*किरंदुल में साप्ताहिक बाजार की व्यवस्था पर बड़ा सवाल! धनतेरस के बाजार ने दिखाई रविवार की तस्वीर, लक्ष्मी पूजा के दिन ग्रामीण आदिवासी कहां बेचेंगे अपनी उपज?*

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*किरंदुल में साप्ताहिक बाजार की व्यवस्था पर बड़ा सवाल! धनतेरस के बाजार ने दिखाई रविवार की तस्वीर, लक्ष्मी पूजा के दिन ग्रामीण आदिवासी कहां बेचेंगे अपनी उपज?*

धनतेरस पर मुख्य मार्ग से बस स्टैंड चौक तक बाजार में उमड़ी भीड़, वाहनों की आवाजाही रोकनी पड़ी; अब रविवार को लक्ष्मी पूजा और साप्ताहिक बाजार एक ही दिन होने से नगरपालिका की व्यवस्था की होगी असली परीक्षा।

किरंदुल। लौह नगरी किरंदुल में धनतेरस के अवसर पर शुक्रवार को बाजार में खरीदारी के लिए लोगों की भारी भीड़ उमड़ी। किरंदुल का मुख्य बाजार पूरी तरह ग्राहकों से खचाखच भरा रहा। स्थानीय व्यापारियों के लिए कारोबार के लिहाज से दिन अच्छा रहा, लेकिन इसी भीड़ ने आने वाले रविवार को होने वाले साप्ताहिक बाजार की व्यवस्थाओं को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

धनतेरस के दिन बाजार की स्थिति ऐसी रही कि मुख्य मार्ग पर लगने वाली दुकानों के कारण वाहनों की आवाजाही रोकने के लिए सड़क के दोनों ओर बैरिकेड लगाकर रास्ता बंद करना पड़ा। बाजार का विस्तार मुख्य मार्ग से होते हुए बस स्टैंड चौक तक दिखाई दिया। जब केवल धनतेरस के दिन बाजार की यह स्थिति रही, तो रविवार को क्या होगा, जब साप्ताहिक बाजार के साथ लक्ष्मी पूजा का पर्व भी है?

दरअसल, किरंदुल में लक्ष्मी पूजा के अवसर पर दंतेवाड़ा जिले सहित आसपास के दूरदराज ग्रामीण क्षेत्रों और जिले के बाहर से भी छोटे व्यापारी पहुंचते हैं। ये व्यापारी फूल, धान से बनी पूजन सामग्री, फल, दीपक और लक्ष्मी पूजा में उपयोग होने वाली विभिन्न सामग्रियां लेकर बाजार में दुकानें लगाते हैं। ऐसे में रविवार को सामान्य साप्ताहिक बाजार के साथ त्योहार का बाजार भी लगेगा।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल उन आदिवासी ग्रामीणों को लेकर है, जो हर रविवार अपने गांवों से सब्जियां और अन्य कृषि उपज लेकर किरंदुल में बेचने आते हैं। धनतेरस के दिन बाजार की जो स्थिति देखने को मिली, उसे देखते हुए रविवार को बाजार में जगह की भारी कमी होने की आशंका साफ नजर आ रही है।

आखिर अपनी मेहनत से उगाई सब्जियां लेकर आने वाले ग्रामीण आदिवासी कहां बैठेंगे?

क्या नगरपालिका ने इनके लिए कोई अलग और व्यवस्थित स्थान निर्धारित किया है? क्या प्रशासन का ध्यान इस संभावित अव्यवस्था की ओर है? क्या जनप्रतिनिधियों और आदिवासी नेताओं ने अपने गांवों से आने वाले ग्रामीणों के लिए उचित व्यवस्था सुनिश्चित करने की कोई पहल की है?

सवाल सिर्फ बाजार में दुकान लगाने की जगह का नहीं है, बल्कि उन छोटे ग्रामीण उत्पादकों की आजीविका का भी है, जो सप्ताहभर की मेहनत से अपनी उपज लेकर किरंदुल बाजार पहुंचते हैं। कहीं ऐसा न हो कि बाहर से आने वाले त्योहार के छोटे व्यापारियों और मुख्य बाजार में पहले से लगी दुकानों के बीच स्थानीय ग्रामीणों को अपनी उपज बेचने के लिए जगह ही न मिले।

आज धनतेरस के बाजार में मुख्य मार्ग से बस स्टैंड चौक तक जिस तरह भीड़ और दुकानों का विस्तार दिखाई दिया, उसे देखते हुए यह आशंका भी है कि रविवार को बाजार का दबाव बस स्टैंड चौक से आगे तक पहुंच सकता है और मुख्य सड़क पर आवागमन पूरी तरह प्रभावित हो सकता है।

सवाल नगरपालिका से है, प्रशासन से है और उन जनप्रतिनिधियों से भी है, जो ग्रामीणों और आदिवासी समाज के हितों की बात करते हैं।

क्या बाजार में आने वाले ग्रामीणों के लिए पहले से स्थान तय किया जाएगा? क्या सब्जी विक्रेताओं और त्योहार की सामग्री बेचने वाले छोटे व्यापारियों के लिए अलग-अलग व्यवस्था होगी? या फिर हर बार की तरह बाजार लगने के बाद ही अव्यवस्था को देखकर समाधान खोजने की कोशिश की जाएगी?

किरंदुल का बाजार केवल व्यापारियों का बाजार नहीं है, यह आसपास के गांवों के ग्रामीणों की आजीविका और जरूरतों से भी जुड़ा हुआ है। इसलिए व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जिसमें स्थानीय व्यापारी, बाहर से आने वाले छोटे व्यापारी और अपनी उपज बेचने आने वाले आदिवासी ग्रामीण, सभी को सम्मानजनक स्थान मिल सके।

अब देखना यह है कि रविवार को लक्ष्मी पूजा और साप्ताहिक बाजार के दिन किरंदुल नगरपालिका की व्यवस्था कितनी सफल होती है। ग्रामीणों को बैठने की जगह मिलती है या फिर उन्हें अपनी उपज लेकर वापस लौटने की नौबत आती है?

फिलहाल धनतेरस के बाजार ने आने वाले रविवार की संभावित अव्यवस्था का संकेत जरूर दे दिया है। अब रविवार ही बताएगा कि किरंदुल का बाजार व्यवस्थित होगा या एक बार फिर व्यवस्था के दावों की पोल खुलेगी।

सी जी संविधान न्यूज़ छत्तीसगढ़

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