*किरंदुल में बसंत पंचमी पर विवाद: प्रकाश विद्यालय ने बच्चों को सरस्वती पूजा से दूर रखा, अभिभावक भड़के!*
किरंदुल, छत्तीसगढ़ (23 जनवरी 2026): आज पूरे भारत में बसंत पंचमी का पर्व धूमधाम से मनाया जा रहा है। ज्ञान की देवी मां सरस्वती की पूजा-अर्चना के इस पावन अवसर पर स्कूलों और शिक्षण संस्थानों में विशेष आयोजन हो रहे हैं, लेकिन किरंदुल का प्रकाश विद्यालय एक बार फिर विवादों के घेरे में आ गया है। यहां स्कूल प्रशासन ने बसंत पंचमी पर छुट्टी घोषित कर बच्चों को पूजा से दूर रखने का फैसला लिया है, जबकि शहर के अन्य स्कूलों जैसे एनएमडीसी प्रोजेक्ट स्कूल और सरकारी स्कूलों में सरस्वती पूजा का आयोजन हो रहा है। अभिभावकों में इस फैसले को लेकर गुस्सा है और वे इसे धार्मिक भेदभाव का उदाहरण बता रहे हैं।
क्या है पूरा मामला?
प्रकाश विद्यालय, जो किरंदुल के गांधी नगर इलाके में स्थित है और एनएमडीसी प्रोजेक्ट से जुड़ा एक प्राइवेट संस्थान है, को अक्सर विवादों से जोड़ा जाता रहा है। इस बार बसंत पंचमी पर स्कूल ने छुट्टी रखी, जिसका उद्देश्य कथित तौर पर बच्चों को धार्मिक आयोजनों से दूर रखना बताया जा रहा है। उपयोगकर्ता द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार, स्कूल के इस रवैये से अभिभावक बेहद नाराज हैं। एक अभिभावक ने कहा, “स्कूल में पूजा के लिए कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। हमारे बच्चे ज्ञान की देवी की पूजा से वंचित क्यों रहें?” वहीं, अन्य स्कूलों में बच्चे सरस्वती वंदना और पूजा में भाग ले रहे हैं, जिससे प्रकाश विद्यालय का फैसला और भी संदिग्ध लगता है।
स्कूल को एक कन्वेंट स्कूल के रूप में जाना जाता है, जहां धार्मिक तटस्थता की नीति अपनाई जाती है, लेकिन अभिभावकों का आरोप है कि यह नीति हिंदू त्योहारों पर ही लागू होती है। पिछले वर्षों में भी स्कूल विवादों में घिरा रहा है, जैसे कि छात्रों के बीच पक्षपाती व्यवहार और अनुशासन संबंधी मुद्दे। जस्टडायल जैसी प्लेटफॉर्म्स पर स्कूल की रेटिंग 4.6 है, लेकिन पूर्व छात्रों के कन्फेशन पेज पर अक्सर प्रशासन की आलोचना होती है।
विश्लेषण: धार्मिक भेदभाव या नीतिगत फैसला?
यह घटना सिर्फ एक छुट्टी का मामला नहीं है, बल्कि गहरा सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दा है। प्रकाश विद्यालय एनएमडीसी प्रोजेक्ट से जुड़ा होने के बावजूद प्राइवेट रूप से संचालित होता है, और इसका प्रशासन कथित तौर पर धार्मिक आयोजनों से दूरी बनाए रखने की नीति अपनाता है।
अभिभावकों की नाराजगी: कई माता-पिता का कहना है कि बसंत पंचमी जैसे त्योहार बच्चों को सांस्कृतिक शिक्षा देते हैं। छुट्टी देकर स्कूल उन्हें इस विरासत से वंचित कर रहा है। यह फैसला विशेष रूप से तब विवादास्पद लगता है जब अन्य स्कूलों में पूजा हो रही हो। अभिभावकों का गुस्सा जायज है, क्योंकि शिक्षा सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि सांस्कृतिक मूल्यों की भी होनी चाहिए।
स्कूल की पक्षपाती छवि: प्रकाश विद्यालय पहले भी विवादों में रहा है। एनएमडीसी जैसे सार्वजनिक क्षेत्र से जुड़े होने के कारण इसे सरकारी निगरानी में होना चाहिए, लेकिन प्राइवेट मैनेजमेंट के चलते फैसले मनमाने लगते हैं। अगर यह कन्वेंट स्कूल है, तो क्या यह सेक्युलरिज्म के नाम पर हिंदू परंपराओं को नजरअंदाज कर रहा है? देश भर में कई स्कूलों में सरस्वती पूजा होती है, फिर यहां क्यों नहीं?
कानूनी और सामाजिक पहलू: भारतीय संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है, लेकिन स्कूलों में धार्मिक आयोजन स्कूल नीति पर निर्भर करते हैं। हालांकि, अगर यह भेदभावपूर्ण है, तो यह शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है। छत्तीसगढ़ शिक्षा विभाग को इसकी जांच करनी चाहिए। वर्तमान में, देश में ऐसे कई उदाहरण हैं जहां स्कूलों में धार्मिक प्रतीकों या आयोजनों पर विवाद हुए हैं, जैसे गाजियाबाद के केंद्रीय विद्यालय में मंगलसूत्र हटाने का मामला। प्रकाश विद्यालय का फैसला इसी ट्रेंड का हिस्सा लगता है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूलों को सांस्कृतिक विविधता को बढ़ावा देना चाहिए, न कि दबाना। अगर छुट्टी दी गई है, तो कम से कम वैकल्पिक सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते थे। अभिभावकों की मांग है कि स्कूल अपनी नीति की समीक्षा करे और भविष्य में ऐसे फैसले न ले।
निष्कर्ष: जांच की जरूरत
प्रकाश विद्यालय का यह फैसला न केवल अभिभावकों को नाराज कर रहा है, बल्कि शहर में धार्मिक सद्भाव पर भी सवाल उठा रहा है। स्थानीय प्रशासन और शिक्षा विभाग को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए। अगर यह भेदभाव साबित होता है, तो सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। बसंत पंचमी ज्ञान का पर्व है, और बच्चों को इससे दूर रखना शिक्षा के मूल उद्देश्य के खिलाफ है। अभिभावक एकजुट होकर अपनी आवाज उठाएं, ताकि ऐसे पक्षपाती फैसले बंद हों।
(यह रिपोर्ट उपलब्ध जानकारी और अभिभावकों के बयानों पर आधारित है। स्कूल प्रशासन से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली।)

