*किरंदुल में जलभराव और कावड़ यात्रा: प्राथमिकताओं का सवाल*

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*किरंदुल में जलभराव और कावड़ यात्रा: प्राथमिकताओं का सवाल*

 

किरंदुल के वार्ड क्रमांक 8, 6,और 7 मे में आज सुबह करीब 11 बजे जलभराव की स्थिति ने 15 से 20 घरों को 4-5 फीट पानी में डूबो दिया। प्रभावित परिवारों के घर और उनमें रखा समान बर्बाद होने की कगार पर था। ऐसे संकट के समय नगर की प्रथम नागरिक और नगरपालिका अध्यक्ष रूबी सिंह कहीं नजर नहीं आईं। कुछ घंटों बाद सावन के आखिरी सोमवार पर निकली कावड़ यात्रा में वे कावड़ उठाए डीजे के सामने चलती दिखीं।

यह घटना किरंदुल वासियों के लिए चिंता का विषय बन गई है। नगरपालिका अध्यक्ष का पद नगर के विकास, आपदा प्रबंधन और नागरिकों की समस्याओं के समाधान से जुड़ा होता है। जब घर पानी में डूब रहे हों, समान बह रहा हो और लोग परेशानी में हों, तब जनप्रतिनिधि की उपस्थिति और सक्रियता अपेक्षा की जाती है। प्रशासनिक टीम को निर्देश देना, मौके पर पहुंचकर स्थिति का जायजा लेना या राहत व्यवस्था सुनिश्चित करना—ये कदम आम नागरिकों के विश्वास को मजबूत करते हैं।

इसके विपरीत, खुशी और धार्मिक आयोजनों में उपस्थिति दिखना और संकट के समय दूरी बनाए रखना कई स्थानीय लोगों में नाराजगी पैदा कर रहा है। कावड़ यात्रा धार्मिक आस्था का प्रतीक है और उसमें शामिल होना व्यक्तिगत या सांस्कृतिक पसंद हो सकती है। लेकिन जब उसी दिन नगर के एक वार्ड में जलभराव जैसी समस्या गंभीर रूप ले रही हो, तो प्राथमिकताओं का संतुलन सवाल खड़ा करता है।

किरंदुल जैसे शहर में मानसून के दौरान जलभराव की समस्या नई नहीं है। पिछले वर्षों में भी बारिश और नाले-नालों की स्थिति ने परेशानी पैदा की है। नगरपालिका अध्यक्ष के रूप में रूबी सिंह ने अतीत में कुछ विकास कार्यों और समस्याओं के समाधान की दिशा में पहल की खबरें आई हैं। फिर भी, संकट के समय की उपस्थिति और संवेदनशीलता का अभाव स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। लोग पूछ रहे हैं—क्या जनप्रतिनिधि केवल उत्सव और कार्यक्रमों में दिखते हैं, या दुख-दर्द के समय भी उनके साथ खड़े होते हैं?

यह घटना सिर्फ एक दिन की घटना नहीं, बल्कि नेतृत्व की जिम्मेदारी और जवाबदेही पर चिंतन का अवसर है। नगर के प्रथम नागरिक से अपेक्षा रहती है कि वे हर परिस्थिति में नागरिकों के हित को प्राथमिकता दें। जलभराव प्रभावित परिवारों को तत्काल राहत, नालों की सफाई और स्थायी समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाने की जरूरत है। साथ ही, जनप्रतिनिधियों को भी यह समझना होगा कि विश्वास सिर्फ भाषणों या कार्यक्रमों से नहीं, बल्कि संकट के समय की उपस्थिति और कार्रवाई से बनता है।

किरंदुल के निवासी अब इंतजार कर रहे हैं कि नगरपालिका प्रशासन इस घटना पर क्या रुख अपनाता है और प्रभावितों की मदद कैसे करता है। प्राथमिकताओं का सही संतुलन ही नगर को आगे ले जा सकता है।

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