*दंतेवाड़ा के किरंदुल में नेपाल बाढ़ पीड़ितों के प्रति गहरी संवेदना: रक्षाबंधन की खुशियों के बीच दुख बांटा, मोमबत्तियां जलाकर दी श्रद्धांजलि*
दंतेवाड़ा जिले के किरंदुल में शुक्रवार को एक भावुक और संवेदनशील दृश्य देखने को मिला। जब पूरा भारत रक्षाबंधन की मिठास और भाई-बहन के प्यार में डूबा हुआ था, उसी समय पड़ोसी देश नेपाल में भीषण बाढ़ की त्रासदी से सैकड़ों परिवार टूट चुके थे। किरंदुल बस स्टैंड शहीद चौक पर किरंदुल वासियों ने नेपाली समाज और परिवारों के साथ मिलकर मृतात्माओं की शांति के लिए श्रद्धांजलि अर्पित की और दो मिनट का मौन रखा।
मोमबत्तियां जलाकर उन्होंने उन हजारों लापता लोगों की जल्दी सकुशल वापसी और जो बच गए हैं, उनके शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की। एक तरफ भारत में राखियां बंध रही थीं, दूसरी तरफ नेपाल में भाई अपनी बहन को चीख-चीखकर पुकार रहे थे और बहनें अपने भाई की तलाश में भटक रही थीं। ग्लेशियर के पतन से आई इस विनाशकारी बाढ़ में सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है और हजारों अब भी लापता हैं। परिवार बिखर गए हैं, घर उजड़ गए हैं।
किरंदुल निवासियों ने इस दुख को अपना दुख समझा। उन्होंने कहा कि सीमा पार का दर्द भी हमारा दर्द है। नेपाली समाज के साथ खड़े होकर उन्होंने संदेश दिया कि दुख की घड़ी में हम अकेले नहीं हैं। शहीद चौक पर इकट्ठा हुए लोगों की आंखें नम थीं। मौन के उन दो मिनटों में सिर्फ हवा की सिसकी गूंज रही थी। मोमबत्तियों की लौ में मानो उन मासूमों की यादें जल रही थीं जिनकी जिंदगी बाढ़ की चपेट में चली गई।
यह आयोजन सिर्फ श्रद्धांजलि नहीं था। यह पड़ोस की पीड़ा को बांटने, मानवता की एकता का प्रतीक था। किरंदुल वासियों ने साफ संदेश दिया कि रक्षाबंधन की रक्षा सिर्फ अपने परिवार तक सीमित नहीं, बल्कि दुखी पड़ोसियों तक भी पहुंचनी चाहिए। नेपाल के पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए उन्होंने प्रार्थना की कि लापता लोग जल्द सुरक्षित मिलें और मृतकों की आत्मा को शांति मिले।
इस संवेदनशील घड़ी में किरंदुल की इस पहल ने दिखाया कि दर्द कोई सीमा नहीं मानता। जब एक देश खुशियों में डूबा हो, तब दूसरे की आंखों के आंसू पोंछना ही सच्ची मानवता है।

