है, ताकि कानूनी दबाव के जरिए स्वच्छ जल की आपूर्ति सुनिश्चित हो।
*स्वच्छ जल: संवैधानिक अधिकार*
भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 स्वच्छ जल को मौलिक अधिकार मानता है। आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट (A.P. Pollution Control Board vs. Prof. M.V. Nayudu, 1999) और उत्तराखंड हाईकोर्ट (2018) के फैसलों ने भी इस बात पर जोर दिया है कि राज्य का दायित्व है कि वह नागरिकों को स्वच्छ और प्रदूषण-मुक्त जल उपलब्ध कराए। किरंदुल में इस दायित्व की अनदेखी न केवल प्रशासनिक विफलता है, बल्कि नागरिकों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ भी है।
*आगे की राह*
किरंदुल के नागरिकों ने अब संगठित होकर अपनी आवाज उठाने का फैसला किया है। स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता और जागरूक नागरिक सोशल मीडिया के जरिए इस मुद्दे को उजागर कर रहे हैं और प्रशासन पर दबाव बना रहे हैं। विशेषज्ञों का सुझाव है कि नगरपालिका को निम्नलिखित कदम तत्काल उठाने चाहिए:
जल स्रोतों की नियमित जांच: मलागीर नाले और अन्य जल स्रोतों की गुणवत्ता की जांच समय-समय पर हो।
पाइपलाइनों की सफाई: गंदे पानी के रिसाव को रोकने के लिए पाइपलाइनों की मरम्मत और सफाई।
पारदर्शिता: नल जल योजनाओं के खर्च का सार्वजनिक ऑडिट और जांच।
जल निक ASI व्यवस्था में सुधार: बाढ़ और जलभराव को रोकने के लिए बेहतर ड्रेनेज सिस्टम।
नागरिकों से अपील
किरंदुल के नागरिकों से अपील है कि वे इस गंभीर मुद्दे पर चुप्पी तोड़ें और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाएं। स्वच्छ जल न केवल एक सुविधा, बल्कि संवैधानिक हक है। जनता की एकजुटता और दबाव से ही प्रशासन को जवाबदेही के लिए मजबूर किया जा सकता है।
निष्कर्ष: किरंदुल में स्वच्छ जल का संकट एक गंभीर मानवीय और प्रशासनिक विफलता है। जब तक भ्रष्टाचार और लापरवाही का यह गंदा खेल खत्म नहीं होगा, तब तक किरंदुल वासियों को स्वच्छ जल का सपना अधूरा ही रहेगा। अब समय है कि प्रशासन जागे, जवाब दे और नागरिकों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ बंद करे।

