*तेज रफ्तार और ट्रकों के अवैध कब्जे का दोहरा कहर : बचेली में फिर गई एक और जिंदगी, प्रशासन मूकदर्शक*
बचेली (दंतेवाड़ा)। तेज रफ्तार का नशा और सड़कों पर ट्रकों का अवैध साम्राज्य – यही दो कातिल हैं जो बस्तर के बचेली-किरंदुल मार्ग को कब्रिस्तान बनाते जा रहे हैं। रविवार सुबह नंदराज पेट्रोल पंप के ठीक सामने एक 22 साल के युवक उमेश की जिंदगी ने सिर्फ एक झटके में दम तोड़ दिया, जब उसकी केटीएम ड्यूक बाइक सामने से आ रही पिकअप से जा भिड़ी। दूसरा युवक रवि (20) गंभीर रूप से घायल है, उसके दोनों पैर बुरी तरह कुचले गए हैं।
लेकिन यह हादसा कोई अचानक घटना नहीं है। यह एक सुनियोजित कत्ल है – जिसमें एक तरफ बाइक सवार युवाओं की लापरवाही है तो दूसरी तरफ प्रशासन की घोर नाकामी और भ्रष्टाचार है। बचेली से किरंदुल तक की सड़क के दोनों किनारों पर दर्जनों ट्रक सालों से अवैध रूप से खड़े हैं। ये ट्रक न तो कोई पार्किंग हैं, न ही लोडिंग पॉइंट। ये तो बस कुछ नेताओं, ठेकेदारों और प्रशासन के गठजोड़ की वजह से खड़े हैं। चौड़ीकरण के नाम पर गरीबों के मकान तोड़े गए, लेकिन सड़क चौड़ी करने का फायदा सिर्फ इन ट्रकों को मिला। सड़क अब भी उतनी ही संकरी है जितनी पहले थी, बस फर्क यह है कि अब दोनों तरफ लोहे के ये राक्षस खड़े रहते हैं जो किसी भी वक्त मौत बनकर उभरते हैं।
हर दूसरा दिन कोई न कोई छोटी-बड़ी दुर्घटना होती है। लोग चिल्लाते हैं, शिकायत करते हैं, सोशल मीडिया पर वीडियो डालते हैं – लेकिन प्रशासन को कोई फर्क नहीं पड़ता। लगता है कि जिला प्रशासन और पुलिस को इंतजार है किसी बड़े हादसे का – जिसमें एक साथ दस-पंद्रह लाशें गिरें, तब जाकर दो-चार ट्रक हटाने का नाटक किया जाए और फाइल बंद कर दी जाए।
पिछले महीने ही किरंदुल में दो बाइकों की आमने-सामने की टक्कर में एक युवक की मौत हुई थी उसका भी कारण अनियंत्रित रफ़्तार का कहार था। लेकिन क्या हुआ? सड़को से न ट्रक हटे, न चालान हुए, न कोई स्थायी समाधान निकाला गया। अब फिर एक और मां का चिराग बुझ गया। उमेश की लाश ठंडी हो जाएगी और प्रशासन सोता रहेगा।
सवाल सिर्फ तेज रफ्तार का नहीं है। सवाल यह है कि आखिर ये ट्रक सड़क किनारे खड़े करने की इजाजत किसने दी? कौन हैं वो नेता जिनके इशारे पर ये अवैध पार्किंग चल रही है? चौड़ीकरण के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च हुए, गरीबों के घर उजाड़े गए – लेकिन सड़क आज भी मौत का जाल बनी हुई है।
लोग कहते हैं कि पुलिस चालान करती है। हां, बाइक वालों का चालान करती है। हेलमेट नहीं पहना तो 1000 रुपये, ओवरस्पीड तो 2000 रुपये। लेकिन जिस ट्रक ने पूरी सड़क पर कब्जा कर रखा है, जिसकी वजह से ओवरटेक करना मजबूरी बन जाता है, उसका चालान क्यों नहीं? गरीब का बेटा मर जाए तो क्या, अमीर ठेकेदार का ट्रक तो बच गया।
बचेली-किरंदुल की जनता अब थक चुकी है। हर घर में कोई न कोई इस सड़क से रोज गुजरता है। हर मां को डर रहता है कि उसका बेटा वापस आएगा या नहीं। लेकिन प्रशासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती। लगता है लाशें गिनने का ही काम रह गया है इन अधिकारियों को।
कब तक चलेगा यह खूनी खेल? कब तक गरीबों की जान की कीमत पांच सौ रुपये के चालान और दो दिन की खानापूर्ति कार्रवाई रहेगी? कब तक सड़कें ठेकेदारों की निजी संपत्ति बनी रहेंगी?
उमेश अब लौटकर नहीं आएगा। रवि शायद जिंदगी भर लंगड़ाकर चले। लेकिन अगर अभी भी प्रशासन नहीं जागा, तो अगला नंबर किसी और का होगा। और तब भी यही हेडलाइन होगी – “तेज रफ्तार का कहर”। जबकि सच यह है कि असली कहर तो प्रशासन की नाकामी और भ्रष्टाचार का है।
जनता अब जवाब मांग रही है –आखिर कब तक?

