एल-1, एल-2 भर्ती पर सवालों की धुंध, सेवानिवृत्त कर्मचारियों की पुनर्नियुक्ति की चर्चा और श्रमिक संगठनों की भूमिका पर उठते सवाल

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

एनएमडीसी किरंदुल-बचेली में रोजगार का संकट या व्यवस्था का नया खेल?

एल-1, एल-2 भर्ती पर सवालों की धुंध, सेवानिवृत्त कर्मचारियों की पुनर्नियुक्ति की चर्चा और श्रमिक संगठनों की भूमिका पर उठते सवाल

बस्तर का युवा पूछ रहा है—जब परियोजना में काम है तो नई पीढ़ी के लिए भर्ती क्यों नहीं?

किरंदुल/बचेली।

बस्तर की धरती खनिज संपदा से समृद्ध है। इसी धरती पर एनएमडीसी की किरंदुल और बचेली परियोजनाएं दशकों से लौह अयस्क का उत्पादन कर रही हैं। इन परियोजनाओं ने हजारों परिवारों को रोजगार दिया, क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को मजबूती दी और बस्तर के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

लेकिन आज इसी परियोजना के आसपास एक ऐसा सवाल खड़ा होता दिखाई दे रहा है, जिसका जवाब केवल एनएमडीसी प्रबंधन ही नहीं बल्कि श्रमिक संगठनों और जनप्रतिनिधियों को भी देना चाहिए—

“जब परियोजना में काम की आवश्यकता है, तो बस्तर के बेरोजगार युवाओं के लिए रोजगार के दरवाजे क्यों नहीं खुल रहे?”

सूत्रों से प्राप्त जानकारी और स्थानीय स्तर पर चल रही चर्चाओं के अनुसार एनएमडीसी परियोजना में एल-1, एल-2 सहित कुछ श्रेणियों की भर्ती प्रक्रिया को लेकर युवाओं में निराशा और असमंजस है। दूसरी ओर सेवानिवृत्त कर्मचारियों को पुनः कार्य पर लिए जाने की चर्चाएं भी सामने आ रही हैं।

इन दोनों बातों को एक साथ रखकर देखा जाए तो बेरोजगार युवाओं के सामने एक बेहद गंभीर सवाल खड़ा होता है—

क्या रोजगार के उपलब्ध अवसर नई पीढ़ी तक पहुंचने से पहले ही पुराने कर्मचारियों के लिए सुरक्षित किए जा रहे हैं?

यह सवाल केवल भावनात्मक नहीं है। यह उस पूरे रोजगार तंत्र की पारदर्शिता पर सवाल है जिसके आधार पर स्थानीय युवाओं को अवसर मिलने चाहिए। सबसे बड़ा सवाल—भर्ती बंद है तो काम कौन कर रहा है?

यदि एनएमडीसी परियोजना में पर्याप्त मानव संसाधन उपलब्ध है और अतिरिक्त कर्मचारियों की आवश्यकता नहीं है, तो सेवानिवृत्त कर्मचारियों को पुनः कार्य पर लेने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है?

और यदि परियोजना में अतिरिक्त मानव संसाधन की आवश्यकता है, तो फिर—नई भर्ती क्यों नहीं?

एल-1 और एल-2 जैसी भर्ती प्रक्रियाओं को लेकर स्पष्ट नीति क्या है?

स्थानीय युवाओं के लिए कितने पद उपलब्ध हैं?

पिछले वर्षों में कितनी भर्ती हुई?

आने वाले वर्षों में कितनी भर्ती प्रस्तावित है?

सेवानिवृत्त कर्मचारियों को पुनः नियुक्त करने का नियम क्या है?

पुनर्नियुक्ति की अधिकतम अवधि कितनी है?

क्या पुनर्नियुक्ति के लिए खुली और पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई जाती है?

क्या उसी पद के लिए स्थानीय बेरोजगार युवाओं को आवेदन का अवसर दिया जाता है?

अगर इन सवालों के जवाब नियमों और दस्तावेजों के साथ उपलब्ध हैं तो उन्हें सार्वजनिक करने में परेशानी क्या है?

सेवानिवृत्ति के बाद भी एनएमडीसी में वापसी—व्यवस्था या अवसरों का टकराव?

यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी सेवानिवृत्त कर्मचारी की पुनर्नियुक्ति अपने आप में गलत नहीं मानी जा सकती। यदि कंपनी की नीति, आवश्यकता और निर्धारित नियमों के अनुसार किसी विशेषज्ञ या अनुभवी कर्मचारी की सेवाएं ली जाती हैं, तो उसका औचित्य हो सकता है।

लेकिन बस्तर के बेरोजगार युवा यह पूछ रहे हैं कि—

क्या हर पुनर्नियुक्ति के साथ एक नया रोजगार अवसर खत्म होता है?

यदि किसी पद पर एक सेवानिवृत्त कर्मचारी को रखा जाता है तो क्या उस पद पर किसी बेरोजगार स्थानीय युवा को अवसर मिल सकता था?

यदि किसी तकनीकी विशेषज्ञ की आवश्यकता है तो क्या स्थानीय युवाओं को प्रशिक्षण देकर भविष्य के लिए तैयार किया जा सकता है?

क्या एनएमडीसी के पास ऐसी कोई योजना है जिसमें सेवानिवृत्त कर्मचारियों के अनुभव का उपयोग युवाओं को प्रशिक्षण देने और धीरे-धीरे उन्हें जिम्मेदारी सौंपने में किया जाए?

अगर नहीं, तो क्यों नहीं?

श्रमिक संगठनों की चुप्पी—सहमति या अनभिज्ञता?

इस पूरे मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष श्रमिक संगठन हैं।

कहा जाता है कि श्रमिक संगठन कर्मचारियों के अधिकारों, रोजगार, सेवा शर्तों और श्रमिक हितों की आवाज होते हैं।

स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि पूर्व में एनएमडीसी के महत्वपूर्ण श्रम संबंधी निर्णयों से पहले श्रमिक संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक और चर्चा की जाती थी।

तो सवाल सीधा है—

क्या सेवानिवृत्त कर्मचारियों की पुनर्नियुक्ति के मुद्दे पर श्रमिक संगठनों के साथ बैठक हुई?

यदि हुई—

बैठक कब हुई?

कौन-कौन शामिल हुआ?

क्या निर्णय लिया गया?

क्या कोई लिखित समझौता हुआ?

क्या प्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर किए?

यदि सहमति बनी तो उसकी जानकारी कर्मचारियों को क्यों नहीं दी गई?

और अगर बैठक नहीं हुई—

तो फिर इतने बड़े रोजगार संबंधी विषय पर श्रमिक संगठनों को विश्वास में क्यों नहीं लिया गया?

सबसे संवेदनशील सवाल—क्या बाहर कुछ और और अंदर कुछ और?

कुछ सूत्रों द्वारा यह आशंका भी व्यक्त की जा रही है कि कहीं सार्वजनिक मंच पर विरोध और अंदरखाने किसी प्रकार की सहमति के बीच अंतर तो नहीं है।

यह दावा अभी स्वतंत्र रूप से प्रमाणित नहीं है।

लेकिन लोकतंत्र और श्रमिक प्रतिनिधित्व का मूल सिद्धांत यही है कि यदि कोई निर्णय पारदर्शी है तो उसके दस्तावेज सामने आने चाहिए।

इसलिए सवाल किसी नेता पर व्यक्तिगत आरोप लगाने का नहीं है।

सवाल है—

क्या श्रमिक संगठन सार्वजनिक रूप से यह बताएंगे कि उन्होंने पुनर्नियुक्ति और नई भर्ती के विषय में प्रबंधन के साथ क्या बातचीत की है?

यदि कोई समझौता हुआ है तो सामने आए।

यदि कोई सहमति नहीं हुई है तो भी सामने आए।

यदि संगठन विरोध में हैं तो विरोध का लिखित स्वरूप क्या है?

और यदि विरोध है तो अब तक उसका परिणाम क्या निकला?

क्या कुछ वरिष्ठ नेता अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं?

एक और चर्चा कर्मचारियों के बीच सुनाई दे रही है कि कुछ वरिष्ठ कर्मचारी और श्रमिक संगठन से जुड़े पदाधिकारी आने वाले वर्षों में सेवानिवृत्त होने वाले हैं।

ऐसे में यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि क्या सेवानिवृत्ति के बाद भी एनएमडीसी में पुनः कार्य करने की इच्छा रखने वाले लोग किसी व्यवस्था का हिस्सा बन रहे हैं?

यहां फिर स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी व्यक्ति के विरुद्ध कोई निष्कर्ष बिना दस्तावेज या प्रमाण के नहीं निकाला जा सकता।

लेकिन अगर ऐसी व्यवस्था बनती है जिसमें वरिष्ठ कर्मचारी सेवानिवृत्त होकर भी लंबे समय तक उसी परियोजना में बने रहते हैं, तो युवा पूछेंगे—

“हमारे लिए जगह कब बनेगी?”

“क्या नौकरी कुछ लोगों के लिए पीढ़ियों तक चलने वाली व्यवस्था बन जाएगी?”

“क्या बस्तर के बेरोजगार युवाओं को केवल आश्वासन ही मिलता रहेगा?”

यह केवल बेरोजगार युवाओं का नहीं, वर्तमान कर्मचारियों के बच्चों का भी सवाल है

किरंदुल और बचेली में एनएमडीसी के हजारों कर्मचारी और उनके परिवार रहते हैं।

आज का कर्मचारी केवल अपनी नौकरी नहीं देखता।

वह अपने बच्चे का भविष्य भी देखता है।

जिस कर्मचारी ने पूरी जिंदगी परियोजना में सेवा दी, वह स्वाभाविक रूप से चाहता है कि सेवानिवृत्ति के बाद उसके बच्चे को भी सम्मानजनक रोजगार मिले।

लेकिन यदि उसके बच्चे को रोजगार के लिए बाहर जाना पड़े और दूसरी ओर सेवानिवृत्त कर्मचारी ही पुनः परियोजना में काम करता रहे, तो परिवारों के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है—

“क्या हमारे बच्चों के लिए एनएमडीसी में कोई भविष्य नहीं है?”

बस्तर के लाखों युवाओं के लिए बड़ा सवाल

बस्तर में रोजगार का संकट कोई छोटा विषय नहीं है।

युवा शिक्षा पूरी करता है।

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता है।

तकनीकी प्रशिक्षण लेता है।

आईटीआई और अन्य संस्थानों से योग्यता प्राप्त करता है।

फिर स्थानीय परियोजनाओं की ओर उम्मीद से देखता है।

लेकिन यदि स्थानीय स्तर पर भर्ती के अवसर लगातार सीमित होते गए तो युवा आखिर जाएगा कहां?

क्या उसे रोजगार के लिए रायपुर, भिलाई, नागपुर, हैदराबाद, विशाखापट्टनम या देश के दूसरे हिस्सों में पलायन करना पड़ेगा?

अगर ऐसा है तो फिर “स्थानीय विकास” का अर्थ क्या रह जाएगा?

एनएमडीसी से जनता के सीधे सवाल

1. एल-1 और एल-2 भर्ती की वर्तमान स्थिति क्या है?

2. क्या इन पदों पर भर्ती रोकने का कोई निर्णय हुआ है?

3. यदि भर्ती रोकी गई है तो उसका लिखित कारण क्या है?

4. परियोजना में वर्तमान में कितने पद रिक्त हैं?

5. पिछले पांच वर्षों में कितने सेवानिवृत्त कर्मचारियों को पुनः कार्य पर लिया गया?

6. उन्हें किन नियमों के तहत नियुक्त किया गया?

7. उनकी पुनर्नियुक्ति कितनी अवधि के लिए है?

8. क्या उन्हीं पदों पर स्थानीय बेरोजगार युवाओं को अवसर देने की कोई व्यवस्था है?

9. क्या श्रमिक संगठनों के साथ इस विषय पर बैठक हुई?

10. यदि बैठक हुई तो उसका कार्यवृत्त सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया?

11. यदि बैठक नहीं हुई तो श्रमिक संगठनों को विश्वास में क्यों नहीं लिया गया?

12. स्थानीय युवाओं के लिए एनएमडीसी की दीर्घकालीन रोजगार नीति क्या है?

13. क्या सेवानिवृत्त कर्मचारियों की पुनर्नियुक्ति और नई भर्ती के बीच कोई स्पष्ट नीति है?

14. क्या एनएमडीसी इस पूरी प्रक्रिया की जानकारी सार्वजनिक करने के लिए तैयार है?

और श्रमिक संगठनों से भी सवाल

क्या आप नई पीढ़ी के रोजगार के लिए खुलकर खड़े होंगे?

क्या आप बताएंगे कि सेवानिवृत्त कर्मचारियों की पुनर्नियुक्ति पर आपकी क्या राय है?

क्या आपने एनएमडीसी प्रबंधन से लिखित रूप में नई भर्ती की मांग की है?

क्या आपने कभी यह मांग रखी कि स्थानीय कर्मचारियों के बच्चों को रोजगार में प्राथमिकता मिले?

क्या आप बेरोजगार युवाओं के साथ खुली बैठक करने को तैयार हैं?

अगर जवाब “हां” है तो फिर सामने आइए।

अगर जवाब “नहीं” है तो फिर बस्तर का युवा सवाल पूछने के लिए स्वतंत्र है।

यह लड़ाई किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं—व्यवस्था की पारदर्शिता के लिए है

इस खबर का उद्देश्य किसी सेवानिवृत्त कर्मचारी को अपमानित करना या किसी श्रमिक नेता पर बिना प्रमाण आरोप लगाना नहीं है।

मुद्दा इतना है कि एनएमडीसी जैसी महत्वपूर्ण परियोजना में रोजगार से जुड़ी नीति पारदर्शी होनी चाहिए।

किसे नौकरी मिली?

किस नियम से मिली?

कितने समय के लिए मिली?

क्यों मिली?

और स्थानीय युवा को अवसर क्यों नहीं मिला?

इन सवालों के जवाब दस्तावेजों के साथ सामने आने चाहिए।

अगर जवाब नहीं मिले तो क्या होगा?

आज सवाल सोशल मीडिया पर हैं।

कल सवाल पत्रकारों के सामने होंगे।

परसों सवाल प्रशासन के सामने होंगे।

और यदि इसके बाद भी रोजगार से जुड़े सवालों का समाधान नहीं हुआ तो बेरोजगार युवाओं का शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक आंदोलन खड़ा होना कोई असंभव बात नहीं है।

देश में जनता अपने अधिकारों और रोजगार जैसे मुद्दों को लेकर जंतर-मंतर जैसे लोकतांत्रिक मंचों पर आवाज उठाती रही है।

तो क्या आने वाले समय में किरंदुल-बचेली भी बस्तर के बेरोजगार युवाओं की आवाज का ऐसा ही लोकतांत्रिक केंद्र बनेगा?

क्या यहां से “रोजगार दो” की आवाज उठेगी?

क्या हजारों युवा एक मंच पर आकर एनएमडीसी से अपने सवालों का जवाब मांगेंगे?

यह फैसला किसी एक पत्रकार का नहीं होगा।

यह फैसला उन बेरोजगार युवाओं का होगा जिनके हाथ में डिग्री है, लेकिन रोजगार नहीं।

अंतिम सवाल—जिम्मेदारी किसकी?

अगर भर्ती के अवसर हैं—तो भर्ती कौन करेगा?

अगर पद खाली हैं—तो उन्हें भरेगा कौन?

अगर सेवानिवृत्त कर्मचारियों की जरूरत है—तो उसका नियम क्या है?

अगर श्रमिक संगठन कर्मचारियों के प्रतिनिधि हैं—तो बेरोजगारों के बच्चों के भविष्य की आवाज कौन उठाएगा?

अगर एनएमडीसी बस्तर की धरती से संसाधन ले रही है—तो बस्तर के युवाओं को रोजगार का हिस्सा कब मिलेगा?

और अगर आज भी इन सवालों का जवाब नहीं मिलता—

तो फिर बस्तर का बेरोजगार युवा कब तक चुप रहेगा?

कब तक इंतजार करेगा?

कब तक रोजगार के नाम पर उम्मीद लगाए बैठेगा?

कब तक अपने ही क्षेत्र में रोजगार के लिए बाहर जाने को मजबूर होगा?

अब सवाल सिर्फ नौकरी का नहीं है—सवाल बस्तर की आने वाली पीढ़ी के भविष्य का है।

अगर व्यवस्था पारदर्शी है तो दस्तावेज सामने आएं।

अगर भर्ती होनी है तो समयसीमा बताई जाए।

अगर पुनर्नियुक्ति नियमों के तहत है तो नियम सार्वजनिक किए जाएं।

और अगर बेरोजगारों की आवाज अनसुनी की गई, तो लोकतांत्रिक तरीके से उठने वाली आवाज को रोकना आसान नहीं होगा।

किरंदुल-बचेली से उठने वाली यह आवाज कहीं बस्तर का “दूसरा जंतर-मंतर” न बन जाए—यह सवाल आज से ही जिम्मेदारों के सामने खड़ा है।

सी जी संविधान न्यूज़

“सवाल जनता का — जवाब जिम्मेदारों का।”

Leave a Comment

और पढ़ें

Buzz4 Ai

Read More Articles