*किरंदुल में छत्तीसगढ़ मिलन समारोह की धूम: माता की पूजा से शुरू होकर अलका चंद्राकर के सुरों से समापन, सांस्कृतिक धरोहर ने बांधा समां*

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*किरंदुल में छत्तीसगढ़ मिलन समारोह की धूम: माता की पूजा से शुरू होकर अलका चंद्राकर के सुरों से समापन, सांस्कृतिक धरोहर ने बांधा समां*

किरंदुल, 23 नवंबर 2025 (विशेष संवाददाता): छत्तीसगढ़ के 25वें राज्य स्थापना दिवस और एनएमडीसी की स्थापना के दोहरे उपलक्ष्य पर दक्षिण बस्तर के किरंदुल में आज एक अनुपम सांस्कृतिक उत्सव का आयोजन हुआ। छत्तीसगढ़ सांस्कृतिक एवं क्रीड़ा मंडल, किरंदुल के तत्वावधान में आयोजित इस छत्तीसगढ़ मिलन समारोह ने न केवल स्थानीय निवासियों को अपनी जड़ों से जोड़ा, बल्कि राज्य की समृद्ध लोक संस्कृति को जीवंत रूप प्रदान किया। कार्यक्रम की शुरुआत छत्तीसगढ़ महतारी की छायाचित्र पर पुष्प अर्पित कर और दीप प्रज्वलन से हुई, जो राज्य की मातृभूमि के प्रति श्रद्धा का प्रतीक बनी। शाम 7.30 बजे से शुरू हुई संगीत संध्या में छत्तीसगढ़ी फिल्मों की नंबर वन पार्श्वगायिका अलका परगनिहा चंद्राकर ने अपनी सुरीली आवाज का जादू बिखेरा, जिसने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। यह समारोह न केवल सांस्कृतिक रहा, बल्कि सामाजिक एकता और युवा प्रतिभाओं को प्रोत्साहन का माध्यम भी बना।

*मंडल की परंपरा: 25 वर्षों की सांस्कृतिक यात्रा का एक नया अध्याय*

छत्तीसगढ़ सांस्कृतिक एवं क्रीड़ा मंडल, किरंदुल राज्य निर्माण से 32 वर्ष पहले स्थापित हुआ था और तब से यह छत्तीसगढ़ की धरोहर को संजोए रखने का प्रमुख केंद्र रहा है। एनएमडीसी के सहयोग से संचालित यह मंडल वर्ष भर तीज-त्योहारों, पूजाओं और क्रीड़ा कार्यक्रमों के माध्यम से बस्तर की जनजातीय संस्कृति को जीवंत करता आ रहा है। आज का मिलन समारोह इस परंपरा का हिस्सा था, जहां हजारों प्रवासी छत्तीसगढ़ी परिवारों ने भाग लिया। मंडल के अध्यक्ष ने बताया, “यह आयोजन न केवल मनोरंजन का साधन है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने का प्रयास है। राज्य के 25 वर्ष पूरे होने पर हमने इसे और भव्य बनाया।”

कार्यक्रम का उद्घाटन पारंपरिक तरीके से किया गया। छत्तीसगढ़ महतारी की विशाल छायाचित्र पर सभी अतिथियों ने पुष्प अर्पित किए और दीप प्रज्वलित कर समारोह का शुभारंभ घोषित किया। यह क्षण भावुकता से भरपूर रहा, जहां दर्शकों ने ‘छत्तीसगढ़ महतारी की जय’ के नारों से वातावरण गुंजायमान कर दिया। इसके बाद, आज के पाहुना के रूप में किरंदुल परियोजना के महाप्रबंधक के पी सींग नगरपालिका की अध्यक्ष रूबी सिंह और उपाध्यक्ष बबलू सिद्दीकी का भव्य स्वागत किया गया। मंडल के सदस्यों ने उन्हें शॉल-श्रीफल और पुष्पगुच्छ भेंट कर सम्मानित किया। रूबी सिंह, जो स्थानीय विकास में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं, ने कहा, “किरंदुल जैसे खनिज क्षेत्र में सांस्कृतिक आयोजन जरूरी हैं, जो औद्योगिक जीवन को सांस्कृतिक रंग प्रदान करते हैं।” वहीं, उपाध्यक्ष बबलू सिद्दीकी ने मंडल की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे कार्यक्रम सामुदायिक सद्भाव को बढ़ावा देते हैं।

*बच्चों की नृत्य प्रस्तुति: छत्तीसगढ़ी संस्कृति की नई पीढ़ी का जादू*

कार्यक्रम का एक प्रमुख आकर्षण स्थानीय सामाजिक के बच्चों द्वारा प्रस्तुत छत्तीसगढ़ी नृत्य रहा। रंग-बिरंगे परिधानों में सजे ये नन्हे कलाकारों ने सुआ, राउत और पंथी नृत्यों के माध्यम से बस्तर की जनजातीय परंपराओं को जीवंत किया। ‘करमा’ पर आधारित समूह नृत्य में लड़कियों ने बांस की टेकरी बजाते हुए प्रकृति पूजा का संदेश दिया, जबकि लड़कों का ‘सैला नाच’ ऊर्जा से भरपूर था। दर्शकों ने तालियों की गड़गड़ाहट से इन प्रस्तुतियों का स्वागत किया। एक दर्शक ने कहा, “ये बच्चे हमारी संस्कृति के भविष्य हैं। मंडल द्वारा ऐसे अवसर प्रदान करने से युवा पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ रही है।”

*अलका चंद्राकर की संगीत संध्या: सुरों का अहर्निश जादू, दर्शक मंत्रमुग्ध*

शाम ढलते-ढलते कार्यक्रम का चरमोत्कर्ष अलका परगनिहा चंद्राकर की संगीत संध्या से आया। रायपुर के फुलवारी लोककला मंच के तत्वावधान में आयोजित इस संध्या में अलका ने अपनी मधुर आवाज से ‘चमके रे बिंदिया’, ‘माया छूटाय नहि’ और ‘रानी के फुंद्रा’ जैसे सुपरहिट छत्तीसगढ़ी गीतों की धुन पर दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर दिया। जन्म 9 जून को रायपुर में हुआ, अलका ने अपने पिता मधुकर चंद्राकर से संगीत की प्रारंभिक शिक्षा ली और छत्तीसगढ़ी सिनेमा में सर्वश्रेष्ठ गायिका का पुरस्कार कई बार जीत चुकी हैं। उनकी आवाज में लोक, भक्ति और रोमांटिक भावनाओं का अनोखा संगम है, जो बस्तर जैसे क्षेत्रों में तो खासा लोकप्रिय है।

अलका ने मंच पर कहा, “छत्तीसगढ़ की मिट्टी से निकली आवाज को किरंदुल जैसे दूरस्थ क्षेत्र में सुनना गर्व की बात है। आज के इस समारोह से हमारी संस्कृति और मजबूत होगी।” उनके गीतों के बीच दर्शकों ने जसगीत और भक्ति भजनों पर नृत्य भी किया। संध्या में ‘तिरछी नजर कबर मारै ओ’ और ‘मोला भंवर’ जैसे लोकप्रिय गीतों ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया। कार्यक्रम के अंत में अलका को स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया गया, और दर्शकों ने खड़े होकर तालियां बजाईं।

*मंडल का वर्ष भर का योगदान: तीज-त्योहारों का सांस्कृतिक कैलेंडर*

यह समारोह मंडल के वर्ष भर चलने वाले सांस्कृतिक प्रयासों का हिस्सा मात्र था। 2025 में मंडल ने बस्तर दशहरा, नवरात्रि, दीपावली और होली जैसे त्योहारों को भव्यता से मनाया।गणेश पूजा दशहरा पर रथ यात्रा और राउत नाच की प्रस्तुतियां हुईं, जबकि नवरात्रि में गरबा रात्रियों ने युवाओं को जोड़ा। मंडल ने करमा पूजा पर महिलाओं के लोकगीतों को प्रोत्साहित किया और   कार्यक्रम आयोजित किए। युवाओं को सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ते हैं। मंडल के सचिव ने बताया, “हमारा लक्ष्य है कि छत्तीसगढ़ की 75 दिवसीय बस्तर दशहरा जैसी परंपराएं यहां भी जीवित रहें।”

*निष्कर्ष: सांस्कृतिक जागरण की नई सुबह*

आज का छत्तीसगढ़ मिलन समारोह किरंदुल को सांस्कृतिक राजधानी बनाने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हुआ। माता की पूजा से शुरू होकर अलका चंद्राकर के सुरों से संपन्न यह आयोजन न केवल मनोरंजन प्रदान किया, बल्कि राज्य की एकता और विविधता का संदेश भी दिया। जैसे-जैसे छत्तीसगढ़ 25वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है, मंडल जैसे संस्थान राज्य की धरोहर को नई ऊंचाइयों तक ले जा रहे हैं। स्थानीय निवासियों ने आयोजकों को बधाई देते हुए कहा कि ऐसे कार्यक्रम भविष्य में और भव्य हों।

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