*किरंदुल में अवैध अतिक्रमण का बेखौफ खेल: तहसीलदार के रोक आदेश को ठेंगा दिखा शिव शर्मा ने जारी रखा निर्माण, नगरपालिका की मिलीभगत पर सवाल*

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*किरंदुल में अवैध अतिक्रमण का बेखौफ खेल: तहसीलदार के रोक आदेश को ठेंगा दिखा शिव शर्मा ने जारी रखा निर्माण, नगरपालिका की मिलीभगत पर सवाल*

किरंदुल (छत्तीसगढ़), 12 जनवरी 2026: छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के किरंदुल शहर में अवैध अतिक्रमण का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। वार्ड नंबर 6 में सरकारी भूमि पर कब्जे की घटनाएं अब प्रशासनिक आदेशों की अवहेलना तक पहुंच गई हैं। एक ताजा मामला शिव शर्मा का है, जिन्होंने बस स्टैंड के सामने वाली गली में अवैध रूप से मकान निर्माण शुरू किया था। बचेली तहसीलदार द्वारा स्पष्ट रूप से कार्य रोकने के आदेश जारी होने के बावजूद, शिव शर्मा ने इसे पूरी तरह अनदेखा कर धड़ल्ले से निर्माण जारी रखा है। तहसीलदार के आदेश का कोई असर नहीं पड़ा, जो प्रशासन की कमजोरी और संभावित मिलीभगत को उजागर करता है। क्या कानून केवल कागजों तक सीमित रह गया है? यह स्थिति न केवल आम नागरिकों के लिए खतरा है, बल्कि शहर की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

अतिक्रमण की पूरी कहानी: आदेश की अवहेलना और प्रशासन की नाकामी

वार्ड नंबर 6 का घड़ी चौक से शुरू होने वाला गौरव पथ पहले से ही व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के कब्जे में है, जहां दुकानदारों ने सड़कें, फुटपाथ और यहां तक कि नालियां भी घेर ली हैं। लेकिन अब मामला और गंभीर हो गया है। स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, शिव शर्मा ने सरकारी भूमि पर अवैध निर्माण शुरू किया, जिसमें नगरपालिका द्वारा निर्मित नाली के ऊपर दीवार खड़ी कर गली को पूरी तरह ब्लॉक कर दिया गया। निवासियों की शिकायत पर बचेली तहसीलदार ने जांच के बाद सख्त आदेश जारी किया: “निर्माण कार्य तत्काल प्रभाव से रोक दिया जाए और अतिक्रमण हटाया जाए।” यह आदेश पिछले महीने जारी हुआ था, लेकिन शिव शर्मा ने इसे हवा में उड़ा दिया। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि आदेश के बाद भी मजदूर दिन-रात काम कर रहे हैं, और निर्माण तेजी से आगे बढ़ रहा है।

एक स्थानीय निवासी, जो नाम न छापने की शर्त पर बोले, “तहसीलदार का आदेश आया, लेकिन क्या फर्क पड़ा? शिव शर्मा जैसे लोग बेखौफ हैं क्योंकि उन्हें पता है कि नगरपालिका या प्रशासन कोई ठोस कदम नहीं उठाएगा। यह मिलीभगत का खेल है, जहां पैसे या राजनीतिक दबाव से सब कुछ दबा दिया जाता है।” इस अवहेलना से जल निकासी की समस्या और बढ़ गई है। बारिश में पानी भरना, मच्छरों का प्रकोप और बीमारियां आम हो गई हैं। यातायात बाधित है, और आपातकालीन वाहनों जैसे एंबुलेंस के लिए रास्ता बंद होने से जान जोखिम में है। बच्चों और बुजुर्गों के लिए तो यह मौत का जाल बन चुका है।

विश्लेषण: क्यों बेअसर हो रहे हैं सरकारी आदेश?

किरंदुल जैसे छोटे शहरों में प्रशासनिक ढिलाई कोई नई बात नहीं, लेकिन तहसीलदार के आदेश की खुली अवहेलना एक खतरनाक ट्रेंड है। पिछले कुछ वर्षों में वार्ड नंबर 6 में सरकारी भूमि पर कब्जे की शिकायतें बढ़ी हैं, लेकिन कार्रवाई शून्य। क्या वजह है?

राजनीतिक दबाव और भ्रष्टाचार: जानकारों का मानना है कि अतिक्रमणकारी स्थानीय नेताओं या प्रभावशाली लोगों के संरक्षण में काम कर रहे हैं। शिव शर्मा का मामला इसका जीता-जागता उदाहरण है, जहां आदेश जारी होने के बाद भी कोई फॉलो-अप नहीं हुआ।

नगरपालिका की सुस्ती: किरंदुल नगरपालिका की भूमिका सबसे संदिग्ध है। शिकायतों पर नोटिस जारी नहीं होते, अभियान नहीं चलाए जाते। क्या अधिकारियों को रिश्वत या धमकी मिल रही है? निवासियों का आरोप है कि मिलीभगत से यह खेल पनप रहा है।

कानूनी कमजोरी: तहसीलदार के आदेश को नकारना दंडनीय अपराध है, लेकिन कोई गिरफ्तारी या जुर्माना नहीं लगाया गया। यह प्रशासन की इच्छाशक्ति की कमी दर्शाता है, जो अंततः शहर की मूल संरचना को नष्ट कर रहा है। बढ़ती आबादी के बीच ऐसी लापरवाही विकास को रोक रही है और कानून-व्यवस्था को मजाक बना रही है।

अगर यह सिलसिला जारी रहा, तो किरंदुल का वार्ड नंबर 6 पूरी तरह अराजकता की चपेट में आ जाएगा। क्या उच्च अधिकारियों या राज्य सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ेगा? स्थानीय निवासी अब न्याय की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या उनकी आवाज सुनी जाएगी या फिर अतिक्रमण का यह खेल और बेखौफ जारी रहेगा?

यह खबर आम नागरिकों की पीड़ा और प्रशासन की नाकामी को उजागर करती है। अगर आप इस मुद्दे से प्रभावित हैं, तो संबंधित अधिकारियों से संपर्क करें और अपनी आवाज बुलंद करें। बदलाव तभी आएगा जब जनता जागरूक बनेगी।

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