*किरंदुल में आवारा कुत्तों का आतंक: पशुप्रेमी NGOs की चुप्पी और नागरिकों की बढ़ती चिंता*
किरंदुल, छत्तीसगढ़: किरंदुल शहर में आवारा कुत्तों का आतंक दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है, जिसने स्थानीय निवासियों के लिए जीवन को दहशत भरा बना दिया है। शहर की हर गली-मोहल्ले में 20 से 25 कुत्तों के झुंड सड़कों पर बेखौफ घूमते नजर आ रहे हैं। किरंदुल सरकारी अस्पताल के आंकड़ों के अनुसार, प्रतिदिन 2 से 3 लोग कुत्तों के काटने के शिकार होकर इलाज के लिए पहुंच रहे हैं। हाल ही में सामने आए एक वीडियो में कुत्तों के झुंड की भयावह तस्वीर देखी जा सकती है, जो किसी भी व्यक्ति पर हमला करने में सक्षम दिखाई देता है। इस स्थिति ने न केवल आम नागरिकों को डर के साए में जीने को मजबूर कर दिया है, बल्कि स्थानीय प्रशासन और पशुप्रेमी संगठनों की निष्क्रियता पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं।
*नागरिकों की चिंता: बच्चों की सुरक्षा खतरे में*
किरंदुल के निवासियों का कहना है कि आवारा कुत्तों का आतंक इस कदर बढ़ गया है कि माता-पिता अपने बच्चों को स्कूल, बाजार या खेलने के लिए बाहर भेजने से डर रहे हैं। एक स्थानीय निवासी रमेश साहू ने बताया, “कभी भी, कहीं भी कुत्तों का झुंड हमला कर सकता है। बच्चों और बुजुर्गों को सबसे ज्यादा खतरा है। हमारी शिकायतों पर कोई सुनवाई नहीं हो रही।” हाल के दिनों में कुत्तों द्वारा काटने की घटनाएं रोजाना की बात हो गई हैं, और रेबीज जैसी जानलेवा बीमारी का खतरा मंडरा रहा है। भारत में हर साल 15-20 लाख लोग कुत्तों के काटने का शिकार होते हैं, और रेबीज से लगभग 20,000 मौतें होती हैं, जो विश्व में सबसे अधिक है। किरंदुल में भी यह खतरा बढ़ता जा रहा है, लेकिन समस्या का समाधान नजर नहीं आ रहा।
*पशुप्रेमी NGOs और प्रशासन की खामोशी*
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस गंभीर समस्या के प्रति स्थानीय पशुप्रेमी संगठन और NGOs पूरी तरह उदासीन बने हुए हैं। नागरिकों का आरोप है कि ये संगठन तभी सक्रिय होते हैं, जब कोई कुत्तों के खिलाफ कार्रवाई करता है। एक स्थानीय निवासी सुनीता देवी ने गुस्से में कहा, “जब कुत्ते किसी को काट लेते हैं और परिजन उनसे बचाव में कुछ करते हैं, तब ये पशुप्रेमी जाग जाते हैं और पुलिस में शिकायत लेकर पहुंच जाते हैं। लेकिन जब कुत्तों का आतंक बढ़ रहा होता है, तब ये कहीं नजर नहीं आते।” किरंदुल और आसपास के बचेली क्षेत्र में कार्यरत NGOs इस मामले में पूरी तरह नदारद हैं, जिससे लोगों का गुस्सा और बढ़ रहा है।
*प्रशासन की लापरवाही और समाधान की कमी*
स्थानीय प्रशासन की ओर से भी इस समस्या के समाधान के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में देशभर में बढ़ते कुत्तों के हमलों पर स्वत: संज्ञान लिया है और इसे गंभीर मुद्दा बताया है। फिर भी, किरंदुल में नसबंदी अभियान या कुत्तों की आबादी नियंत्रण के लिए कोई प्रभावी योजना लागू नहीं की गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि नसबंदी अभियान को पारदर्शी और तकनीकी रूप से सक्षम बनाने की जरूरत है, साथ ही आक्रामक कुत्तों को शेल्टर में रखने जैसे उपाय अपनाए जाने चाहिए। लेकिन किरंदुल में ऐसी कोई पहल नजर नहीं आ रही।
*नागरिकों का सवाल: जाएं तो जाएं कहां?*
आम नागरिकों के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि वे अपनी और अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए जाएं तो जाएं कहां? सड़कों पर कुत्तों के झुंड का डर, रेबीज का खतरा, और प्रशासन की उदासीनता ने लोगों को असहाय बना दिया है। एक अन्य निवासी राजेश ठाकुर ने कहा, “हमारे बच्चे घरों में कैद हो गए हैं। न स्कूल जाने की आजादी है, न खेलने की। प्रशासन और NGOs को इस पर तुरंत ध्यान देना चाहिए।”
*समाधान की दिशा में सुझाव*
नसबंदी और जनसंख्या नियंत्रण: आवारा कुत्तों की आबादी को नियंत्रित करने के लिए तत्काल नसबंदी अभियान शुरू किया जाए। जीपीएस ट्रैकिंग जैसे तकनीकी उपायों का उपयोग कर कुत्तों की निगरानी की जाए।
आक्रामक कुत्तों के लिए शेल्टर: बार-बार हमला करने वाले कुत्तों को पकड़कर शेल्टर में रखा जाए, ताकि लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित हो।
डॉग फीडिंग जोन: कुत्तों के लिए विशेष फीडिंग जोन बनाए जाएं, ताकि वे आवासीय क्षेत्रों में कम घूमें।
जागरूकता और प्रशासनिक कार्रवाई: स्थानीय प्रशासन को नागरिकों की शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई करनी चाहिए, और पशुप्रेमी संगठनों को सुरक्षा और संवेदनशीलता के बीच संतुलन बनाना चाहिए।
*निष्कर्ष*
किरंदुल में आवारा कुत्तों का आतंक अब एक गंभीर सामाजिक और स्वास्थ्य समस्या बन चुका है। नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रशासन, पशुप्रेमी संगठनों और NGOs को मिलकर ठोस कदम उठाने होंगे। जब तक इस समस्या का समाधान नहीं निकलता, किरंदुल के लोग डर के साए में जीने को मजबूर रहेंगे। यह समय है कि पशुप्रेम और मानव सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित किया जाए, ताकि न कुत्तों को नुकसान पहुंचे और न ही नागरिकों की जान खतरे में पड़े।
